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Feb 05

अघोरी बाबा की गीता – भाग ८

नटराज का नर्तन

मैंने ये बात बोलते बोलते हाथ जोड़ लिए थे, जिस से शायद उन्हें मेरी दीनता समझ में आ गयी थी कि मैं अभी भी भय से बाहर नहीं हूँ किन्तु प्रश्न किये बिना और विषय को समझे बिना मैं आगे भी नहीं बढ़ सकता हूँ | यही सोच कर शायद उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर देना स्वीकार किया |

गीता जी बोली – भय ही क्यों, जब बात चली है तो पूरा समझो | भय क्या है ? मन का एक भाव है | मैं तुम्हे मन के सभी भाव बताती हूँ | भावों को समझना आवश्यक है क्योंकि मनुष्य अपने जीवन में इन्ही के हिसाब से कर्म करता है | गीता में भी इन पर बड़ा जोर दिया गया है | भरत मुनि ने बहुत अध्ययन करके ये निश्चित किया कि कुल ८ भाव होते हैं – रति, हास्य, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा (घृणा), आश्चर्य | (1*) इन्ही ८ को अंग्रेजी में basic instincts कहते हैं | ये ८ मूल भाव है, इनके अलावा जो भी हैं, वो इन्हीं आठों से उत्पन्न हैं | इनमें से रति सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि रति से बाकी सारे सातों भाव उत्पन्न हो सकते हैं | रति का अर्थ ऐसे समझो जैसे लगाव | अब मान लो जिस से हमारी रति है, यदि वो मर जाए तो शोक उत्पन्न हो जाएगा | शोक उसी के लिए उत्पन्न होता है, जिसके लिए रति होती है | यदि हम अपनी प्रेमिका के पास बैठे हैं और कोई आकर उसमें बाधा डाल दे, बाल पकड़ के खींच दे कि ए क्या कर रहा है यहाँ, भाग यहाँ से तो तो क्रोध आएगा | ऐसे ही बाकी भाव भी, रति से उत्पन्न हो सकते हैं |

इनमें से हास्य, आश्चर्य और उत्साह सुखात्मक हैं और बाक़ी रति को छोड़कर सारे भाव दुखात्मक है और रति उभयात्मक अर्थात दोनों हैं | जैसे, जिस से रति हो, वो यदि पास रहे तो सुख अनुभव होता है, और यदि वो दूर हो जाए तो दुःख होता है | जैसे तुम्हारा अपने भाई से लगाव है और वो ही किसी दिन कुछ उल्टा बोल दे तो दुःख होगा हालाँकि लगाव ख़त्म नहीं होगा पर दुःख होगा | तुम्हारा बेटा कुछ अच्छी बात करे तो सुख होगा और यदि कभी तुमसे उल्टा बोल जाए तो तुम्हें दुःख होगा, जिस से रति होगी, उसी से सुख और दुःख दोनों हो सकते हैं |

ये सारे भाव, मनोविकार हैं | मनोविकार का अर्थ गन्दगी नहीं है, कुछ लोग विकार का अर्थ गन्दगी से करते हैं | विकार का अर्थ होता है परिवर्तन, एक चीज का दूसरे में बदलना | जैसे दूध है, उसमें रखे रखे एक बैक्टीरिया पैदा होता है, जिसे फर्मेंटेशन कहते हैं और जिसके बाद हम उसे दूध नहीं कहते, दही कहते हैं, लेकिन क्योंकि दही दूध से ही उत्पन्न होता है इसलिए वो दुग्धविकार है | इसी प्रकार ये मनोविकार मन के विकार हैं | ये मनोविकार छोड़ने की चीज नहीं है, जैसे कि लोग अक्सर कह देते हैं कि क्रोध छोड़ो, रति छोड़ो | ये इतना आसान नहीं है | रामचंद्र जी तक इन्हें नहीं त्याग पाए थे, आप देखिये, कि रामचन्द्र की सीता जी से रति थी, उनसे लगाव था और उस लगाव में ऐसे बेसुध हो गए थे कि पेड़ों, पत्तों, पक्षियों और जानवरों से भी पूछ रहे हैं कि –

