अतिथि देवो भव,सर इसको कैसे समझें,कृपा कर हमारे अज्ञान को दूर करे जिससे हम अतिथि को द्रव माने और उसकी सेवा कैसे और कोस भाव से करे जानें।🙏

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apsplace Staff answered 3 months ago

श्रीमान आशीष जी,
अतिथि का अर्थ होता है, जिसके आने की कोई तिथि ज्ञात न हो | इसमें बहुत सी और भी कंडीशन जुडी हुई हैं, जैसे कि अतिथि वो होता है, जो जान-पहचान का ना हो, रिश्तेदार भी न हो | मतलब कुल मिला कर ऐसा व्यक्ति, जिसे आप जानते-पहचानते न हो, पहले से | ऐसा यदि कोई व्यक्ति आपके घर आये, बिना आपकी पूर्व सूचना के तो उसे अतिथि कहा जाता है |

जो व्यक्ति को अतिथि को बिना खिलाये, स्वयं खाता है, वो पाप ही खाता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है | इसका अर्थ है कि रोज, किसी न किसी, अपरिचित को बुलाकर, सेवा भाव से, उसे पेट भरकर भोजन करा कर, तब ही शाम को स्वयं भोजन करना चाहिए | भोजन कराने के बाद उससे पूछना चाहिए कि श्रीमान, आपको भोजन से संतुष्टि तो हुई न ! आप भूखे तो नहीं रह गए | बदले में, उस अतिथि के लिए कर्तव्य है कि वो आशीर्वचन कहे | पुराने जमाने में, लोग तीर्थाटन पर जाते थे और ऐसे ही लोगों को, अपने घर लाकर जिमाया जाता था पर अब तो लोग होटलों में रुकते हैं, किसी के घर जाते नहीं किन्तु अब भी आप, शाम को यदि किसी भी व्यक्ति को घर में लाकर, भोजन कराकर फिर ही भोजन करते हैं तो आप बड़ा पुण्य अर्जित करते हैं | ये बात पहले घर में सभी जानते थे और इसी को धर्म मानते थे लेकिन अब तो लोग आराम को ही अपना धर्म मानते हैं, पुण्य कमाने की जगह धन कमाने और उसे बचाने में ही सारी ताकत खर्च हो जाती है अतः आप अपने घर पर मेहमान को लाकर खिलाने का तो सोच ही नहीं सकते क्योंकि श्रीमती जी नहीं मानेगी किन्तु यदि बचपन से ही ऐसे संस्कार दिए जाएँ तो घर में बड़ी बढ़ोतरी होती है और पुण्य कमाने का एक उत्तम साधन प्राप्त होता है |

अभिनन्दन शर्मा