अध्याय 5 – ज्योतिष शास्त्र

अध्याय – ५

हमने अध्याय 1 के अंत में संक्षेप में लिखा था कि प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में बांटा गया है | एक नक्षत्र13020| का होता है अतः नक्षत्र के एक चरण की दूरी 13020|/4 = 3020| होती है | सवा दो नक्षत्र अर्थात ९ चरण (300 ) की एक राशि होती है | चंद्रमा सवा दो दिन में एक राशि पार कर लेता है अर्थात 300 आगे बढ़ जाता है यानी सवा दो दिन तक चंद्रमा एक ही राशि में रहता है | 27 दिन में सभी १२ राशियाँ और नक्षत्र पार कर लेता है | इन चरणों के लिए कुछ अक्षर निश्चित किये गए हैं, जिसके हिसाब से किसी जातक का नामकरण किया जाता है |

क्रमांक नक्षत्र नक्षत्र चरण चरणाक्षर राशि
1 अश्विनी 1,2,3,4 चू, चे, चो, ला मेष
2 भरणी 1,2,3,4 ली, लू, ले, लो
3 कृत्तिका 1
3 कृत्तिका 2,3,4 ई, ऊ, ए वृष
4 रोहिणी 1,2,3,4 ओ, वा, वी, वू,
5 मृगशिरा 1,2 वे, वो
5 मृगशिरा 3,4 का, की मिथुन
6 आर्द्रा 1,2,3,4 वु, घ, ड, छ
7 पुनर्वसु 1,2,3 के, को, हा
7 पुनर्वसु 4 ही कर्क
8 पुष्य 1,2,3,4 हू, हे, हो, डा
9 अश्लेषा 1,2,3,4 डी, डू, डे, डो
10 मघा 1,2,3,4 मा, मी, मू मे सिंह
11 पूर्व फाल्गुनी 1,2,3,4 मो, टा, टी, टू
12 उत्तरा फाल्गुनी 1 टे
12 उत्तरा फाल्गुनी 2,3,4 टो, पा, पी कन्या
13 हस्त 1,2,3,4 पू, ष, ण, ठ
14 चित्रा 1,2 पे, पो
14 चित्रा 3,4 रा, री, ब तुला
15 स्वाति 1,2,3,4 स, रे, रो, ता
16 विशाखा 1,2,3 ती, तू, ते
16 विशाखा 4 तो वृश्चिक
17 अनुराधा 1,2,3,4 ना, नी, नू, ने
18 ज्येष्ठा 1,2,3,4 नो, या, यी, यूं
19 मूल 1,2,3,4 ये, यो, भा, भी धनु
20 पूर्वाषाढ़ 1,2,3,4 भू, ध, फा, ढा
21 उत्तराषाढ़ 1 भे
21 उत्तराषाढ़ 2,3,4 भो, जा, जी मकर
22 श्रवण 1,2,3,4 खी, खू, खे, खो
23 धनिष्ठा 1,2 गा, गी
23 धनिष्ठा 3,4 गू, गे कुम्भ
24 शतभिषा 1,2,3,4 गो, सा, सी, सू
25 पूर्वाभाद्रपद 1,2,3 से, सो, दा
25 पूर्वाभाद्रपद 4 दी मीन
26 उत्तरा भाद्रपद 1,2,3,4 दू, थ, झ, ञ
27 रेवती 1,2,3,4 दे, दो, चा, ची

अब हम फिर से अध्याय 4 की कुंडली वाले विषय को आगे बढाते हैं | हमने लग्न कुंडली और चन्द्र कुंडली का विस्तृत अध्ययन पिछले अध्यायों में कर लिया है अब हम नवांश कुंडली और कुंडली के विभिन्न विषय यथा भाव, नक्षत्रों का प्रभाव आदि का ध्यान  इस अध्याय में करेंगे |

