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खंडन 9/मंडन 1 (प्याज और लहसुन की वायरल पोस्ट का खंडन)

आजकल प्याज और लहसुन को लेकर एक पोस्ट वायरल हो रही है, आपने भी इसे सोशल मिडिया पर देखा होगा | ये पोस्ट कितनी शास्त्रोक्त है, इसके के लिए, हमारे व्हात्सप्प ग्रुप “शास्त्र – क्या सच, क्या झूठ” में आई थी | प्याज और लहसुन के बारे में सभी जानना चाहते हैं सो इस बार, इस पोस्ट की चीर-फाड़ की गयी | पहले आप वायरल पोस्ट पढ़ें, फिर आप नीचे खंडन पढ़ें

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प्याज़ खाना क्यों मना!?!

(कृपया पोस्ट पूरी पढ़ें; ये जानकारी अन्य कहीं नहीं मिलेगी)
शाकाहार होने तथा चिकित्सीय गुण होने के बावजूद साधकों हेतु प्याज-लहसुन वर्जित क्यों है, इसपर विस्तृत शोध के कुछ बिंदु आपके समक्ष रख रहा हूं!….

1)मलूक पीठाधीश्वर संत श्री राजेन्द्र दास जी बताते हैं कि एक बार प्याज़-लहसुन खाने का प्रभाव देह में 27 दिनों तक रहता है,और उस दौरान व्यक्ति यदि मर जाये तो नरकगामी होता है!ऐसा शास्त्रों में लिखा है!

2) प्याज़ का सेवन करने से 55 मर्म-स्थानों में चर्बी जमा हो जाती है, जिसके फलस्वरूप शरीर की सूक्ष्म संवेदनाएं नष्ट हो जाती हैं!

3) भगवान के भोग में, नवरात्रि आदि व्रत-उपवास में ,तीर्थ यात्रा में ,श्राद्ध के भोजन में और विशेष पर्वों पर प्याज़-लहसुन युक्त भोजन बनाना निषिद्ध है, जिससे समझ में आ जाना चाहिए कि प्याज-लहसुन दूषित वस्तुएं हैं!

4)कुछ देर प्याज़ को बगल में दबाकर बैठने से बुखार चढ़ जाता है! प्याज काटते समय ही आंखों में आंसू आ जाते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शरीर के भीतर जाकर यह कितनी अधिक हलचल उत्पन्न करता होगा!?!

5) हवाई-जहाज चलाने वाले 👉पायलटों को जहाज चलाने के 72 घंटे पूर्व तक प्याज़ का सेवन ना करने का परामर्श दिया जाता है, क्योंकि प्याज़ खाने से तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता(Reflexive ability) प्रभावित होती है!

6) शास्त्रों में प्याज़ को “पलांडू” कहा गया है! याज्ञवल्क्य संहिता के अनुसार प्याज एवं गोमांस दोनों के ही खाने का प्रायश्चित है— चंद्रायण व्रत! (इसीलिए श्री जटिया बाबा प्याज़ को गो मांस तुल्य बताते थे!)

7) ब्रह्मा जी जब सृष्टि कर रहे थे, तो दो राक्षस उसमें बाधा उत्पन्न कर रहे थे! उनके शरीर क्रमशः मल और मूत्र के बने हुए थे! ब्रह्मा जी ने उन्हें मारा तो उनके शरीर की बोटियां पृथ्वी पर जहां-जहां गिरीं, वहां प्याज़ और लहसुन के पेड़ उग आए! लैबोरेट्री में टेस्ट करने पर भी प्याज़ और लहसुन में क्रमशः गंधक और यूरिया प्रचुर मात्रा में मिलता है, जो क्रमशः मल मूत्र में पाया जाता है!

8) एक अन्य कथा के अनुसार,भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार द्वारा राहूकेतू का सिर काटे जाने पर उसके कटे सिर से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं थीं,जिनसे प्याज़ और लहसुन उपजे! चूंकि यह दोनों सब्जियां अमृत की बूंदों से उपजी हैं, इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं,पर क्योंकि यह राक्षस के मुख से होकर गिरी हैं, इसलिए इनमें तेज गंध है और ये अपवित्र हैं, जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता! कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मजबूत हो जाता है, लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं!

9)इनके राजसिक तामसिक गुणों के कारण आयुर्वेद में भी प्याज़-लहसुन खाने की मनाही है! 👉प्राचीन मिस्र के पुरोहित प्याज़-लहसुन नहीं खाते थे! चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी प्याज़-लहसुन खाना पसंद नहीं करते!

