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वेद

वेदों में अश्लीलता वाली वायरल पोस्ट का खंडन

हमें एक वायरल पोस्ट प्राप्त हुई जो सोशल मिडिया में घूम रही है, जिसमें वेदों के विभिन्न उद्धरण देकर के बताया गया है कि वेद कितने अश्लील हैं और उसमें स्त्री को किस गंदे प्रकार से दिखाया गया है | हमने इस पोस्ट में दिये गए सन्दर्भों को देखा और पाया कि बहुत से सन्दर्भ, मूल ग्रन्थ में मनमाने तरीके से सन्दर्भ से अलग कर दिये गए हैं और उनके मनमाने अर्थ किये गए हैं और जिन लोगों को फिल्मो में, ऑनलाइन मूवीज में गालियों, सेक्स सीन्स, किसिंग सीन्स आदि से कोई समस्या नहीं होती है, वो एक कवि के शब्दों पर प्रश्न उठा रहे हैं, जिन्होंने अब तक के सर्वश्रेष्ठ कहे जाने वाले वेद लिखे हैं | बिना उनको जाने, बिना उनको समझे | और इस पोस्ट में indiatimes की एक पोस्ट लगा दी है, जिसमें उस पोस्ट को लिखने वाली पत्रकार, अपने मन से ही एक कथानक् बना देती हैं कि हमारे मंदिरों में उत्तेजित कलाकारी क्यों की गयी थी… .समस्या तब ही आती है, जब कोई बिना विषय पर सम्पूर्ण अध्ययन किये ही उस पर अपने विचार प्रकट कर देता है, चाहे उस विषय को समझने की उनकी बुद्धि ही न हो | खैर, मंदिरों में ऐसी मूर्तियों के बारे में हम पिछले कुछ खंडन में, विस्तार से लिख चुके हैं अतः उसे पुनः यहाँ रिपीट नहीं कर रहे हैं… यहाँ मात्र पोस्ट में दिये गए वेदों के सन्दर्भों पर ही चर्चा करते हैं |

पहला सन्दर्भ ऋग्वेद का दिया गया है, जिसके ठीक ऊपर लिखा है, वेदों में सेक्स की स्थिति | पोस्टकर्ता ने एक मन्त्र दिया है, जिसका अर्थ  इन्होने गजब का दे रखा है | कहाँ से दे रखा है, कौन से ग्रन्थ से उद्धरित है ये अर्थ, इसका अता पता नहीं है सो हम केवल इस मन्त्र को ही देख पाए | हमने जब मन्त्र देखा और सन्दर्भ देखा तो पता चला कि उस मंडल में यज्ञ की वेदी की बात हो रही है कि यज्ञ की वेदी कैसी हो और कैसे यज्ञ से पहले सभी देवताओं का आव्हान किया गया है | अग्नि की स्तुति हो रही है, यज्ञ से अनेकों देवी देवताओं का आव्हान चल रहा है लेकिन पोस्टकर्ता ने बिना सन्दर्भ को देखे ही, एक मन्त्र का अर्थ दिया है | हमें जो अर्थ मिला पुस्तक Yajurveda: Indology, By Dr. Rekha Vyas जी द्वारा (1*), वो इस मन्त्र का इस प्रकार है –

“जैसे स्त्रियाँ श्रृंगार करके पति को थकानरहित करती हैं, वैसे ही दिव्यद्वार वाली विशाल देवियां, देवताओं के लिए सुगमता से प्रयास करने वाली हों |”

यहाँ यज्ञ की वेदी से देवताओं के आने जाने के लिए, दिव्यद्वार खोलने वाली देवियों की बात हो रही है और उनसे यज्ञवेदी के द्वार खोलने की बात हो रही है पर देखिये, पोस्टकर्ता ने कितनी आसानी से वो बात देख ली, जो बात एक पीएचडी होल्डर को नहीं दिखी | हमने सोचा एक दो जगह और देख लेते हैं, शायद किसी और ने इसका कुछ और अर्थ किया हो, सो हमें यजुर्वेद संहिता में भी यही मन्त्र मिला, जिसका अर्थ इस प्रकार दिया हुआ है –