हे खग, मृग, हे मधुकर श्रेणी – तुम देखी सीता मृगनयनी | (२*)

वो ये भी भूल गए कि ये लोग पलट कर जवाब नहीं देंगे | वो इन्हें नहीं छोड़ पाए क्योंकि वो मनुष्य जन्म लिए थे और मनुष्य की तरह ही उन्होंने सारे कार्य प्रतिपादित किये | कहीं भी माया का सहारा नहीं लिया यद्यपि वे पुरुषोत्तम कहलाये यानि पुरुषों में उत्तम, पुरुष को होना चाहिए तो वैसा होना चाहिए किन्तु कहीं भी रामचंद्र जी को योगी नहीं कहा गया है | योगी सिर्फ कृष्ण जी को ही कहा गया है | ऐसा नहीं है कि योगी के भाव नहीं होते, होते हैं किन्तु उसके अधिकार में होते हैं और जब जिस भाव की आवश्यकता होती है, तब ही वो भाव प्रकट होता है | वो जब जो भाव चाहते हैं तब ही वो भाव प्रकट करते हैं जैसे यदि रामचंद्र जी या कृष्ण जी क्रोध नहीं करते तो तो रावण नहीं मरता, कंस नहीं मरता, जयद्रथ नहीं मरता, शिशुपाल नहीं मरता | अतः ये समझो कि ये भाव छोड़ने की नहीं अपितु कण्ट्रोल करने की चीज हैं |

समस्या ये है कि लोगों के ये विकार कच्चे होते हैं, वो इन भावों को पकने नहीं देते | कच्चा फल यदि आप तोड़ेंगे तो उसमें स्वाद नहीं आएगा | कच्ची अमिया तोड़ लीजिये, खट्टी होती है और वही जब आम बन कर पक जाती है तो वही आम बड़ा स्वादिष्ट हो जाता है | इन भावों को पकाना चाहिए | जैसे बहुत से फल गर्मी में आने पर पकते हैं, वैसे ही इन भावों को गर्मी से पकाएं | ये गर्मी आती है तप से | जब आप अपने मन की बात मन में ही रखते हैं, किसी से कहते नहीं है तो वह तप होता है | रहीम जी कहते हैं –

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय.

सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय | (३*)

यदि आप किसी से अपनी व्यथा कह भी देंगे तो लोग उस व्यथा को कम नहीं कर सकते, उसे बाँट नहीं सकते किन्तु उसका मजाक अवश्य उड़ा सकते हैं | कोई आपकी व्यथा जब बाँट ही नहीं सकता तो कहने से क्या लाभ | उसे मन में ही रखिये और उस व्यथा से उस मन को तपाइए | ये तप और भी बहुत चीजों से हो सकता है | जब आपका आलू की सब्जी खाने का मन हो, उस दिन आलू की सब्जी मत खाइए | इस मन को तपाइए | जब AC में सोने का मन हो, बस उसी दिन मत सोइए इस से ये मन तपेगा | जो मन कर रहा है, उसी का उल्टा कीजिये | धीरे धीरे इस मन को तपने की आदत पड़ जायेगी | जब आप मन को पकाते हैं तो तप होता है | उस तप से इन भावों को पोषित कीजिये और इन भावों को पकाइए | जब ये भाव पक जाते हैं तब ये भाव बड़े काम की चीज हो जाते हैं और रस देते हैं |

