Tag Archive: ज्योतिष

Jul 16

कथाओ में ज्योतिष !

श्रीमते विदुषे यूने कुलीनाय यशस्विने, उदाराय सनाथाय कन्या देय वराय वै | – १ एकतः पृथिवी कृत्स्ना सशैलवनकानन, स्वलन्कृतोपाधिहीना सुकन्या चैकतः स्मृता | विक्रीणीते यश्च कन्यामश्वम् वा गां तिलान्यपि || (विस्तार १६५ | ८ – १६ ) ब्रह्म पुराण अर्थ – ये सन्दर्भ तब का है जब सूर्य अपनी पुत्री विष्टि का विवाह नहीं कर …

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Nov 04

अध्याय 2

Chitra 1

अध्याय २ योजनानि शतान्यष्टो भूकर्णों द्विगुणानि तु | तद्वर्गतो दशगुणात्पदे भूपरिधिर्भवते || अर्थात पृथ्वी का व्यास ८०० के दूने १६०० योजन है, इसके वर्ग का १० गुना करके गुणनफल का वर्गमूल निकालने से जो आता है, वह पृथ्वी की  परिधि है | इस श्लोक को विस्तार से आगे चर्चा करेंगे किन्तु इस श्लोक से स्पष्ट हो …

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Sep 22

अध्याय १

लोकानामन्तकृत्कालः कालोन्यः कल्नात्मकः | स द्विधा स्थूल सुक्ष्मत्वान्मूर्त श्चामूर्त उच्यते || अर्थात – एक प्रकार का काल संसार का नाश करता है और दूसरे प्रकार का कलानात्मक है अर्थात जाना जा सकता है | यह भी दो प्रकार का होता है (१) स्थूल और (२) सूक्ष्म | स्थूल नापा जा सकता है इसलिए मूर्त कहलाता …

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