“जैसे पतिव्रता पत्नियाँ अपने पति के निमित्त अनेक प्रकार से गति (कार्य) करने वाली तथा सुशोभित होकर विश्रांति प्रदान करती हैं वैसे ही देवत्व सम्पन्न महान द्वार देवियाँ रिक्त स्थान वाली, सबको आने जाने का मार्ग देने वाली तथा देवताओं को सुगमता से प्राप्त होने वाली हों |” – (2*)

अब उपरोक्त भाषा में और “वेदों में सेक्स की स्थिति” हेडिंग में कितना अंतर है, ये आप देख सकते हैं | वो भी, जब यज्ञ में देवताओं और देवियों का आवाहन हो रहा हो | ऐसे मूढ़ मति इन्टरनेट सेवी यदि वेदों में जानबूझ कर कुछ ढूढेंगे भी तो कुछ कल्याण की बात नहीं मिलेगी, हजारों पृष्ठ के वेदों में इनको, किन्तु अपने मूर्खतापूर्ण विचारों को पुष्ट करने के लिए, इस प्रकार के सन्दर्भ, जो कि विषय से बिल्कुल काट कर दिखाए गए हों, ये अवश्य ढूंढ लेते हैं |

यदि इस मन्त्र की हीन से हीन व्याख्या भी की जाए तो कह सकते हैं कि जिस प्रकार पत्नी, अपने पति के लिए स्वयं को खोलती है अर्थात सम्पूर्णता से, उसी प्रकार, हे द्वार देवियों आप भी देवताओं के लिए इन द्वारों को खोलें |

जिसने ये पोस्ट बनाई है, उसने तो चलो वेदों का क्या ही अध्ययन किया होगा लेकिन मजेदार बात है कि जिसने इनको शेयर किया है, उन्हें वेदों आदि को पढने में कोई रूचि ही नहीं है कि उनमें किस प्रकार कर्मकांड, ज्ञान, ज्योतिष आदि दिया गया है और उससे वो क्या कुछ ग्रहण नहीं कर सकते हैं, उन्हें बस ऐसे मन्त्र दीखते हैं (इन्टरनेट पर वेदों में अश्लीलता आप गूगल कीजिये, हजारों बार यही अर्थ आपको मिल जाएगा), जिनका तीन पांच किया जा सके क्योंकि उद्देश्य वेदों को जानना नहीं बल्कि छिद्रान्वेषण करना है और उसके लिए ही इस प्रकार की पोस्ट फैलाई जाती हैं | जिन्होंने वेदों को कभी छुआ भी नहीं हो, वो ऐसी पोस्ट को बड़े ज्ञान की बातें मान कर, शेयर करते हैं | (बाकी यास्क का जो अर्थ इन्होने लक्ष्मण स्वरूप जी के नाम से दिया है, वो प्राप्त नहीं हुआ है किन्तु हमने अन्य दो सन्दर्भों से इस मन्त्र का अर्थ आपको बता दिया है |

अगले सन्दर्भ में यजुर्वेद के 19.88 में जो अर्थ दिया है (मन्त्र भी नहीं दिया) जिन्होंने ये पोस्ट शेयर की है, उनका धन्यवाद क्योकि उनकी वजह से मैंने युजुर्वेद का 19 वाँ अध्याय इस मन्त्र तक कर लिया, जिसमें अश्विनी कुमारों और माता सरस्वती जी ने किस प्रकार इस शरीर की रचना की और किस प्रकार भिन्न भिन्न अंगो का क्या अर्थ है, समझ में आया | 19.88 का अर्थ निम्न अनुसार है, जो मेरे पास उपलब्ध यजुर्वेद संहिता की सॉफ्ट कॉपी से लिया गया है, इसका लिंक भी गूगल ड्राइव से उपलब्ध करा दूंगा ( ये जानते हुए भी कि कोई वेदों को नहीं पढता है और ऐसी बकवास पोस्ट से ही लोग वेदों को समझने का प्रयास करते हैं और जीवन में कभी वेदों को नहीं समझ पाते हैं) – 3*