नवांश कुंडली – नवांश कुंडली एक प्रकार के लग्न कुंडली को सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देखने जैसा है | यदि हम प्रत्येक राशि को नौ बराबर हिस्से में बांटे तो प्रत्येक छोटा हिस्सा 300/9 = 3030| का होगा १२ राशियों में कुल मिलकर 108 नवमांश होंगे, परन्तु नवांशो के स्वामी का क्रम राशियों के स्वामी के क्रम से ही चलता है | लग्न कुंडली जातक का शरीर है तो चन्द्र कुंडली मन हैं एवं नवांश कुंडली जातक की आत्मा होती है | नवमांश कुंडली से जातक की पत्नी पत्नी या जातिका के पति का विचार किया जाता है | पारिवारिक सुख दुःख में भी नवमांश कुंडली से बहुत सहायता मिलती है | यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जो ग्रह लग्न कुंडली में जिस राशि में होता है यदि उसी राशि का नवमांश कुंडली में भी आ जाता है तो वह ग्रह वर्गोत्तम हो जाता है और उस ग्रह के फल देने की क्षमता द्विगुणित हो जाती है | वर्गोतम ग्रह को फलित ज्योतिष में अच्छा माना जाता है |

Navmansh chart

उदाहरण – माना किसी जातक के लिए ग्रह स्पष्ट निम्नलिखित है |

लग्न –

लग्न 4s19032|
सूर्य 7s1030|
चन्द्र 7s2605|
मंगल 8s1905|
बुध 7s0024|
गुरु 6s28011|
शुक्र 7s0022|
शनि 6s506|
राहु 2s11015|
केतु 8s11015|

यानी कुंडली कुछ ऐसी है –

alok kundali

इस जातक का नवांश – लग्न सिंह राशि में 19032| जो कि सिंह राशि के छठवें भाग के अंतर्गत (नवमांश चक्र में इतने डिग्री पर  सिंह राशि देखें) आने से नवमांश लग्न कन्या हुई | इसी प्रकार सूर्य वृश्चिक राशि में 1030| में होने से नवमांश कुंडली में कर्क राशि में रहेगा (नवमांश चक्र में इतने डिग्री पर वृश्चिक राशि देखें) | चंद्रमा वृश्चिक में सातवें भाग में मकर राशि में, मंगल धनु राशि के पांचवे भाग से सिंह राशि में, बुध वृश्चिक राशि के प्रथम भाग से कर्क राशि में, गुरु तुला राशि के नौवें भाग से मिथुन राशि में, शुक्र वृश्चिक राशि के पहले भाग से कर्क राशि में, शनि तुला राशि के दुसरे भाग से वृश्चिक राशि में, राहू मिथुन राशि में चौथे भाग से मकर राशि में होगा और अंत में केतु धनु राशि में चौथे स्थान से कर्क राशि में होगा |

alok navansh

किसी जातक की विवेचना लग्न कुंडली, चन्द्र कुडंली व् नवांश कुंडली तीनो को देख कर ही करना उत्तम होता है | उक्त बातों से स्पष्ट है कि सामान्यतः मात्र जन्म कुंडली को देख कर या मात्र राशि के आधार पर कुछ बातें बता कर दूसरों को प्रभावित करना मनोरंजन का साधन मात्र है | इसी प्रकार नित्य प्रातः समाचार पत्र आदि में केवल राशि के अनुसार फल देखकर प्रसन्न हो जाना भी आपका मनोविलास ही है | इस बात का वास्तविक ज्योतिष विज्ञान से कोई सम्बन्ध नहीं है |