वैष्णव और जैन पूरी तरह से प्याज और लहसुन का परहेज करते हैं ।

इतने प्रमाण होते हुए भी केवल जीभ के स्वार्थ हेतु प्याज़-लहसुन खाते रहेंगे,तो जड़ बुद्धि कहलाएंगे! इसलिए इनका तुरंत परित्याग करने में ही भलाई है!घरवाले नहीं मानते,तो उन्हें उपरोक्त बातें समझाएँ ।
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खंडन 9/मंडन 1 (प्याज और लहसुन की वायरल पोस्ट का खंडन)

बात करते हैं, प्याज और लहसुन पर आई हुई, वायरल पोस्ट की | आशा है, आप इसे भी पूरा ही पढेंगे | जैसा कि पहले पॉइंट में कहा गया है कि प्याज, लहसुन खाने का असर 27 दिनों तक होता है तो स्पष्ट करना चाहूँगा कि अष्टांग ह्रदय नामक आयुर्वेद ग्रन्थ और अन्य भी आयुर्वेदिक ग्रंथो के अनुसार, केवल प्याज और लहसुन ही नहीं, बल्कि सभी भोजन शरीर में 28 दिन तक रहते हैं और 28 दिन में जाकर, पूर्ण रूप से पचते हैं | पचने का अर्थ है कि किसी भी भोजन को शरीर में पूर्ण रूप से अवशोषित और धातुओं में बदलने में 28 दिन लगते है | अतः ये कोई विशेष बात नहीं है किन्तु इसको खाने के बाद, 28 दिन तक मरने से मनुष्य नरक में जाता है, ऐसा कोई शास्त्रोक्त सन्दर्भ मेरी जानकारी में नहीं है | पोस्टकर्ता ने भी नहीं दिया है, अतः इसे नहीं माना जा सकता है |

अगले पॉइंट में कहा गया है कि प्याज-लहसुन खाने से 55 मर्मस्थानों पर चर्बी जमा हो जाती है अतः इसे नहीं खाना चाहिए | मर्मस्थान यानि शरीर में वो जगहें, जहाँ पर आघात करने से किसी की मृत्यु भी हो सकती है, जैसे अंडकोष, हृदयस्थल आदि | अब चर्बी तो और भी बहुत से अन्न से बढती है, ऐसा तो नहीं है कि केवल प्याज-लहसुन खाने से ही बढती है | जिस भी भोज्य पदार्थ में, वसा होगी, उससे चर्बी बढ़ेगी ही | पहलवान अखाड़े में खूब घी, दूध, बादाम खाते हैं, एक आम मनुष्य से अधिक ही चर्बी उनमें होती है | बहुत से लोग, जो व्यायाम नहीं करते हैं, मोटे हो जाते है, चाहे प्याज-लहसुन खाएं या न खाएं | अतः ये कहना कि इससे ५५ मर्मस्थलों की चर्बी बढ़ जाती है, इसलिए नहीं खाना चाहिए, जमता नहीं है |

पॉइंट 3 को हम अंत में लेंगे, एक विशेष कारण से | आगे बढ़ते हैं, पॉइंट ४ पर | बताया गया है कि प्याज को बगल में दबाने से बुखार आ जाता है और काटने पर आंसू, इससे अंदाजा लगाना चाहिए कि शरीर में कितनी परेशानी उत्पन्न करता होगा | अरे भाई ! हरेक पदार्थ के कुछ भौतिक और रासायनिक गुण होते हैं जैसे कि हम उबले हुए आलू से पतंग चुपका लेते थे तो क्या हम ये कह सकते हैं कि आलू चिपचिपा होता है ? आँतों में जाकर चिपक जाता है ? या फिर हरी मिर्च जीभ से काट लेने पर भी मजे आ जाते हैं, आंसू आने लगते हैं तो सोचो पेट में जाने पर पेट बेचारे का क्या हाल होता होगा !!! अतः इस तर्क में भी कोई ख़ास दम नहीं लगता है | ऐसे ही प्याज में एक ख़ास केमिकल, सल्फेनिक अम्ल बनने के कारण, प्याज के छिलके उतारने पर आंसू आते हैं |

अगले पॉइंट में कहा गया है कि पायलट को 72 घंटे पहले तक प्याज और लहसुन मना होते हैं, जबकि ये भी झूठ है | पायलट को केवल अल्कोहल लेना मना होता है 72 घंटे पहले तक क्योंकि ये एक सीडेटिव होता है और इससे निर्णय क्षमता पर असर पड़ता है | न कि प्याज और लहसुन 😊 | इंडियन एयरफोर्स और भारतीय विमान संघ दोनों ने, प्याज और लहसुन को बैन नहीं किया हुआ है |
अगले पॉइंट में कहा गया है कि याज्ञवल्क्य संहिता में प्याज और लहसुन खाना निषिद्ध कहा गया है और उसके लिए चंद्रायण व्रत बताया गया है | याज्ञवल्क्य संहिता नहीं, याज्ञवल्क्य स्मृति है, ग्रन्थ का नाम | उस ग्रन्थ में निम्न श्लोक प्राप्त होता है –