समस्या ये है कि आज लोग, इन भावों को पकाते नहीं है और ऐसे लोग भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं या कहें इमोशनल होते हैं | हाल रो देंगे, हाल खुश हो जायेंगे, हाल परेशान हो जायेंगे | ऐसे ही लोग मानसिक रोगों के शिकार होते हैं | ऐसे ही लोगो को तनाव, चिंता, उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), अवसाद (Depression) होता है | ऐसे लोग भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं | इनके भाव कच्चे रह जाते हैं | ये भाव छोड़ने की चीज नहीं है बल्कि इन भावों को पकाना चाहिए | “त्रिगुणात्मकः प्रकृति” से ये भाव भी तीन प्रकार के होते हैं | जो भाव कच्चे रह जाते हैं, वो तमोगुणी होती है | जो भाव अधपके होते हैं, वो रजोगुणी होते हैं और जो भाव पक जाते हैं, मीठे हो जाते हैं वो सतोगुणी होते हैं | हमें अपने भावों को सतोगुणी बनान चाहिए ये छोड़ने की चीज नहीं है | यदि मन है तो भाव भी होंगे ही | जिसके भीतर कोई भाव ही नहीं है वो या तो कब्र में पड़ा हुआ है या चिता पर लेटा हुआ | यदि जिन्दा मनुष्य है तो भाव होंगे ही | हमको चाहिए कि हम अपने कच्चे भावों को, तमोगुणी भावों को अधपका बनाते हुए यानि रजोगुणी होते हुए उनको पका लें और उनको सतोगुणी बना ले | जिसके भाव सतोगुणी हो जाते हैं, जिसके भाव पक जाते हैं, वो व्यक्ति आनंद की स्थिति में रहता है | आपके पास आने वाले लोग भी उस आनंद को महसूस कर सकते हैं | जिनके भाव कच्चे होंगे, तमोगुणी होंगे वो दुखी रहेंगे और जो भी उनके पास आकर बैठेगा वो भी दुखी ही रहेगा | यही कुसंग है ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए | जिनके भाव अधपके है, वो रजोगुणी है, ऐसा आदमी कभी सुखी हो जाता है, कभी दुखी हो जाता है, कभी किसी को सुखी कर देता है और कभी किसी को दुखी कर देता है | इस प्रकार भावों की तीन स्थितियां होती हैं और हमको कोशिश करनी चाहिए इन भावो को पकाने की, सतोगुणी होने की और ये भाव तप से ही पकते हैं | इसी बात को गीता में कहा गया है –

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।।१४।। (४*)

हे कुंतीपुत्र ! इंद्रिय और विषयों का संयोग (भाव) तो सर्दी-गर्मी, सुख-दुःखादि देने वाला है, उत्पत्ति और विनाशशील (याने अनित्य) हैं; इसलिये हे भारत ! उनको तू सहन कर ।

सुख तथा दुःख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्धान होना सर्दी और गर्मी की ऋतुओं के समान आने जाने वाला है, यहाँ रजोगुण की बात हो रही है क्योंकि रजोगुणी मनुष्य कभी सुखी होता है और कभी दुखी होता है | वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं (भाव) और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे अर्थात जैसे ऊपर बताया है बाहरी वातावरण की या मन के हिसाब से न चले और उसे तपाये | गर्मी हो रही है तो भाग के AC के पास न जाए बल्कि उस गर्मी को भी सहे और उस सर्दी को भी सहे | माघ मास में हमारे यहाँ नदी में सुबह सुबह नहाने को कहा गया है जबकि माघ मास में ठण्ड पड़ती है क्यों ? क्योंकि इस शरीर को आरामतलबी की आदत न पड़े | क्योंकि जब उसके पास ये साधन नहीं होंगे तब उसे दुःख होगा किन्तु यदि उसे एक बार विपरीत परिस्थितियों की आदत पड़ गयी तब फिर उसे अगर AC नहीं भी मिलेगा तो उसे दुःख नहीं होगा, अगर एक टाइम रोटी नहीं भी मिलेगी तो भी कष्ट नहीं होगा क्योंकि आप अपने मन को तपा कर उसे सुदृण कर चुके हो | आगे कहते हैं –

क्रमशः

१* – नाट्य शास्त्र – भरत मुनि

२* – रामचरित मानस – अरण्यकाण्ड

३* – रहीम के दोहे

४* – भगवद गीता – २|१४

नटराज का नर्तन

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।१५।। (१*)

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! जिस बुद्धिमान पुरुष को वे मात्रास्पर्श (इंद्रिय-विषय संयोग) व्यथित नहीं करते, उस दुःख-सुख में समान रहने वाला मोक्ष के योग्य होता है ।

जब मनुष्य इस प्रकार सुख और दुःख में समान रहना सीख लेता है तब वह मोक्ष के योग्य होता है | मोक्ष के योग्य होता है का मतलब ये नहीं कि मोक्ष मिल ही जाता है लेकिन ये आखिरी स्टेज अवश्य है |