भावेश – अब आपने कुंडली बनाना तो सीख लिया अब समझते हैं कि इसमें प्रयुक्त विभिन्न शब्दावली या अन्कावली और भावों का क्या तात्पर्य है ? जैसा हम जानते हैं कि कुंडली में जो अंक लिखे हैं वह राशि बताते हैं उदाहरण के लिए यदि उपरोक्त लग्न  कुंडली में 5  नंबर लिखा है अतः कहा जा सकता है कि लग्न या प्रथम भाव में 5 अर्थात सिंह राशि पड़ी है | हम पहले से ही जानते हैं कि सिंह राशि का स्वामी ग्रह सूर्य है | अतः ज्योतिषीय भाषा में कहेंगे कि प्रथम भाव का स्वामी सूर्य है (क्योंकि पहले घर में 5 लिखा है) भाव के स्वामी को भावेश  भी कहते हैं (कह सकते हैं कि राशि के स्वामी को उस भाव का भावेश कहते हैं) | प्रथम भाव के स्वामी को प्रथमेश या लग्नेश भी कहते हैं | इसी प्रकार द्वितीय भाव के स्वामी को द्वितीयेश, तृतीय भाव के स्वामी को तृतीयेश इत्यादि कहते हैं |

जैसा कि बताया गया कि जिस भाव में, जो राशि लिखी होती है उस राशि का स्वामी ग्रह उस भाव का भावेश कहलाता है | भावेश अपनी राशि वाले भाव में बैठा हो सका है और किसी अन्य राशि वाले भाव में भी बैठा हो सकता है | उदाहरण के लिए उपरोक्त लग्न कुंडली में प्रथम भाव सिंह राशि लिखी है | सिंह राशि का स्वामी ग्रह सूर्य है जो चौथे भाव में वृश्चिक राशि में बैठा है | कहा जाएगा कि लग्न भावेश चतुर्थ भाव में बैठा है | यदि कोई ग्रह अपनी ही राशि में बैठा हो तो कहा जायेगा कि भावेश अपने भाव में बैठे हैं | इसी प्रकार सभी भावों के बारे में जान सकते हैं |

स्वामी ग्रह होने का अभिप्राय ये है कि जो ग्रह जिस राशि का स्वामी ग्रह कहा जाता है, उसका उस राशि पर विशेष अधिकार रहना कहा गया है | उदाहरणार्थ जैसे ग्रामाधिपति को अपने ग्राम से प्रेम होता है और उस ग्राम वाले का भी अपने स्वामी से एक विशेष सम्बन्ध होता है और जब ग्रामाधिपति अपने स्थान में रहता है तो वह विशेष रूप से पराक्रमी और संतुष्ट रहता है | ज्योतिष शास्त्र में ग्रहाधिपत्य से वैसा ही अनुमान बताया गया है |  राशियों के स्वामियों को याद करने के लिए एक आसान तरीका निम्न प्रकार है |

सूर्य जातक में कहा गया है –

अहम् राजा शशि राज्ञी नेता भूमिसुतः खगः | सौम्यः कुमारो मंत्री च गुरुस्तद्वल्ल्भा भृगुः || 

प्रेष्यास्त्थेव सम्प्रोक्तः सर्वदा तनुजो मम |

अर्थात सूर्य राजा और चंद्रमा रानी है | बुध युवराज, मंगल नायक, बृहस्पति देवमंत्री, शुक्र दैत्यमंत्री और शनि दास है | (ऊपर के श्लोक में “गुरुस्तद्वल्ल्भा भृगुः” का अर्थ होता है, बृहस्पति की प्रियतमा शुक्र है परन्तु यह भाव न तो पुराणोक्त ही है और न ही ज्योतिष शास्त्र में पाया जाता है |)