“इंद्रदेव के इस विराट शरीर में मुख और मस्तक सत्य से पवित्र हैं | मुख में स्थित जिव्हा सत्य वाणी और सत्य स्वाद से पवित्र है | दोनों अश्विनीकुमार और देवी सरस्वी के द्वारा इन अंगों के संचालन से पवित्रता व्याप्त होती है | शरीर में गुदाद्वार मॉल विसर्जित कर शरीर को पवित्र और शांत बनाने के लिए है और बल शारीरिक दोषों को बाहर निकालने वाले भिषक (उपचारकर्ता) रूप होते हैं | शरीर में “वस्ति” मूत्र स्थान और वेगवान वीर्ययुक्त शेष प्रजनन इन्द्रिय के रूप में है |”

अब आप बताएं इसमें कहाँ स्त्री को उल्टा-सीधा लेटना कहा गया है ? कहाँ उसे वीर्य ग्रहण करने वाली कहा गया है ? इन्टरनेट पर जब आप सर्च करेंगे तो आपको कुछ मुस्लिमो द्वारा, आर्यसमाजियों के आक्षेप के जवाब में, इस प्रकार के अर्थ शेयर किये गए हैं और हमारे तथाकथित हिन्दू, इस प्रकार की पोस्ट को शेयर करते हैं, जबकि उन्होंने वेद तो छुए नहीं होते लेकिन इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण पोस्ट अवश्य उन्हें वेदों के नाम पर प्राप्त हो गयी हैं, जिससे उन्होंने समस्त वेदों को समझ लिया है और उन्हें वेदों को पढने की आवश्यकता ही शायद नहीं रह गयी है |

अगले सन्दर्भ में ये महोदय कहते है अथर्ववेद 14.2.38 में लिखा है – “हे मनुष्यों, तुम बलवान हो। आप अपने और अपने परिवार की इस महिला शुभचिंतक को बच्चों की खरीद की भावना से प्रेरित करते हैं। यह महिला एक ऐसी इकाई है, जिसमें पुरुष वीर्य-बीज बोते हैं, जो संतान की इच्छा करते हुए अपनी जांघ को अपने पति की ओर फैलाते हैं और जिसमें आप और हमारे जैसे पति बच्चों की इच्छा के साथ अंग फेंकते हैं। हे सुखी वर-वधू अपनी पत्नी की जांघ पर चढ़कर हाथ से स्पर्श करें, आपकी पत्नी प्रसन्नचित्त भावना से। आप दोनों बच्चों के साथ खुशी से खुश हुए… ”” त्र। आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री (आर्य समाज)

ये ऋचा जिस सन्दर्भ से है, उसे विवाह प्रकरण सूक्त कहते हैं | इसके मन्त्र दाम्पत्य को लक्ष्य करके कहे गए हैं (जिन लोगों को लगता है कि वेदों में मात्र कर्मकांड हैं, वो अपनी आँखें पोंछ लें क्योंकि वेदों में ही धनुर्वेद, ज्योतिष, आयुर्वेद आदि सन्निहित है अतः जो लोग इसे केवल पूजा के मन्त्रों की तरह देखते हैं, उन्हें अभी और अध्ययन की आवश्यकता है | वेदों में सभी आवश्यक ज्ञान, जो मनुष्य को ज्ञात होने चाहिए, उन सभी का सम्पूर्ण उल्लेख है |) जिसमें वर और वधुओं को विभिन्न आशीर्वाद दिये जाते हैं और उनके द्वारा उत्तम संतान पैदा किये जाने की कामना की जाती है | जिसमें कहा गया है कि जो वधु है, वो सरस्वती स्वरूप स्त्री है और पतिगृह में प्रतिष्ठा को प्राप्त करे, घर की साम्राज्ञी है, उसका पति विष्णु जी के सामान है और वो (वधु) स्वयं लक्ष्मी जी के समान है | उसके ऊपर भाग्यदेवता की अनुकम्पा रहे और वो श्रेष्ठ संतति का लाभ प्राप्त करे…. इसको यहाँ कहने का तात्पर्य है कि यदि आप सम्पूर्ण सन्दर्भ देखते हैं तो आपको विषय के बारे में पता चलता है कि वहां कोई सेक्स विद्या नहीं दी जा रही है अपितु दाम्पत्य जीवन में जो महत्वपूर्ण है, उसकी शिक्षा और कामना की जा रही है | जिस वधु को देवी स्वरूपा बताया जा रहा है, क्या कोई उसके लिए, ऐसा कह सकता है कि अपनी पत्नी की जांघ पर चढ़कर हाथ से स्पर्श करें ?