गीता जी, आपने बताया कि जो मनुष्य इन्द्रिय विषय संयोग अर्थात विभिन्न भावों से व्यथित नहीं होते, वे मोक्ष के योग्य होते हैं | इन भावों को इन्द्रिय विषय संयोग क्यों कहा गया है ? भाव तो मन में रहते हैं, फिर इनका इन्द्रियों से और विषय से कैसा संयोग है ? इसको साफ़ साफ़ मुझे समझाएं | – मैंने विषय को और अच्छे से समझने के लिए, थोड़ा और कुरेदने की कोशिश की |

हम्म, उन्होंने चलते चलते, बिना मेरी तरफ देखे कहना प्रारंभ किया | इसके लिए तुम्हें ये समझना पड़ेगा कि ये भाव, ये मनोविकार बनते कैसे हैं ? ये जानना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि बहुधा हम समझते हैं कि हमारे मन में ये भाव है किन्तु होता कुछ और है और इस प्रकार का ये भ्रम इसलिए होता है क्योंकि मनुष्य भावों को नहीं पहचान पाता | पहचानेगा तब, जब उसे एक एक भाव स्पष्ट पता होगा कि ये क्या होते हैं | भावों को तो मैंने पहले ही बता दिया है, अब ये पैदा कैसे होते हैं, इसको सुनो, जिस से तुम भावों को और अच्छे से समझ सको |

जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो वो कोई ज्ञान लेकर नहीं आता है और न ही मनोविकार लेकर आता है | जब बच्चा पैदा होता है तब तो वो एक कोरा कागज़ होता है | वो सिर्फ एक चीज लेकर आता है (अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के वशीभूत होकर) और वो है सुख और दुःख की अनुभूति, यानि वो सुख महसूस कर सकता है और दुःख महसूस कर सकता है | इसके अलावा न वो कोई ज्ञान लेकर आता है और न ही कोई भाव लेकर आता है, न प्रेम का, न घृणा का, कैसा भी भाव लेकर नहीं आता है, बिलकुल कोरा कागज पैदा होता है | अब उसे ये सुख और दुःख महसूस कैसे होते हैं या इनकी अनुभूति कैसे होती है ?

इसको ऐसे समझो कि जब हम किसी प्रतिकूल परिस्थिति में जाते हैं, तब हम दुःख महसूस करते हैं | जैसे भारत में बहुत से गरीब लोग, जमीन पर, फुटपाथ पर सोते हैं और इसी भारत में बहुत से ऐसे अमीर लोग भी हैं जो बड़े भारी-भारी डनलप के मुलायम गद्दों पर भी सोते हैं | अब यदि कोई ऐसा जादू किया जाय कि जमीन पर सोने वाले आदमी को डनलप के गद्दे पर डाल दिया जाय और डनलप के गद्दे पर सोने वाले आदमी को फुटपाथ पर या सड़क पर डाल दिया जाए तो दोनों ही दुखी होंगे, सुखी कोई नहीं होगा | क्यों ? क्योंकि वो दोनों प्रतिकूल परिस्थिति में पहुचं गए हैं | जिस परिस्थिति की उनको आदत है, यदि वो परिस्थिति बदल जाती है तो हमको दुःख महसूस होता है और यदि परिस्थिति वही बनी रहती है तो हमको सुख महसूस होता है इसके अलावा सुख दुःख कुछ नहीं है | यदि किसी नाली में पड़े रहने वाले सूअर को बढ़िया गद्दों पर ले जाए और बढ़िया बढ़िया खाना बना कर खिलाये तो उसे कोई सुख महसूस नहीं होगा और यदि ऐसे ही हमको कोई उठा कर कीचड़ में डाल दे, तो भी सुख की अनुभूति नहीं होगी | यानि जो जिस परिस्थिति में है, उसे उसी में सुख मिलता है और परिस्थितियों के बदलने पर, दुःख महसूस होता है जैसे मछली है, पानी में रहती है उसे आप खुले में लाकर डाल दीजिए, मर जायेगी और ऐसे ही आपको कोई उठा कर पानी में डाल दे, तो आपकी भी वैसी ही हालत हो जायेगी | यानि दुःख और सुख की अनुभूति परिस्थिति बदलने और न बदलने से होती है |

