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युग सहस्त्र योजन पर भानु वाली बात सही है या गलत !

All Questionsयुग सहस्त्र योजन पर भानु वाली बात सही है या गलत !
1 Answers
apsplace Staff answered 3 months ago

आस्था का गणित
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आस्था का गणितीय क्षमता से व्युत्क्रमानुपाती संबंध होता है। अर्थात् आस्था की प्रबलता तार्किक/गणितीय क्षमता को घटाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि आस्था से मन में एक प्रकार की निश्चिंतता जन्मती है, जिससे गणितीय क्रियाओं के लिए आवश्यक सावधानी का हनन होता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को दोषपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होने लगते हैं।

मैं इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करूँगा। एक बार मैंने ट्रेन में यात्रा करते समय कुछ लोगों को भारतीय धर्मग्रंथों में छिपे विज्ञान पर चर्चा करते हुए सुना। उनमें से एक व्यक्ति कह रहा था कि वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से सूर्य की दूरी को बड़ी देर में पता लगाया है, जबकि तुलसीदास जी ने सैकड़ों साल पहले ही हनुमान चालीसा में इसका उल्लेख कर दिया था। यह कहकर वह व्यक्ति हनुमान चालीसा की इस पंक्ति को संगीतमय ढंग से गाने लगा-

“जुग सहस्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।”

दूसरे व्यक्ति ने कहा कि वैज्ञानिकों ने हमारे ग्रंथों से ही जानकारियां चुराकर अपने नाम से प्रचारित कर दी हैं। यह सुनकर एक व्यक्ति ने सूर्य और पृथ्वी की दूरी वाले प्रकरण को थोड़ा ठीक से समझने की जिज्ञासा व्यक्त की। तब उनमें से एक धीर-गंभीर दिखने वाले व्यक्ति ने बोलना आरम्भ किया। उसने कहा कि जुग यानि युग का अर्थ कलियुग है, जो 12000 वर्षों का है। इसी प्रकार सहस्त्र का अर्थ 1000 और जोजन यानि योजन का अर्थ 12.5 किलोमीटर है। इन तीनों को आपस में गुणा करने से 15 करोड़ किलोमीटर आता है, जो पृथ्वी से सूर्य की दूरी है। यह सुनकर वहाँ बैठे लोग आश्चर्य से उस व्यक्ति का मुख देखने लगे। उनमें से कुछ मुखर लोगों ने उस व्यक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की। जब चर्चा थोड़ी और आगे बढ़ी तो पता चला कि वह धीर-गंभीर व्यक्ति किसी महाविद्यालय में भौतिक विज्ञान का अध्यापक था। मैं यह जानकर बड़ा विस्मित हुआ और सोचने लगा कि एक भौतिकी का अध्यापक किसी भौतिक राशि की गणना करते समय ऐसी भयंकर भूल कैसे कर सकता है? परंतु मैं चुप रहा, क्योंकि उस समय मेरी वाद-विवाद करने की इच्छा नहीं थी।

उस दिन से लेकर आज तक मुझे ऐसे अनेक लोग मिल चुके हैं जो ‘जुग सहस्त्र जोजन पर भानु’ के संबंध में उस अध्यापक के समान ही सोचते हैं। संभव है कि यह लेख पढ़ने वालों में से भी कुछ लोग ऐसा ही मानते हों और सोच रहे हों कि मुझे उस अध्यापक की गणना में कौन सी भूल दिख गई? आइये इसे समझते हैं।

उपर्युक्त गणना इस प्रकार की गई है-
पृथ्वी से सूर्य की दूरी = युग×सहस्त्र×योजन

युग का मान 12000 वर्ष, सहस्त्र का 1000 तथा योजन का 12.5 किमी रखने पर,

=> 12000×1000×12.5
=> 150000000
=> 15 करोड़
=> इस प्रकार पृथ्वी से सूर्य की दूरी 15 करोड़ किमी सिद्ध हुई।

इस गणना को बहुत से लोग, विशेषकर आस्थावान, सही समझेंगे। लेकिन इसमें गणित के आधारभूत नियमों का उल्लंघन है। दो भिन्न प्रकार की भौतिक राशियों का गुणा या भाग करने पर उन दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार की भौतिक राशि प्राप्त होती है। यहाँ तक कि समान भौतिक राशियों को गुणा करने पर भी कोई भिन्न भौतिक राशि प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ, दूरी को दूरी से गुणा करने पर दूरी नहीं बल्कि क्षेत्रफल प्राप्त होगा-

A मी×B मी = AB मी^2 (क्षेत्रफल)
इसी प्रकार, द्रव्यमान को त्वरण से गुणा करने पर द्रव्यमान या त्वरण नहीं बल्कि बल प्राप्त होगा-
A किग्रा×B मी/से^2 = AB किग्रा-मी/से^2 (न्यूटन या बल)

पृथ्वी से सूर्य की दूरी की उपर्युक्त गणना में इस नियम का पालन नहीं हुआ है। सही गणना इस प्रकार होगी-
=> युग×सहस्त्र×योजन
=> 12000 वर्ष × 1000 × 12.5 किमी
=> 150000000 वर्ष-किमी
परंतु दूरी का मात्रक ‘वर्ष-किमी’ नहीं है। दूरी ही नहीं बल्कि यह किसी भी भौतिक राशि का मात्रक नहीं है। अतएव यह गणना दोषपूर्ण है।

यह गणना इसलिए भी दोषपूर्ण है क्योंकि इसमें युग और योजन का मान मनगढ़ंत लिया गया है। वैदिक धार्मिक साहित्य में चार युग माने गए हैं, जिनमें से किसी की भी अवधि बारह हजार वर्ष की नहीं है। इसी प्रकार योजन का मान बिना किसी स्पष्ट आधार के ही 12.5 किलोमीटर ले लिया गया है। यह सब तिकड़म इसलिए किया गया है कि उपर्युक्त गुणनफल 15 करोड़ लाया जा सके। यहाँ यह जान लेना रोचक होगा कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी, पृथ्वी द्वारा सूर्य के दीर्घवृत्ताकार परिभ्रमण के कारण सदा परिवर्तित होती रहती है। पृथ्वी और सूर्य के मध्य की सबसे कम दूरी चौदह करोड़ सत्तर लाख किलोमीटर तथा सबसे अधिक दूरी पंद्रह लाख बीस लाख किलोमीटर होती है।

Answered by – Mr. Siddharth Singh

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