अब मैं वो मन्त्र यहाँ देता हूँ, जिसके सन्दर्भ में महोदय ने जंघा तो लिख दिया लेकिन मन्त्र नहीं लिखा |

तां पूषच्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या३ वपन्ति।
या न ऊरु उशती विश्रयाति यस्यामुशन्तः प्रहरेम शेपः।। ( अथर्ववेद १४/२/३८)

“हे पूषन (पोषण में समर्थ) ! आप उस कल्याणकारिणी स्त्री (उर्वराशक्ति) को प्रेरित करें, जिसमें मनुष्य बीज वपन अर्थात गर्भाधान करते हैं | वह प्रेम प्रदर्शित करती हुई (उल्लसित होती हुई – अर्थात कष्ट में न हो, किसी पीड़ा में न हो अपितु स्वेच्छा से ही प्रेम प्रदर्शित करती हो) अपने ऊरु प्रदेश को विस्तारित करती है (ध्यान दें शब्दों पर) | उसके गर्भ में उत्साहपूर्वक (फलित होने के विश्वास से अर्थात संतान उत्पत्ति के लिए ही) बीज स्थापित किया जाए |” – 3*

इस मन्त्र में मुख्यतः 2 बातें देखने की हैं एक तो ये कि पत्नी स्वेच्छा से ही पति से समागम करे, बिना किसी प्रेशर के अथवा मानसिक तनाव के | दूसरी बात, पति और पत्नी केवल मौज-मस्ती अथवा क्षणिक आनंद अनुभूति के लिए नहीं, अपितु मात्र संतानउत्पप्ति के लक्ष्य से ही समागम करें | अब आप उन महोदय के अर्थ को देखें कि  “यह महिला एक ऐसी इकाई है, जिसमें पुरुष वीर्य-बीज बोते हैं, जो संतान की इच्छा करते हुए अपनी जांघ को अपने पति की ओर फैलाते हैं और जिसमें आप और हमारे जैसे पति बच्चों की इच्छा के साथ अंग फेंकते हैं। हे सुखी वर-वधू अपनी पत्नी की जांघ पर चढ़कर हाथ से स्पर्श करें, आपकी पत्नी प्रसन्नचित्त भावना से।“ – क्या इस प्रकार के मगढ़न्त अर्थ में और ऊपर जो अथर्ववेद संहिता से अर्थ दिया गया है इन दोनों में कोई अंतर नहीं है ? नेट पर आप ढूढेंगे तो आपको इससे भी घृणित रूप इस के अर्थ में मिल जाएगा, जहाँ लिखा है – “वह अपनी जंघाओं को फैलाए और हम उनमें लिंग से प्रहार करें.” अब आप सोचिये कि कैसे वेदों के महत्वपूर्ण श्लोको को इन्टरनेट के माध्यम से, लोगों के बीच में कुत्सित करके प्रस्तुत किया जा रहा है | बहुधा लोग वेद नहीं पढ़ते हैं, अतः इन्टरनेट पर मिले इस फर्जी कंटेंट से ही वेदों को अश्लील मानने लगते हैं और सोचते हैं कि वेदों में तो यही सब होगा, अरे वेदों में तो अतुल्य ज्ञान है, इसके आगे के, पीछे के, मन्त्रों को भी पढ़िए… परिवार के बारे में, दाम्पत्य के बारे में कितना महत्वपूर्ण सूत्र है, देखिये…कि मस्ती के लिए सेक्स नहीं करना है (अतः यहाँ सेक्स की बात नहीं हो रही है, सेक्स तो क्षणिक आनंद के लिए, मौज मस्ती के लिए पुरुष और स्त्री, जरूरी नहीं कि पति पत्नी ही हों, उसे सेक्स कहा जाता है ) यहाँ बात दाम्पत्य की हो रही है और बताया गया है कि ये एक महत्वपुर्ण क्रिया है, जिसमें पुरुष और स्त्री दोनों का ही स्वेच्छिक और आनंद में होना अनिवार्य है और आपस में समबन्ध तभी करना है जब संतान उत्पत्ति की अभिलाषा हो, अन्यथा नहीं | पर आजकल लोग सेक्स को पशुपृवृत्ति की तरह प्रयोग करते हैं… क्या मन्त्र में सेक्स के बारे में लिखा गया है ?