वो जो बच्चा पैदा हुआ, वो जब गर्भ में था तो एक थैली सी में लिपटा हुआ था और उस जेल में एक fluid भरा हुआ था, उसमें वो पड़ा हुआ था, जिसमें वो घुटनों को ऊपर करके और बड़ा सिकुड़ा हुआ पड़ा हुआ था | अब जब वो पैदा हुआ तो वो प्रतिकूल परिस्थति में आया | पहले तो सूखे में आया और फिर जो थोड़ा बहुत fluid लगा हुआ था, उसे भी पोंछ दिया गया और जेल हटा दिया गया | जो नाल जुड़ी हुई थी, उसे भी हटा दिया गया | उस नाल की वजह से, उसे पहले साँस नहीं लेनी पड़ रही थी | मां की सांस से उसकी सांस चल रही थी, मां के भोजन से उसको भोजन मिल रहा था, मां के ब्लड सर्कुलेशन से उसका ब्लड सर्कुलेशन चल रहा था | उसे कुछ नहीं करना पड़ रहा था | बाहर आते ही उसे खुद सांस लेनी पड़ी | बाहर आते ही उसको भूख भी लगी | बाहर आते ही, उसकी बहुत सी परिस्थितियां बदल गयी | इसीलिए पैदा होते ही बच्चा रोता है | अगर पैदा होते ही बच्चा नहीं रोता है, तो डॉक्टर को चिंता हो जायेगी कि ये रोया क्यों नहीं तो डॉक्टर उसको रुलाता है यानि उसकी अनुभूतियों को जगाता है |

पुराने जमाने में क्या होता था, जब कोई बच्चा पैदा होता था उसके मुंह में, दूध में रुई डुबो कर उसके मुंह में थोड़ा सा दूध डाल देते थे | अब निपल चल गयी हैं, तो उसके मुंह में निपल लगा दी जाती है या मां अपने आँचल से लगा लेती है | हम बेसिकली कर क्या रहे हैं, उसके मुंह में निपल लगा कर के ? हम उसके ध्यान को, जो विपरीत परिस्थितियों पर लगा हुआ है, जिसकी वजह से वो दुःख का अनुभव कर रहा है (अगर वो विपरीत परिस्थिति को महसूस नहीं करेगा तो दुःख भी महसूस नहीं करेगा) | हम उसके मुंह में निपल देकर उसके ध्यान को बाँट देते हैं और वो चुप हो जाता है | जब तक मुंह में निपल लगी हुई है तो वो चुप हो जाता है, जैसे ही मुंह में से निपल निकल जाती है वो रोने लगता है और हम फिर निपल मुंह में लगा देते हैं और कई हफ़्तों तक ये प्रक्रिया चलती रहती है | अब वो धीरे-धीरे, यहाँ से वो पहला अनुभव करता है, न तो उसे ये पता है कि ये मेरा मुंह है और न ही उसे ये पता है कि ये क्या चीज है लेकिन उसे पहला अनुभव होता है कि जब ये चीज मेरे मुंह में लगी होती है तो मेरा दुःख ख़त्म हो जाता है | यहाँ से उसे ज्ञान मिलना प्रारंभ होता है, लेकर तो कुछ नहीं आया वो, पर अब वो चीजों में सम्बन्ध जोड़ता है और यहाँ से उसकी बुद्धि बनानी शुरू होती है और वो ये सोचता है कि इस चीज का मेरे सुख या दुःख से सम्बन्ध है क्योंकि जब ये चीज मुझे मिलती है तो  मेरा दुःख ख़त्म हो जाता है और ये चीज सुख पैदा कर देती है | ये पहला ज्ञान हुआ उसको |