भाव – यद्यपि कुंडली में एकैक राशि का एकैक स्थान होता है, परन्तु एक भाव ठीक एक ही राशि का सर्वदा नहीं होता | इसका कारण यह है कि लग्न स्पष्ट 15 अंश पूर्व और 15 अंश बाद का एक भाव (प्रथम भाव) होता है | यों समझिये कि किसी का जन्म मेष के १२ अंश २० कला पर था तो उस कुंडली का प्रथम भाव उसके लगभग १५ अंश पूर्व से अर्थात मीन के 27 अंश २० कला से प्रारंभ होकर लग्न स्पष्ट से 15 अंश बाद तक अर्थात मेष के 27 अंश २० कला  तक हुआ | साधारणतः इसी प्रकार द्वितीय भाव मेष के 27 अंश २० कला के बाद, वृष के 27 अंश २० कला पर्यंत हुआ | इस से बोध होता है कि यद्यपि अन्य स्थानों में भी प्रत्यक्ष रूप से लग्न की एक ही राशि मालूम होती है  तथापि उस भाव के विचारते समय दूसरी राशि का भी सम्बन्ध हो जाना संभव है | इस कारण उस दूसरी राशि में बैठे हुए ग्रहों का भी सम्बन्ध हो सकता है | अतएव फलित ज्योतिष में भाव का साधन तथा भाव कुंडली का प्रयोग समय समय पर अत्यावश्यक हो जाता है |

भाव संधि – जैसे बताया गया है, कि प्रत्येक भाव अपने भावस्फुट से लगभग 15 अंश पूर्व और 15 अंश पश्चात तक होता है और जहां से एक भाव का अंत और दुसरे का प्रारंभ होता है, उसे संधि कहते हैं | इसे दो भावों का योगस्थान समझ सकते हैं | भावों की संधि मालूम करना बड़ा सुगम है | किसी भाव के स्फुट को उसके आगामी भाव स्फुट में जोड़कर उसका अर्द्ध कर देने से उन दोनों भावों की संधिस्फुट हो जायेगी | जैसे मान किसी कुंडली में ‘लग्न स्फुट’ 0|12|20 और द्वितीय भाव स्फुट 1|8|50 है | इन दोनों का योग 1|12|10 जिसका आधा 0|25|35 हुआ और यही प्रथम और द्वितीय भावों की संधि हुई | ऐसे ही अन्य भी निकाली जा सकती है |

अब यदि कोई ग्रह मीन राशि में 25 अंश 35 कला के बाद है तो यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से मीन राशि में होने के कारण द्वादश भाव में प्रतीत होगा परन्तु मीन के 25 अंश 35 कला के बाद रहने के कारण उस ग्रह को लग्न या प्रथम भाव में रहने का फल होगा | इसी प्रकार द्वितीय भाव के मेष के 25 अंश 35 कला से वृष के 22 अंश 5 कला पर्यंत चला गया है | यदि कोई ग्रह मेष के 26 अथवा 27 अंशो में रहे तो यह प्रत्यक्ष रूप से लग्न में मालूम होगा पर वह द्वितीय भाव का फल होगा |

भाव की अवधि – हम कुंडली के १२ भावों को २४ घंटो में बाँट सकते हैं और कह सकते हैं कि एक भाव २ घंटे का होता है |

चित्र 4

Bhav Avadhi

सूर्य, चन्द्र तथा शनि ग्रह की स्थिति – कुंडली में भावों में सभी ग्रह महवपूर्ण होते हैं और उनकी स्थिति फलादेश को प्रभावित करती है | किन्तु सूर्य, चन्द्र एवं शनि ग्रहों की स्थिति से व्यक्ति के जीवन के कुछ विशिष्ट तथ्यों का आसानी से पता लग जाता है | भाव में सूर्य की स्थिति से जन्म के समय का ज्ञान हो जाता है | सूर्य एवं चन्द्र दोनों की भाव स्थिति से जन्म की तिथि, जन्म के पक्ष और जन्म के मास का पता लग जाता है | शनि ग्रह की स्थिति से व्यक्ति की वर्तमान आयु का अनुमान हो जाता है | नीचे की दो कुंडलियों से हम उपरोक्त तथ्य मिलायेंगे और पायेंगे कि हम पता कर सकते हैं, कुंडली ठीक बनी है या नहीं |