एक बात और, जिस प्रकार अर्थ किया गया है नेट पर और जिस प्रकार अर्थ किया गया है संहिता में, इसमें एक फर्क और है, जो आपको जानना चाहिए | किसी भी काव्य में आप उरु और जंघा और जांघ… तीनो शब्दों का प्रयोग कीजिये | आप पायेंगे कि जिस काव्य में उरु का प्रयोग है वो सौम्य है, जिसमें जंघा है वो वीर रस को इंगित करती है और जिसमें जांघ लिखा हुआ है, वो हेय को इंगित करती है | कटु शब्द का प्रयोग काव्य में अथवा उसके अर्थ करने में प्रयोग नहीं करना चाहिए | ये काव्य में पढ़ाया जाता है | जिन्हें इन बातों का ज्ञान नहीं होता है, वो लोग, इस प्रकार का अर्थ करते हैं, जैसे कुछ मुस्लिम अथवा कुछ अनर्थ करने वाले | देखिये – मैथिलि शरण गुप्त जी, “साकेत” में क्या लिखते हैं – रोक सकता हूँ ऊरूओं के बल से ही उसे, टूटे भी लगाम यदि मेरी कभी भूले से । —साकेत, पृ॰ ७३ | आप सोच रहे होंगे कि मैं कहाँ वेदों से कवित्त और काव्य पर आ गया पर ये समझना आवश्यक है | जब तक आपको भाषा के बारे में नहीं पता होगा तब तक आप जांघ, जंघा और उरु को एक जैसा ही समझते रहेंगे और शब्दों के फेर में पड़कर अर्थ का अनर्थ करते रहेंगे अथवा पढ़ते रहेंगे | ऐसी सारगर्भित बातों के सन्दर्भ में, भाषा की चर्चा समीचीन ही कही जायेगी और पाठक को अपना ज्ञानार्जन करते रहना चाहिए | ये न सोचे कि खंडन ही तो करना है यार, 10-२० लाइन में खंडन नहीं कर सकते क्या ? ये विषय गंभीर हैं, गूढ़ हैं, वेदों के बारे में है और वेदों की बातें आएँगी तो आपका लेवल भी वहां तक होना चाहिए कि आप उस विषय में डुबकी न मर सकें तो कम से कम उतर तो सकें ही |

आगे पोस्ट के लेखक ने अथर्ववेद 14.2.71 का सन्दर्भ दिया है और लिखा है और उसके अनुसार इसका अर्थ है – “हे वधू, मैं अमाह हूं और तुम सा मैं मैं समन हूं और तुम ऋक् और मैं सूर्य और तुम पृथ्वी। हम दोनों को एक साथ एकजुट करें और संतान की घोषणा करें। ”त्र। वैद्यनाथ शास्त्री (आर्य समाज)

अव्वल तो इसमें कोई गलत बात तो नहीं लिखी है.. संतान उत्पत्ति कोई पाप नहीं है | घरो में भी बातें होती हैं कि हाँ भाई, कब पापा बनोगे या कब मम्मी बनोगी तो क्या वो अश्लीलता हो गयी ? पापा मम्मी बनने की प्रक्रिया का तो कहीं उल्लेख ही नहीं है जबकि सेक्स जो होता है, उसमें माता पिता बनने से कोई लेना देना नहीं होता.. उसका एकमात्र उद्देश्य होता है, स्त्री पुरुष के अन्तरंग संबंधो का प्रदर्शन | उसे कहते हैं अश्लीलता | अश्लीलता की परिभाषा भी यदि लेखक को नहीं पता है और वो बता रहा है कि वेदों में अश्लीलता है, इससे उसके ज्ञान के बारे में, बौद्धिक क्षमता के बारे में, क्या ही कहा जाए | खैर, हम इस मन्त्र पर आते हैं | अथर्ववेद में जो मन्त्र और अर्थ है, वो इस प्रकार है |

अमोऽहमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यक् त्वं धौरहं पृथिवी त्वम् । ताविह सं प्रजामा जनयावहै |

इसका अर्थ जो मेरे पास उपलब्ध अथर्ववेद संहिता है उसके अनुसार है – हे नारी ! मैं पुरुष प्राणतत्व विष्णु हूँ तो आप रयि {ये शब्द मुझे स्पष्ट पढने में नहीं आ रहा है, पर इसके आगे कोष्ठक में लक्ष्मी लिखा है अतः इस शब्द का अर्थ स्पष्ट है} (लक्ष्मी) हैं | मैं सामगान हूँ तो आप ऋग्वेद की ऋचा हैं | मैं द्युलोक (सूर्य शक्ति) हूँ तो आप सहनशीलता की प्रतीक पृथ्वी हैं, हम दोनों पारस्परिक स्नेह से युक्त होकर श्रेष्ठ संतति को जन्म दें |- 3*

अब किसी अक्ल से पैदल व्यक्ति को ही इसमें अश्लीलता दिख सकती है | इसमें तो पत्नी के महत्व को और पत्नी को पति का पूरक बताया गया है | उनका समबन्ध सूर्य और पृथ्वी जैसा बताया गया है |पत्नी को पृथ्वी जैसा क्यों बताया गया है ? क्योंकि सूर्य समुद्र से वाष्पीकरण करके बादल बनाता है, उन बादलों से बारिश होती है और उस बारिश से तृप्त होकर धरा गर्भवती होती है और विभिन्न वृक्षों को, लताओं को, वनस्पतियों को अपने गर्भ में धारण करती है और समय आने पर उनको पैदा करती है | ऐसा बेहतरीन और कलात्मक उदाहरण को यदि कोई अश्लीलता दिखती है तो वो अपनी बुद्धि का चेकअप कराना चाहिए, न कि वेदों की मीमांसा करने बैठना चाहिए |

इसके आगे पोस्ट का लेखक, वेदों में अश्लीलता विषय को समाप्त करके, वेदों में ट्रांसजेंडर का विषय प्रारंभ करता है | हालांकि हमें पता है कि उसने कैसे वेदों के अर्थ का अनर्थ किया है और मनमाना अर्थ मान लिया है | अतः हम अब इसकी इस पोस्ट पर समय व्यर्थ करना नहीं चाहते हैं, पाठकों के लिए इतना प्रमाण ही काफी है कि इसकी आगे की बातें कितनी सार्थक या व्यर्थ होंगी | पूरे चावल को कौन चेक करता है, दाने से ही पता चल जाता है कि चावल कितना पका है |

अब इस विषय को कुछ स्पेशल लेकिन महत्वपूर्ण बातों के साथ समाप्त करता हूँ |

सेक्स – स्त्री और पुरुष के अन्तरंग समबन्ध, चाहे वो किसी भी उद्देश्य से किये गए हों, को कहते हैं | चाहे वो अविवाहित करें, चाहे वो दूसरी स्त्री से प्रेम प्रसंग में हो अथवा वैश्या के साथ हों | मात्र जानवरों की तरह क्षणिक सुख प्राप्त करने की इच्छा को सेक्स कहते हैं |