धीरे धीरे वो प्रैक्टिस चलती है, अब जब वो रोता है, मुंह में से इस निपल के निकल जाने के बाद, तो वो इसलिए नहीं रोता कि उसका ध्यान विपरीत परस्थिति पर चला गया है बल्कि अब वो इसलिए रोता है कि वो निपल उसके मुंह में से निकल जाती है || धीरे धीरे वो और सम्बन्ध जोड़ता है, और अनुभव करता है | वो ये देखता है कि कोई न कोई ये निपल आकर लगाता है, मेरे मुंह में | अपने आप ये मेरे मुंह में नहीं लगती है, अगर गिर जाती है तो | कोई न कोई इसको आकर लगाता है मेरे मुंह में | यहाँ से वो दूसरा कार्यकारिणी सम्बन्ध जोड़ता है, यहाँ से तर्क बुद्धि बननी शुरू होती है उस बच्चे की | वो ये देखता है कि ये जो कोई आता है और मेरे मुंह में निपल लगाता है, इसका सम्बन्ध उस निपल से है और उस निपल का सम्बन्ध मेरे सुख दुःख से है और धीरे धीरे उसे ये समझ में आने लगता है कि इस आदमी से मेरे सुख दुःख का सम्बन्ध है | धीरे धीरे, उस निपल लगाने वाले को वो पहचानने लगता है | अगर मां आती है और उसे अपने आँचल से लगाती है तो वो ये नहीं पहचानता कि ये मेरी मां है बल्कि वो ये देखता है कि ये आती है तो मेरा दुःख ख़त्म हो जाता है और उसके बाद कोई भी औरत अगर कमरे में आती है तो वो चुप हो जाता है, कोई भी औरत उसको उठा लेती है तो वो चुप हो जाता है फिर वो धीरे धीरे समझता है कि नहीं, ये perticular औरत आती है तब ही मुझे निपल लगती है, हर कोई आकर मुझे आँचल से नहीं लगाता है सो धीरे धीरे उस perticular औरत को पहचानना शुरू करता है | इसके पहले तो सब औरतें उसकी नजर में एक सी हैं | यदि आपको अंग्रेजो के साथ रख दिया जाय तो आप एकदम से सबको नहीं पहचान पायेंगे उनके नाम से | लेकिन समय के साथ आप धीरे धीरे उनको पहचानना शुरू कर देंगे ऐसे ही वो बच्चा धीरे धीरे उस perticular औरत को पहचानना शुरू कर देता है | अब वो ये जान गया कि इस औरत से मेरे सुख और दुःख का सम्बन्ध है | सो जैसे ही मां कमरे में आती है वो चुप हो जाता है और जैसे ही मां जाने लगती है, वो रोने लग जाता है |

जब वो और बड़ा होता है, जब उसे ये ज्ञान हो गया कि इस चीज से मेरे सुख और दुःख का सम्बन्ध है तब उसके भीतर मन पैदा होता है और उस मन से इच्छाएं पैदा होती है | अब वो ये चाहता है कि ये औरत मेरे पास बनी रहे, जैसे ही वो जाने लगेगी, वो रोना शुरू कर देगा | जाने लगेगी और बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया है तो कपड़ा पकड़ लेगा, छोड़ेगा नहीं | मां जब उसे प्यार से उठाएगी, उसे सुलायेगी तब जायेगी | अब वो बच्चा इच्छा करता है कि ये औरत मेरे पास बनी रहे ताकि मुझे सुख मिलता रहे |

अब देखो, जब बच्चा पैदा होता है तो केवल अनुभूति लेकर आता है | फिर उसमें बुद्धि पैदा होती है | बुद्धि क्या है ? कार्यकारण सम्बन्ध का ज्ञान | कार्यकारण सम्बन्ध क्या है ? कि इस चीज से, या इस आदमी से, मुझे सुख रुपी कार्य हो रहा है | तो उसे उस कार्य और उसके कारण का, दोनों चीजों का ज्ञान होता है | उस ज्ञान के बाद, उसका मन पैदा होता है और उसमें इच्छा उत्पन्न होती है, उस कारण को अपने पास रखने की | धीरे धीरे, आगे जाकर यही प्रेम बन जाता है (कैसे बन जाता है प्रेम ? प्रेम में भी ऐसी ही इच्छा होती है न ! पर प्रेम पर बाद में)

क्रमशः

१* भगवद गीता – २|१५

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