उदाहरण – कुंडली 1 – जन्मतिथि 27.6.1976, जन्म समय – 4.45 सांय, जन्मस्थान – दिल्ली (आषाढ़ की अमावस, सूर्य – 12.23.25, चंद्रमा – 10.36.29, शनि – 09.03.37

कुंडली 2 – जन्मतिथि 01.08.1979, जन्म समय – 8.30 प्रातः, जन्मस्थान – पलवल (श्रावण शुक्ल अष्टमी) सूर्य 14.43.43, चंद्रमा – 13.17.24, शनि 18.49.30

Kundali 1Kundali 2

जन्म का समय – जन्म का समय सूर्य स्थित भाव से जाना जाता है | कुंडली 1 में सूर्य अष्टम भाव में स्थित है | इस भाव का समय 3 बजे से 5 बजे सांय का है और कुंडली का जन्म ४ बजकर 45 मिनट सांय का ही है | यह समय अष्टम भाव के समय के मध्य आता है | इसी प्रकार कुंडली 2 में सूर्य द्वादश भाव् में है | द्वादश भाव का समय 7 बजे से प्रातः 9 बजे आता है | कुंडली 2 में जन्म 8 बजकर ३० मिनट प्रातः का ही है | यहाँ समय द्वादश भाव के समय के मध्य आता है | इस प्रकार दोनों कुंडली का समय प्रमाणित होता है और दोनों कुंडली सही हैं |

जन्म की तिथि – जन्म की तिथि का अनुमान सूर्य चंद्रमा दोनों की स्थिति देखकर लगाया जा सकता है | सूर्य को एक मान कर गिनती करें | यदि सूर्य से गिनती करने पर चन्द्र सातवें स्थान में हो तो पूर्णिमा होती है और यदि सूर्य चंद्रमा दोनों एक ही भाव में हो तो अमावस्या होती है और यदि सातवें स्थान से पहले गिनती आती है तो शुक्ल पक्ष की कोई तिथि और यदि सातवें स्थान से आगे गिनती आती है तो कृष्ण पक्ष की कोई तिथि होती है | प्रत्येक अगली गिनती पर लगभग २ दिन का अंतर पड़ता है | इसी गणित से तिथि का अंदाजा लगाया लग जाता है | कुंडली 1 में सूर्य व् चंद्रमा एक ही भाव में है | अतः अमावस तिथि का जन्म होना चाहिए | व्यक्ति का जन्म भी आषाढ़ कृष्णा अमावस्या का ही है | कुंडली 2 में सूर्य से चंद्रमा की गिनती ४ है और सातवें स्थान से पहले है | अतः जन्म शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का बनता है | कुंडली २ में जन्म श्रावण शुक्ल अष्टमी तिथि का ही है |

इसे और बेहतर समझते हैं – सूर्य एक राशी पर 30 दिन रहता हैं और चन्द्रमा एक राशी पर लगभग सवा दो दिन तक रहता हैं, तो प्रतिपदा की कुंडली में तो दोनों साथ रहेंगे ही। तिथियाँ शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से गिनी जाती है. पूर्णिमा को 15 तथा अमावस्या को 30 तिथि कहते हैं. जिस दिन सूर्य व चन्द्रमा में 180º का अन्तर (दूरी) होता है अर्थात सूर्य व चन्द्र आमने सामने होते हैं तो वह पूर्णिमा तिथि कहलाती है. और जब सुर्य व चन्द्रमा एक ही स्थान पर होते हैं अर्थात 0º का अन्तर होता है तो अमावस्या तिथि कहलाती है. भचक्र का कुलमान 360º है, तो एक तिथि=360/30=12º अर्थात सूर्य-चन्द्र में 12º का अन्तर पडने पर एक तिथि होती है.

