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कलियुग की प्रवृत्ति का वर्णन

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कलेर्दोषेनिवेश्चैव शृणु चैकं महागुणं | यदल्पेन तु कालेन सिद्धि गच्छति मानवाः || (1) त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः | यथा क्लेशं वरन प्राश्स्तहा प्राप्यते कलौ ||  (2) दुगत्रयेण तावन्तः सिद्धि गच्छन्ति […]

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नारद जी इतने चपल क्यों ?

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अर्जुन एक बार नारद जी से इस प्रकार प्रश्न किया – देवर्षि ! आप सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाले, जितेन्द्रिय तथा राग-द्वेष रहित हैं | तथापि आप में जो […]

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पापकर्मों के फल

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धर्मदानकृतं सौख्यमधर्माद दुखःसंभवम् | तस्माधर्मं सुखार्थाय कुर्यात पापं विवर्जयेत || लोकद्वयेऽपि यत्सौख्यं तद्धर्मात्प्रोच्यते यतः | धर्म एव मर्ति कुर्यात सर्वकार्यातसिद्धये || मुहूर्तमपि जीवेद्धि नरः शुक्लेन कर्मणा | न कल्पमति जीवेश लोकद्वयविरोधिना ||                        […]

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कमठ द्वारा शरीर वर्णन

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भगवान् सूर्य बोले – वत्स कमठ ! तुम्हारी बुद्धि तो वृद्धों जैसी है | तुम बहुत अच्छा प्रतिपादन कर रहे हो | अब मैं तुमसे शरीर का लक्षण सुनना चाहता हूँ; उसे […]

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“मैं पानी में हूँ, पर गीला नहीं हूँ |”

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यस्याज्ञया जगतस्रष्टा विरंचिः पालको हरिः | संहर्ता कालरुद्राख्यो नमस्तस्यै पिनाकिने || —- स्कन्द पुराण अर्थ – जिनकी आज्ञा से ब्रह्मा जी इस जगत की सृष्टि तथा विष्णु भगवान् पालन करते हैं और […]

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जीव कैसे उत्पन्न होता है ?

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कमठ की यह महत्वपूर्ण बात सुनकर अतिथि ब्राह्मण ने मन ही मन उसकी सराहना की और यह प्रश्न उपस्थित किया – ‘जीव कैसे उत्पन्न होता है ?’ कमठ ने कहा – ब्राह्मण […]

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आत्मा का भोजन और भोजन के प्रकार

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ये कथा नारद जी के महिसागर संगम तीर्थ के ब्राह्मणों के विषय में हैं, जिन्हें नारद जी, सूर्य जी को बहुत ही उत्तम कुल के और श्रेष्ठ ब्राहमण बता रहे हैं | […]

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जीवन के संदेहों का निवारण

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शोकस्थान शस्त्राणी हर्ष स्थानि शतानि च | दिवसे दिवसे मूढ़माविशन्ति न पंडितम || अर्थात – मूर्ख मनुष्य को ही प्रतिदिन शोक के सहस्त्रों और हर्ष के सैकड़ो स्थान प्राप्त होते हैं, विद्वान […]

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कलियुग का भविष्य कथन

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राजन ! अट्ठाइसवें कलियुग में जो कुछ होने वाला है, उसे सुनो ! कलियुग के तीन हजार दो सौ नब्बे वर्ष व्यतीत होने पर इस भूमंडल में वीरों का अधिपति शूद्रक नामका […]

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कलियुग की प्रवृत्ति का वर्णन

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कलेर्दोषेनिवेश्चैव शृणु चैकं महागुणं | यदल्पेन तु कालेन सिद्धि गच्छति मानवाः || (1) त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः | यथा क्लेशं वरन प्राश्स्तहा प्राप्यते कलौ ||  (2) दुगत्रयेण तावन्तः सिद्धि गच्छन्ति […]

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