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सनातन धर्म क्या है

अलाना हिन्दू है, फलाना मुस्लिम है, ढिमाका क्रिश्चिन है… ठीक है, मान लिया ! पर महाभारत काल में तो इनमें से कोई भी नहीं था… .फिर कृष्ण जी ने परधर्म किसे कहा ? कितनी बार हमने इस पर चिन्तन किया, मनन किया ? धर्म के बारे में हम आखिर अधिक चिन्तन क्यों नहीं करते हैं कि जो बातें सूक्ष्मता से लिखी गयी हैं, उनपर भी अधिक चिन्तन करने की आवश्यकता पड़ती तो होगी | तभी तो धर्म को सूक्ष्म कहा जाता है क्योंकि उस पर चिन्तन विराट चाहिये | लेकिन हमारी धर्म के बारे में अवधारणा क्या है ?

भाई, मेरे हिसाब से तो अच्छे काम करो, यही धर्म है – अच्छा और वो अच्छा खराब कैसे decide होगा ? मर्डरर को मर्डर करना अच्छा लगता है तो क्या वो धर्म हो जाएगा ? दुष्ट व्यक्ति को, साधुओं को परेशान करने में अच्छा लगता है तो क्या वो धर्म हो जायेगा ? कितनी देर, कितने घंटे, कितने महीने, कितने वर्ष तक हमने धर्म के ऊपर चिन्तन किया ? सोचने वाली बात तो है |

परहित सरस धर्म नहीं भाई, इतनी सी बात आपको नहीं पता ? – तो क्या धर्म इतना सा ही है ? परहित करना ही धर्म है तो परहित तो गरीब को खाना खिलाना भी है पर अगर आपके घर में ही खाना न हो और कोई मांगने वाला आ जाये तब ? तब क्या धर्म बदल जायेगा ? फिर परहित सरस धर्म नहीं भाई, वाली बात कहाँ गायब हो जायेगी ? अगर परहित ही धर्म है तो फिर तो भीख देना गलत कैसे है ? उसकी भी आपने धन देकर मदद ही तो की है ? प्रश्न में से प्रश्न निकलेंगे लेकिन उन प्रश्नों को जानने का कितना प्रयास हमने किया है ?

सत्य पर चलना ही धर्म है – क्या धर्म सत्य से प्रारम्भ होकर, मात्र सत्य पर ही समाप्त हो गया ? यदि केवल सत्य पर चलना ही धर्म है तो फिर दया क्या है ? दान क्या है ? यज्ञ क्या है ? परोपकार क्या है ? अहिंसा परमो धर्मः, क्या ये भी गलत है ? क्या ये सभी धर्म नहीं है ? केवल सत्य ही धर्म है ? हम इतने गूढ़ विषय का अतिसरलीकरण तो नहीं कर रहे हैं कहीं ?

जो अपना कर्म है, वही धर्म है या जो जिसका स्वभाव होता है, वही उसका धर्म होता है – यदि धर्म इतना ही सरल है तो क्या किसी का खून करना भी धर्म की श्रेणी में आ जाएगा ? इस प्रकार, यदि किसी का कुछ भी करना, धर्म ही है तो फिर अधर्म कहाँ रहा ? सब तो धर्म हो गया ? चोरी करना, चोर का धर्म ! क्या ऐसी परिभाषा हमारे सनातन धर्म की हो सकती है ? कहीं हम धर्म के बारे में अपनी मान्यता, मनमाने ढंग से तो नहीं बना रहे हैं ? बिना शास्त्रों के अध्ययन के ! कहीं किसी शास्त्र में, ऐसी विचित्र परिभाषा दी हुई है क्या धर्म की ?

जो धारण करने योग्य है वो धर्म है – जो धारण करने योग्य है, वो धर्म है पर वो “जो” क्या है ? क्या है, जिसे धारण किया जाए ? कौन बतायेगा कि क्या धारण करना चाहिए ? कौन से शास्त्र में लिखा है कि क्या धारण करना चाहिए ?

कहीं हमने भी तो ऐसी ही कोई छोटी सी धर्म की परिभाषा नहीं बना रखी, अपनी सुविधानुसार, बिना शास्त्रों का समुचित अध्ययन किये, बिना उन पर समुचित चिन्तन-मनन किये ? क्या धर्म की परिभाषा एक पंक्ति की हो सकती है ? जो धर्म इतना महान है ! सबसे पुराना है ! सबसे विराट है ! उसको एक पंक्ति में बांधा जा सकता है ? अगर नहीं तो फिर सोचिये कि आपकी धर्म की परिभाषा क्या है ? आपकी जो भी धर्म के बारे में मान्यता है, क्या वो शास्त्रोक्त है ? है भी कोई परिभाषा या नहीं ? अगर विज्ञान में हर चीज की परिभाषा हो सकती है तो धर्म की परिभाषा क्यों नहीं है ? अगर ऐसी कोई परिभाषा है तो हमें क्यों नहीं पता ? सोचने वाली बात तो ये भी है !!!

अतः अगर आप भी धर्म को समुचित जानना चाहते हैं तो रजिस्टर कीजिये, 26 जुलाई के हमारे लाइव वेबिनार – “धर्म क्या है ?” को | इसमें आपको धर्म की सभी सुनी सुनाई बातों को सामने रखते हुए, असल धर्म से परिचित कराया जाएगा | धर्म क्या है ? स्वधर्म क्या है ? परधर्म क्या है ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर, इस वेबिनार में आपको मिल जायेंगे | तो देर किस बात की है, ऐसे ज्ञानविषयक वेबिनार को रजिस्टर करने में देर न करें..क्योंकि सीट लिमिटेड ही हैं | अतः जल्दी कीजिये, कहीं ये मौका छूट न जाए |

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