उदाहरण स्वरुप 0º से 12º तक प्रतिपदा (शुक्ल पक्ष) 12º से 24º तक द्वितीय तथा 330º से 360º तक अमावस्या इत्यादि. भारतीय ज्योतिष की परम्परा में तिथि की वृद्धि एंव तिथि का क्षय भी होता है. जिस तिथि में दो बार सूर्योदय आता है वह वृद्धि तिथि कहलाती है तथा जिस तिथि में एक भी सूर्योदय न हो तो उस तिथि का क्षय हो जाता है. उदाहरण के लिए एक तिथि सूर्योदय से पहले प्रारम्भ होती है तथा पूरा दिन रहकर अगले दिन सूर्योदय के 2 घंटे पश्चात तक भी रहती है तो यह तिथि दो सूर्योदय को स्पर्श कर लेती है. इसलिए इस तिथि में वृद्धि हो जाती है . इसी प्रकार एक अन्य तिथि सूर्योदय के पश्चात प्रारम्भ होती है तथा दूसरे दिन सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है, क्योंकि यह तिथि एक भी सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती अतः क्षय होने से तिथि क्षय कहलाती है.

जन्म का पक्ष – जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह से घडी की सूइयों के प्रतिकूल क्रम में गिनती करने पर 7 भावों की गिनती तक चन्द्र ग्रह हो तो शुक्ल पक्ष का जन्म है और यदि 7 से आगे भावों में चन्द्र ग्रह हो तो कृष्ण पक्ष का जन्म माना जायेगा | कुंडली 1 में चन्द्र ग्रह और सूर्य ग्रह एक ही भाव अष्टम में है | अतः अमावस्या का दिन है और कृष्ण पक्ष है | कुंडली 2 में चन्द्र 7 की गिनती से पहले है, अतः शुक्ल पक्ष का जन्म प्रमाणित होता है |

जन्म का मास – कुंडली 1 में सूर्य मिथुन राशि में स्थित है अतः स्पष्ट है कि मिथुन सौर मास का जन्म है | अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार मिथुन सौरमास का समय 14 जून से 16 जुलाई है | यदि सूर्य ग्रह के स्पष्ट अंश प्रारंभिक 15 अंश तक हैं तो जून का और 15 अंश से अधिक 30 अंश तक है तो जुलाई मास का जन्म होगा | इस कुंडली के सूर्य ग्रह के स्पष्ट अंश 15 अंश से कम हैं अतः कुंडली 1 के जातक का जून मास का जन्म बनता है | वैसे भी 27.06.1976 का जन्म है | कुंडली २ में सूर्य कर्क राशि में है | कर्क सौरमास की अवधि 16 जुलाई से 16 अगस्त है और सूर्य के स्पष्ट अंश 15 से थोड़ी अधिक है अतः कुंडली २ वाले जातक का अगस्त में जन्म समझें | वैसे जातक का जन्म 1.8.1979 का ही है |

वर्तमान आयु – वर्तमान आयु का निर्णय शनि की स्थिति से होता है | जन्म के समय शनि किस राशि में था और अब शनि किस राशि में है | इस अवधि को ढाई से गुणा करने पर वर्तमान में व्यक्ति की कितनी आयु है, पता लग जाता है | शनि एक राशि में करीब ढाई वर्ष रहता है | कुंडली 1 में शनि जन्म के समय कर्क राशि में था | माना 2007 में शनि सिंह राशि में आ गया है | अतः 12 राशियों का समय बीत चुका है | व्यक्ति की वर्तमान आयु 12 राशि x 2.5 वर्ष = 30 वर्ष से अधिक होनी चाहिए (कोई आपकी परीक्षा लेने के लिए किसी मरे हुए व्यक्ति की कुंडली भी दिखा सकता है तो इसी विधि से जन्म समय का शनि इस से पहले कब कर्क राशि में था, ये भी देखना जरूरी है और उसे भी ध्यान में रखना चाहिए ) इसी प्रकार कुंडली 2 में जन्म के समय शनि सिंह राशि में था | अब जुलाई, 2007 में शनि पुनः सिंह राशि में आ गया है | इस प्रकार ११ राशियों का समय व्यतीत हो चुका है | अतः जातक की वर्तमान आयु ११ राशि x 2.5 = 27.5 वर्ष से अधिक होनी चाहिए | इस गणित से दोनों व्यक्तियों की वर्तमान आयु सही बैठती है |