निषिद्धभक्षणं जैह्म्यम् उत्कर्षे च वचोऽनृतम् ।
रजस्वलामुखास्वादः सुरापानसमानि तु ॥ यास्मृ३.२२९ ॥

जिसके अनुसार यदि कोई निषिद्ध भक्षण जानबूझ कर करता है (निषिद्ध में प्याज और लहसुन को लिया गया है, ऐसा अनुवादकर्ता ने कहा है किन्तु श्लोक में सिर्फ निषिद्ध शब्द प्राप्त होता है, प्याज और लहसुन स्पेसिफिक नहीं किया गया है | ) कुटिलता, उत्कर्ष प्राप्ति के लिए, झूठ बोलता है | रजस्वला स्त्री के मुख का चुम्बन लेता है तो ये सब कार्य मद्यपान के समान हैं | अन्य धर्मग्रंथों यथा मनुस्मृति, बौधायन धर्मसूत्र आदि का भी ऐसा ही मत है और इन सभी के बड़े कठोर प्रायश्चित बताये गए हैं (मृत्युदंड) | गरुड़ पुराण में भी लगभग समान श्लोक प्राप्त होता है | और हाँ, प्याज को संस्कृत में पलाण्डुः कहते हैं किन्तु कहीं कहीं इसको सुकंद भी कहा गया है |

अगले पॉइंट में ब्रह्मा जी की किसी कथा का वर्णन है, जो मुझे नहीं ज्ञात और न ही कहीं मुझे प्राप्त हुई | लेकिन इस पॉइंट में जो बात कही गयी है कि प्याज में सल्फर होता है, इसलिए खराब है क्योंकि यूरिन में भी सल्फर होता है | ये बात हजम नहीं होती क्योंकि जितनी भी हरी सब्जियां हैं, इन सबमें सल्फर अधिक मात्रा में होता है, जैसे कि गोभी, पत्तागोभी, पालक, ब्रोकली आदि | अब ये तो नहीं कहते हैं कि इन सबमें सल्फर ज्यादा है, अतः ये भी नहीं खानी चाहिए !!! अतः ये बात नहीं जम रही |

अतः अभी निषिद्धभक्षण को और स्पष्ट करना बाकी है | इसको आगे अवश्य देखेंगे | अगले पॉइंट में राहु केतु के कटे सिर से निकली रक्त की बूंदों से प्याज की उत्पत्ति बताई गयी है | पूरा इन्टरनेट इस बात से भरा हुआ है कि शास्त्रों में लिखा है कि राहु-केतु के सर काटते वक्त, रक्त की बूंदों से प्याज और लहसुन की उत्पत्ति हुई पर पूरे इन्टरनेट पर एक भी जगह, उस कथा का स्त्रोत नहीं दिया हुआ है | ये कथा बहुत प्रचलित है पर पूरी कथा, जहाँ पर भी मैंने पढ़ी है, वहां इस तरह प्याज और लहसुन की उत्पत्ति का कोई वर्णन नहीं प्राप्त हुआ है | केवल इतना लिखने भर से कि शास्त्रों में लिखा है, काम नहीं चलेगा |

आखिरी पॉइंट में, अलग ही बात लिखी है | उसमें लिखा है कि आयुर्वेद में प्याज और लहसुन खाना मना है कि जबकि ऐसा नहीं है | आयुर्वेद कोई धार्मिक ग्रन्थ नहीं है | उसमें मांस खाना मना नहीं है तो प्याज और लहसुन की तो बात ही क्या ! बल्कि अष्टाङ्गहृदयम् सूत्रस्थानम् अध्याय-६ श्लोक १५२,१५३,१५४,१५५,१५६,१५७ के बाद एक मजेदार टिप्पणी अष्टांगह्रदय में लिखी है – “वक्तव्य- आयुर्वेदशास्त्र में हरीतकी(हरड़), लहसुन तथा शिलाजीत इन तीनों द्रव्यों का विशेष महत्व है।” अष्टांगह्रदय में ही एक श्लोक में लिखा है –

पलाण्डुस्तद्रुणन्यूनः श्लेष्मलो नातिपित्तलः।
कफवातार्शसां पथ्याः स्वेदेऽभ्यवहृतौ तथा॥११२॥

पलाण्डु(प्याज) का शाक- यह लहसुन से कुछ कम गुणों वाला होता है। यह कफकारक है तथा पित्तकारक कम होता है। जबकि इसी श्लोक के आगे लिखा है – “विशेषादर्षसां पथ्याः भूकन्दस्त्वतिदोषलः।“ अर्थात भूकन्द का शाक- यह अत्यन्त दोषकारक तथा दोषवर्धक होता है। यहाँ पर व्याख्याकरता ने भूकंद की व्याख्या जिमीकंद और कुकुरमुत्ते (मशरूम) से की है | अष्टांगह्रदय में ही एक अन्य स्थान पर लिखा है –

