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दीपक

दीपक क्यों जलाना चाहिए ?

क्या आपने कभी भगवन को अपने सामने भोग लगाते हुए देखा है ? कभी सोचा है हम घी का दीपक क्यों जलाते हैं, मंदिर में ? रौशनी के लिए ? ईश्वर को प्रकाश दिखाने के लिए ? क्या ये संभव है कि हम दीपक से, दिन में भगवान् को रौशनी दिखाएँ ?

मैं जब छोटा था और हमारे घर में जब कोई पिताजी से किसी ख़ास समस्या के लिए मदद मांगता था जैसे कोर्ट में केस जीतने के लिए तो पिताजी हम लोगो से एक बड़ा घी का दीपक् जलवाते थे और हमारी ड्यूटी होती थी कि उस दीपक में घी खत्म नहीं होना चाहिए (सहस्त्रबाहु का दीपक) । 7 दिन, 10 दिन या 15 दिन के लिए वो दीपक जलता था । तब समझ नहीं आता था कि इस से क्या होता है । पर आश्चर्यजनक रूप से परिणाम उस आदमी के पक्ष में ही आता था ।

अभी कुछ दिनों पहले ही ये गुत्थी सुलझी। याज्ञवल्क्य पुराण में अग्नि भगवान् की स्तुति है जिसमें उनकी अनेक जिह्वा बताई गयी हैं और उनको देवताओ का मुख कहा गया है। जब हम दीपक जलाते हैं तो basically हम ईश्वर को, उस घी का, जिससे वो दीपक जल रहा है, उसका भोग लगा रह होते हैं । अग्नि भगवन उसी समय उस घी को ग्रहण कर लेते हैं ।

आपने ये भी सुना होगा कि कुछ लोग हविष्यान्न ही खाते हैं मतलब जो कुछ हवनकुण्ड से बचता है उसी को खाते हैं क्योंकि वह ही असल में ईश्वर का बचा हुआ है, जिसे हमें प्रसाद स्वरुप ग्रहण करना चाहिए ।

इसीलिए सुबह और शाम को वेदों में अग्नि की स्थापना का विधान है कि ईश्वर को भोग लगा कर ही दिन की शुरुआत करनी चाहिए । अब क्योंकि लोग हवन नहीं कर सकते हैं (या नहीं करते हैं) तो भी घी का दीपक अवश्य जलाना चाहिए।

और आगे बढिए, अग्निदेवता की स्तुति में कहा गया है कि वो पवित्र और अपवित्र सभी चीजो का भोग लगते हैं क्योंकि उनको छू कर सब चीजे स्वयं ही पवित्र हो जाती है। इसलिए अग्नि भगवन के लिए कुछ भी पवित्र और अपवित्र नहीं है । आपने देखा होगा हवन के बाद पंडित जी, हवन भस्म को शरीर पर लगाने के लिए कहते हैं क्योंकि वह परम पवित्र है। इसमें भी सबसे पवित्र क्या ? पंचभूतों की भस्म । पंचभूत की भस्म यानि चिता की भस्म। किसको सबसे प्रिय है चिता की भस्म ? शंकर जी को। क्यों ? क्योंकि अग्नि भगवान् पंचभूतों को भस्म करके उसे भी पवित्र बना देते है और वो विशिष्ट भस्म है क्योंकि वो पञ्च भूतो के समुदाय को जला कर ही उत्पन्न हुई है और यही भगवान् रूद्र की विशेष प्रिय है क्योंकि यही जीवन के विनाश का प्रतीक है और रुद्र भगवन का प्रिय कर्म है। जीवन की क्षणभंगुरता का प्रतीक है इसीलिए सबसे विशिष्ट प्रसाद है।

यस्य आज्ञा जगत्सृष्टा, विरंचि पालको हरिः ।
संहर्ता कालरुद्राख्यो, नमस्तस्यै पिनाकिने ।।

जिनकी आज्ञा से ब्रह्मा जी संसार की सृष्टि करते हैं, जिनकी आज्ञा से श्री विष्णु जगत का पालन करते हैं और रूद्र संसार का संहार करते हैं, ऐसे भगववान पिनाकिन (पिनाक धनुष को धारण करने वाले, भगवान् शिव) को मैं नमस्कार करता हूँ |

नोट – इसीलिए सनातन धर्म में घी के दीपक की महत्ता है, मोमबत्ती जलाने की नहीं | मोमबत्ती में आप केमिकल खिला रहे हैं, अग्नि देवता को, जो कि अन्न नहीं है | अतः दीपावली पर दीपक ही जलाएं, बिजली के दीपक या मोमबत्ती नहीं |

बोलिये शंकर भगवान की जय ।

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