केंद्र तथा त्रिकोण – कुंडली में लग्न को और लग्न से चौथे, सातवें और दसवें स्थान (भाव तथा राशि) को केंद्र कहते हैं | लग्न को, लग्न से पंचम तथा नवम स्थान को त्रिकोण कहते हैं | इस तरह से लग्न के दो नाम हो गए | एक केंद्र और दूसरा त्रिकोण, परन्तु लग्न को केंद्र मानते हैं, त्रिकोण नहीं |

Trikon

कुंडली के विभिन्न भाव –

प्रथम भाव – इसे तनु भाव या लग्न कहते हैं | लग्नेश शुभ हो या अशुभ सदैव शुभ फल देता है | सूर्य इस भाव का कारक ग्रह है | प्रथम भाव से विचारणीय विषय हैं – जन्म, सर, शरीर, अंग, आयु, रूप, कद-काठी आदि |

द्वितीय भाव – इसे धन भाव या पणकर भाव भी कहते हैं | यह मारक भाव है | गुरु इस भाव का कारक ग्रह है | द्वितीय भाव के विचारणीय विषय हैं – रुपया, पैसा, धन, नेत्र, मुख, वाणी, आर्थिक स्थिति, कुटुंब, भोजन, जिह्वा, दांत, मृत्यु, नाक आदि | चन्द्रमा, बुध, गुरु शुक्र ये शुभप्रद रहते हैं |

तृतीय भाव – इसे सहज भाव या त्रिषड़ाय भी कहते हैं | यह एक शुभ भाव है, किन्तु सदैव दोषी होता है | मंगल इस भाव का कारक ग्रह है | तृतीय भाव के विचारणीय विषय हैं – छोटे भाई बहन, धैर्य, नौकर-चाकर, लघु यात्राएँ, साहस, डर, कान, मानसिक संतुलन, धर्म, खांसी, श्वास रोग आदि | सूर्य, शनि, मंगल, शुक्र, बुध, चंद्रमा, राहू- ये शुभ ग्रह हैं |

चतुर्थ भाव – यह सुख भाव कहलाता है यह केंद्र भाव है | पापग्रह इसमें अच्छा फल देते हैं | चन्द्र और बुध इस भाव के कारक ग्रह हैं | विचारणीय विषय – मातृ सुख, जमीन, मकान, वाहन सुख, पशु धन, गुप्त धन, मातृ धन, यश, दया, शान्ति, जनसंपर्क, नौकर-चाकर, खेतीबाड़ी, श्वसुर, उदर रोग, कैंसर, विद्या, ह्रदय आदि विचारणीय हैं | बुध, शुक्र – लाभदायक एवं अन्य भयदायक |

पंचम भाव (सुत भाव) – इसे त्रिकोण भाव भी कहते हैं | यह एक शुभ भाव है | गुरु इस भाव का कारक ग्रह है | आकस्मिक धन (लाटरी), विद्या, संतान, संतान सुख, बुद्धि, कुशाग्रता, प्रशंसा योग्य कार्य, दान, मनोरंजन, जुआ, पुस्तक लिखना, स्त्रियों के यकृत, गर्भाशय सम्बन्धी रोग इस भाव से विचारणीय हैं | गुरु, शुक्र, बुध, चंद्रमा – अभीष्ट लाभ