आर्द्रिका तिक्तमधुरा मूत्रला न च पित्तकृत।
लशुनो भृशतीक्ष्णोष्णः कटुपाकरसः सरः॥१०९॥

लशुनकद का शाक- इसका कन्द विशेष करके तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य होता है।इसका विपाक कटु होता है। यह सर है, हृदय के लिए तथा केशो के लिए हितकर है, पचने में गुरु, वीर्यवर्द्धक, स्निग्ध, दीपन, पाचन, अस्थिभग्न को जोड़ने वाला, बलवर्धक, रक्त एवं पित्त को दूषित करने वाला है। यह किलास(श्वित्र), कुष्ठ, गुम, अर्श, प्रमेह, क्रिमिरोग, कफविकार, वातविकार, हिचकी, पीनस, श्वास और कास रोग का विनाश करता है। यह रसायन है।

अतः जिमीकंद या मशरूम, ये दोनों तो खाने योग्य नहीं हैं किन्तु प्याज न खाने योग्य है, कम से कम आयुर्वेद ऐसा नहीं कहता है |

इस जगह जाकर, इस पोस्ट के सभी पॉइंट समाप्त हो जाते हैं | उपरोक्त वर्णन के अनुसार, इस पोस्ट के अधिकतर पॉइंट, मनगढ़ंत हैं, जिनका कोई बेस नहीं है | न तो वैज्ञानिक और न ही शास्त्रोक्त |

अब वापिस पॉइंट नंबर 3 पर आइये, जिसमें कहा गया है कि नवरात्रों में, उपवास, तीर्थ आदि पर प्याज और लहसुन का भोजन बनाना निषिद्ध है | ये सही है और इसका कारण कुछ और है | इसका कारण,इस बात से जुड़ा हुआ है कि भगवान् को हम, मीठे का ही भोग क्यों लगाते हैं ? किसी खट्टी, कडुवी चीज का भोग क्यों नहीं लगाते हैं ? क्योंकि हम ईश्वर से, जैसा फल, जैसी कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, वैसी ही चीज, ईश्वर को भोग लगाई जाती है | हम उनसे मीठे के जैसी ही, कृपा चाहते हैं सो मीठे का ही भोग लगाते हैं | प्याज, लहसुन अथवा कोई भी ऐसा पदार्थ जो तामसिक हो, उसका भोग नहीं लगाते हैं | तामसिक माने ? ऐसी चीज, जो कटु हो, तिक्त हो, कसैली हो, जिसमें दुर्गन्ध आती हो, जो खाने में दुष्कर हो, जो किसी को मार कर लाया गया हो आदि | प्याज और लहसुन, दोनों ही तामसिक अन्न हैं | इसीलिए, ये चीजें, ब्राहमण को भी भोज में नहीं दी जाती हैं क्योंकि जैसे अग्नि को हविष्य को देवताओं तक ले जाने वाला वाहक बताया गया है, वैसे ही ब्राहमण के भी भोजन से संतुष्ट होने पर, ईश्वर प्रसन्न होते हैं, ऐसा कहा जाता है |

तामसिक भोजन करने से, बुद्धि भी तामसिकता को प्राप्त होती है अर्थात इससे योग, ध्यान आदि करने में परेशानी होती है | यदि आप प्याज और लहसुन छोड़ देंगे, सात्विक आहार लेंगे तो आपको आध्यात्मिक क्रियाओं में आसानी होगी | प्याज और लहसुन इसी वजह से भगवान को अर्पित नहीं किये जाते हैं और न ही उपवास, त्यौहार आदि में प्रयुक्त होते हैं क्योंकि हम भले ही रोज भगवान् को भोग न लगायें लेकिन त्यौहार आदि पर भोजन का भोग अवश्य लगाते हैं |

इस प्रकार, प्याज और लहसुन विषय पर प्राप्त हुई, सोशल मिडिया पोस्ट का खंडन और मंडन दोनों किया जाता है किन्तु लगभग सभी बातों को झूठ और गलत तरह से तथ्यों को पेश करने के लिए, इस पोस्ट का खंडन किया जाता है | प्याज और लहसुन नहीं खाना चाहिए, मात्र इसका मंडन किया जाता है | अब यदि आपके पास, ये पोस्ट आती है, तो उसे ये खंडन/मंडन प्रेषित कीजिये और अन्य ग्रुप्स पर भी इस जानकारी को शेयर कीजिये ताकि लोगों को भी ये बातें पता चलें |

पं अशोकशर्मात्मज अभिनन्दन शर्मा

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