संतानोपत्ति कहीं से भी सेक्स नहीं है | पश्चिमी विज्ञान हर बात को एक तरह से तौलता है, पर हमारे शास्त्रों में संतानोपत्ति एक धार्मिक क्रिया है | जीवन का एक शुभ पहलू है कि हम आगे संतान पैदा करते हैं और ईश्वर के कार्यों को आगे बढाते हैं, जिसके लिए उसने स्त्री और पुरुष को बनाया | हमारे यहाँ विवाह ही इसलिए किया जाता है कि पति और पत्नी, उत्तम और श्रेष्ठ संतान को जन्म दें न कि मजे के लिए बार बार समागम करें (पश्चिमी सभ्यता के अनुसार ईश्वर ने मनुष्य और स्त्री को मात्र सम्भोग करके मजे लेने के लिए बनाया है)| हमारे यहाँ वर्ष में एक बार पत्नी से समागम करने वाले को ब्रह्मचारी माना गया है, ये स्टैण्डर्ड था, हमारे जीवन का | पशुओं (पश्चिमी प्रवृत्ति) वाले हमें सिखायेंगे कि संतानोत्पत्ति सेक्स है ? अब हमें ये उनसे जानना पड़ेगा ? हतभाग्य, यदि हम ऐसे मूर्खों के कहे से, प्रकृति के एक श्रेष्ठ कार्य को, सेक्स जैसी घृणित क्रिया समझते हैं |

इसके आगे अश्लीलता को भी समझना आवश्यक है | अश्लीलता होता है, स्त्री और पुरुष के अन्तरंग संबंधो अथवा क्षणों को किसी भी प्रकार से सार्वजनिक करना | आज से मात्र 60 वर्ष पहले तक, फिल्मो में चुम्बन नहीं दिखाते थे ? फूलों को एक दुसरे पर झुका देते थे !  क्यों ? क्योंकि चुम्बन का सार्वजनिक प्रदर्शन अश्लीलता है | लेकिन उसके बाद हम मोडर्न होते गए, विकसित होते गए और फिल्मो में हमने गालों पर चुम्बन, फिर होठों पर चुम्बन (राजा हिन्दुस्तानी से शुरुआत शायद, उससे पहले फिल्मो में होठों पर चुम्बन नहीं दिखाया जाता था), फिर पलंग पर एक पति पत्नी का नग्नावस्था सा दिखाकर चादर ओढ़कर लेटे रहना और फिर और मॉडर्न हुए तो रतिक्रियाओं का प्रदर्शन यथा पुरुष को स्त्री के ऊपर चढ़ा हुआ दिखाना आदि दिखाया जाने लगा | देखिये… ये होती है अश्लीलता, जिसे हम और हमारे बच्चे देख रहे हैं | हम अभी इससे भी उन्नत हो चुके हैं और अब हम नाटकों तक में अश्लील और भद्दी गालियों को देखने के लिये स्वयं को ढाल चुके हैं | बस सडक पर रतिक्रिया करना बाकी रह गया है… वो भी जल्द ही हो जाएगा | पर पोस्ट करने वाले को, इस सब में अश्लीलता नहीं दिखती है, कहाँ दिखती है ? वेदों में ? गजब !

वेदों में खोट ढूढने वाले मंदबुद्धियों ! वेदों का सम्पूर्ण अध्ययन करो बजाय उसमें खोट ढूढने के | जो व्यक्ति माँ बाप में श्रद्धा न रख कर, उनके अन्तरंग संबंधो के बारे में सोचता है (आजकल बच्चे आपस में बोल देते हैं कि तू कैसे पैदा हुआ है ? तेरे माँ बाप भी तो सेक्स करते थे, तभी तो तू पैदा हुआ है, ऐसा मैं सुन चूका हूँ) ऐसे मूढ़ और मंद बुद्धि बालक जीवन में हो सकता है किसी बड़ी पदवी पर पहुच जाएँ किन्तु श्रेष्ठ मनुष्य बनेंगे, इसमें सदैव संशय रहेगा | इसी प्रकार जो मनुष्य वेदों में श्रद्धा न रखकर, केवल उसमें खोट ढूढंता है, उसे कुछ हासिल नहीं होता | वो हीरे के पास जाकर भी, उसे पत्थर समझकर फेंक दे रहा है | ये तुम्हारा दुर्भाग्य है कि ऐसे बेहतरीन, सभी प्रकार के ज्ञान, दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेद आदि को अपने अन्दर समेटने वाले वेदों में तुम्हें मात्र अश्लीलता ही प्राप्त हुई |