षष्ठम भाव (रिपु भाव) – इस भाव को त्रिषड़ाय और दुष्ट भाव भी कहते हैं | शुभ या अशुभ षष्ठेश, अष्टम और द्वादश भाव को छोड़कर सभी भावों की हानि करता है | मंगल और शनि इस भाव के कारक ग्रह हैं | शत्रु, चिंता, रोग, शारीरिक वक्रता, चोट, मुकदमेबाजी, अवसाद, बदनामी,घर बाहर के झगडे, चोरी-डकैती, भाइयों से मत-भेद, घाव, फोड़े-फुंसी विचारणीय विषय है | सूर्य, चंद्रमा, शनि, मंगल, बुध – शुभ तथा गुरु – अशुभ

सप्तम भाव (जाया भाव) – इसे केंद्र भाव भी कहते हैं | यह एक मारक भाव है | पुरुषों के लिए शुक्र और स्त्रियों के लिए गुरु इस भाव के कारक ग्रह हैं | विवाह, पत्नी, यौन सुख, यात्रा, पार्टनर | इसमें सभी ग्रह अशुभ माने जाते हैं | गुदा, मूत्र, नाभि, दाम्पत्य जीवन, रोजगार, व्यापार, बवासीर आदि प्रमुख है | बुध, गुरु, शुक्र – शुभ तथा सूर्य, शनि, मंगल, राहू – हानिकारक |

अष्टम भाव (मृत्यु भाव) – इसे दुष्ट भाव भी कहते हैं | अष्टमेश सभी भावों की हानि करता है | शनि इस भाव का कारक ग्रह है | आयु, जीवन, मृत्यु, प्रेम, बदनामी, पतन, सजा, दुर्घटना, समुद्री यात्रा, वसीयत, दरिद्रता, आलस्य, जीवनसाथी का भाग्य, गुप्त जनेन्द्रिय रोग, दुर्भाग्य, पापकर्म, कर्ज, अकाल मृत्यु, कठिनाइयाँ | बुध, शुक्र – शुभ तथा शेष अशुभ |

नवम भाव (धर्म भाव) – इसे भाग्य या त्रिकोण भाव् भी कहते हैं | सूर्य और गुरु इस भाव के कारक ग्रह हैं | पिता, भाग्य, गुरु, प्रशंसा, योग्य कार्य, धर्म, दानशीलता, पूर्वजनम के संचित पुण्य, धर्म, कीर्ति, व्याभिचार, सदाचार, तीर्थ यात्रा, विदेश यात्रा आदि विचारणीय विषय है | बुध, शुक्र – शुभ तथा शेष अशुभ |

दशम भाव ( कर्म भाव) – यह केंद्र भाव भी है | सूर्य, गुरु, बुध, शनि इस भाव के कारक ग्रह हैं | पैतृक व्यवसाय, उदरपालन, व्यापार, प्रतिष्ठा, श्रेणी, पद, प्रसिद्धि, प्रभुत्व, पितृप्रेम, नौकरी, नेतृत्व शक्ति, घुटने, पीठ के रोग विचारणीय है |

एकादश भाव (आय भाव) – इसे त्रिषड़ाय भी कहते हैं | एकादश भाव को अशुभ माना जाता है किन्तु भाव स्थित सभी ग्रह सदैव शुभ फल देते हैं | गुरु इस भाव का कारक ग्रह है | आय, लाभ, गडा धन, लाटरी, पितृधन, माता की मृत्यु, व्यापार से लाभ-हानि, चोट, द्वितीय जीवनसाथी, बड़ा भाई, पैर व् एड़ी का दर्द मुख्य विचारणीय विषय हैं |

द्वादश भाव (व्यय भाव) – इसे दुष्ट भाव भी कहते हैं | शनि इस भाव का कारक ग्रह है | द्वादेश सदैव ही मानहानि, धनहानि और अन्य दुसरे अनिष्ट करता है | अपव्यय, धनहानि, कचहरी, राजदंड, सजा, शयन सुख में कमी, ऋण, हत्या, आत्महत्या, अपमान, बायीं आँख, चोरी से हानि आदि विचारणीय विषय हैं | बुध, शुक्र – शुभ तथा शेष अशुभ |