अंत में – इस पोस्ट के पढने वाले पाठकों से करबद्ध निवेदन है कि व्हात्सप्प, फेसबुक की पोस्ट से, अपने वेदों को समझने का प्रयास न करें | आप वास्तव में वेद नहीं पढ़ रहे हैं अपितु उस पोस्टकर्ता की कुंठा पढ़ रहे होते हैं | यदि आपको सच में अपने शास्त्रों में, वेदों में श्रद्धा है तो उनका अध्ययन स्वयं करें और स्वयं अपने मत बनाएं बजाय दूसरों के कहे से, अपना मत बनाना शुरू कर दें | जैसे एक पागल की हरकतें देखकर, बाकी के पागल भी मतवाले हो जाते हैं, ठीक ऐसे ही, ऐसी पोस्ट पढ़कर, जिसने वेदों को कभी तिनके से तक न छुआ हो, जिसने कभी वेदों की एक ऋचा पर मंथन, चिन्तन न किया हो, वो वेदों पर जजमेंट सुनाने लगता है | अतः सभी से निवेदन है कि अपने शास्त्रों/वेदों को ज्ञानियों के सानिध्य में बैठकर अध्ययन करें न कि फेसबुक और व्हात्सप्प पर आ रही किसी भी बकवास को वेद समझें | पुनः कहता हूँ, वो वेद नहीं है, मात्र किसी की कुंठा है, उसके मूर्खतापूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति का जरिया है जैसे आप नेट पर “वेदों में अश्लीलता” गूगल कीजिये तो आपको अनेकों लेख मिल जायेंगे, जो मुस्लिमों ने पोस्ट किये होंगे अथवा अन्य इसी प्रकार के नाजानकर लोगों ने, अपने स्वार्थो की पूर्ती के लिए, आपको भरमाने के लिय पोस्ट किये हैं |

क्या आपको मूर्ख बनाना इतना आसान है ? आपके ही वेदों के बारे में ? यदि हाँ तो क्यों ? सिर्फ इसलिए कि आपने उनका स्वयं अध्ययन नहीं किया | आज ही प्रण लीजिये कि शास्त्रों और वेदों को सोशल मिडिया की पोस्ट से नहीं समझेंगे और न ही उन पर संदेह करेंगे अपितु स्वयं अध्ययन करना प्रारम्भ करेंगे | कुछ भी प्रारम्भ कीजिये, कोई भी पुराण लीजिये, देखिये उनमें कैसा खजाना है | आपको समझ आएगा कि हमारे ऋषियों का चिन्तन कितना विस्तृत है | (किसी नए पढने वाले को वेद पढने की सलाह मैं नहीं देता क्योंकि वो भी, वेदों का सही सही अर्थ नहीं समझ सकता है, बुद्धि के उतना खुला न होने की वजह से, अतः पहले पुराण पढना श्रेयस्कर है – ऐसा मेरा मत है)

आपने इस आलेख को पढ़ा आपका धन्यवाद | यदि आपको भी ऐसी कोई वायरल पोस्ट प्राप्त होती है तो ये उत्तर अथवा हमारी वेबसाइट का लिंक, जो नीचे हुआ है , उसे प्रत्युत्तर में भेजने वाले को अवश्य प्रेषित करें और वेदों के ज्ञान को विधर्मियों से बचाने में अपना सहयोग अवश्य दें और नेट पर भी जहाँ जहाँ, ये लेख मिले, उन लोगों को ये लिंक देंवे ताकि उनको भी समझ आये कि वेद क्या हैं |

पं अशोकशर्मात्मज अभिनन्दन शर्मा

सन्दर्भ सूत्र –
1* . https://books.google.co.in/books/about/Yajurveda.html?id=PztmDwAAQBAJ&redir_esc=y

2* https://hindureligion1.weebly.com/uploads/9/0/4/5/90454029/yajurved_c_page_291-435.pdf

3* https://drive.google.com/file/d/0Bwe2SJkVJfBHRTR2Wk8zeGxmRWs/view?usp=sharing

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