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Feb 05

अघोरी बाबा की गीता – भाग ७

नटराज का नर्तन

मनुष्य सबसे पहले अपनी चिंता करता है, फिर अपने परिवार की, उसके बाद समाज की और सबसे बाद में देश की | लेकिन नीति कहती है कि जब देश पर विपत्ति आये तो मनुष्य अपने गाँव/परिवार को त्याग दे और देश को बचाने के प्रयत्न करे | जब गाँव/समाज पर मुसीबत आये तो परिवार का त्याग करे और पहले गाँव की चिंता करे और जब परिवार पर बन जाए तो छोटे बेटे/बेटी का त्याग करे (यदि उसके त्याग से परिवार के अन्य सदस्यों की जान बचती है तो) और बाक़ी परिवार को बचाए | ऐसी स्थिति में यही कर्तव्य है | ये तो हुआ नीति के अनुसार | *१

अब इसको ऐसे भी विचारो कि यदि कोई व्यक्ति आपकी आखों के सामने कोई दुष्कर्म करता हो तो उसे रोकना भी आपका कर्तव्य है | चाहे आपमें शक्ति है या नहीं है, किन्तु गलत का प्रतिरोध आवश्यक है | यदि प्रतिरोध न हो तो दुष्कर्म करने वाले का हौसला बढ़ता है और उसको चुनौती देना परम आवश्यक है | दुष्कर्म की प्रवृत्ति के ऊपर है कि आपका विरोध कैसा हो, आपका विरोध अहिंसक भी हो सकता है और हिंसक भी ! ये दुराचारी के अपराध की मात्रा पर है | यदि कोई किसी लड़की के साथ कुछ गलत करता है और ये आपकी आँखों के सामने होता है तो उस समय उसका विरोध करना ही कर्तव्य है | जैसे भीम ने हिडिम्ब को रोका जब वो हिडिम्बा को मारने के लिए दौड़ा | भीम ने उससे कहा, उस अबला पर क्या ताकत दिखाता है, दम है तो मुझ से लड़ | *२

मुझे ये बात कुछ हजम नहीं हुई | सामने दुश्मन शक्तिशाली हो तो लड़ना कहाँ तक समझदारी है ! मुझ से रहा नहीं गया और मैंने पूछ लिया –

ऐसा कोई शास्त्रोक्त उदाहरण दीजिये जहाँ शत्रु ताकतवर हो फिर भी कोई लड़ने गया हो ! भीम शक्तिशाली था, लड़ सकता था किन्तु एक कमजोर आदमी को क्यों लड़ना चाहिए, किसी शक्तिशाली से ?

तुम शायद जटायु को भूल गए | (*३) जटायु बूढा था और कमजोर था जबकि रावण त्रिलोकी था | फिर भी जटायु आखें बंद कर के नहीं बैठा रहा और युद्ध के लिए तत्पर हो गया क्योंकि उसे पता था यदि युद्ध में मारा गया तो सद्गति मिलेगी और जीत गया तो प्रसिद्धि और यश मिलेगा |

किन्तु यहाँ तो फिर एक और सवाल खड़ा हो गया – यदि कोई दुष्कर्म मेरी आँखों के सामने न हो तो क्या मुझे उसके बारे में कुछ नहीं करना चाहिए ?

जब तुम्हारे कुछ करने का समय आएगा तो विधि तुमको वहां पहुंचा देगी | अमेरिका में किसी के साथ कुछ होता है, तुम कुछ नहीं कर सकते | पूरी दुनिया में कहाँ क्या क्या हो रहा है, उसमें तुम कुछ नहीं कर सकते | जो तुम्हारे सामने हो रहा है, उसमें अवश्य तुम कुछ कर सकते हो | मध्य प्रदेश में प्रतिदिन 11 बलात्कार होते हैं, तुम क्या कर सकते हो ? यदि जटायु सीता को जाते हुए न देखता और बाद में उसे किसी और से पता चलता तो क्या वो रावण पर हमला कर देता ? नही, क्योंकि वो रामचंद्र जी का कर्तव्य था, उसका नहीं किन्तु जब विधि ने उसके सामने रावण को सीता ले जाते हुए प्रस्तुत किया तो उसका कर्तव्य उस दुष्कर्म को रोकना ही था | | सुग्रीव के साथ अत्याचार तो बहुत पहले हो गया था किन्तु रामचंद्र जी सुग्रीव की सहायता को नहीं आये | जब विधि ने उनको किष्किन्धा पहुंचा दिया तब ही उन्होंने सुग्रीव की सहायता की | तुम काल की गति में बाधा नहीं बन सकते और न ही काल को बदल सकते हो | किन्तु जब काल तुम्हारे समक्ष कोई परिस्थिति उत्पन्न कर दे, तब बड़ी बात है कि तुम अर्जुन की तरह हथियार रख देते हो या गीता से प्रेरित हो कर बिना किसी फल की चिंता किये, अनाचार को रोकते हो | उस समय, जटायु की तरह भिड जाना चाहिए, शत्रु का बल महत्व नहीं रखता अपितु तुम्हारी इच्छाशक्ति ज्यादा महत्व रखती है | जब तक भीड़ में से एक भी आदमी, गीता की इस बात को पढ़ने के बाद भी आगे बढ़ कर दुराचारी का हाथ नहीं पकड़ेगा तब तक अनाचार बढ़ता ही रहेगा | किसी भी अनाचार, भ्रष्टाचार, दुराचार के खिलाफ उठ के खड़े हो जाना चट्टान की तरह से यही मनुष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए |

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ || *४

इसलिए मनुष्य को हानि, लाभ, जीवन अथवा मरण इन सब की चिंता नहीं करनी चाहिए और अपने कर्तव्य के प्रति सचेत रहना चाहिए |

और जो तुमने दूसरी बात की, क्षमा करने की, जैसे युधिष्ठिर सोचता था, कौरवों को क्षमा करने की तो क्षमा के बारे में भी जानो | क्षमा के लिए भी कुछ pre-requisites हैं, कुछ पूर्व निर्धारित शर्तें होती हैं | जैसे, आप अपने ऊपर हुए अत्याचारों या अपने परिवार के ऊपर हुए अत्याचारों के लिए तो क्षमा कर सकते हो, क्योंकि वो केवल तुम तक सीमित है किन्तु दूसरे पर हुए अनाचार को तुम क्षमा कैसे कर सकते हो ! तुम हो कौन दूसरे के अनाचार को क्षमा करने वाले ? सुग्रीव पर हुए अनाचार को श्री राम कैसे क्षमा कर सकते थे ? नहीं कर सकते थे इसीलिए सुग्रीव की सहायता की | युधिष्ठिर ने भी कौरवों के अत्याचार को जब तक क्षमा कर सकते थे, तब तक किया | तुम्हें कोई प्रताड़ित करे, तब तुम तय कर सकते हो कि तुम्हें क्षमा करना है या नहीं किन्तु दूसरे के बारे में तय करने का आपको कोई अधिकार नहीं है | ये तो हुई पहली शर्त |

दूसरी शर्त क्षमा करने की ये है कि क्षमा वो कर सकता है जिसके पास शक्ति हो | युधिष्ठिर के पास अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव सभी थे जिनके पास अतुल बल था और वो जानता था कि वो कौरवों को मार सकता है किन्तु वो कौरवों को क्षमा करने का महत्त्व जानता था | श्री राम ने रावण को कितनी ही बार अलग अलग तरह से बताया कि तुम सीता को वापिस कर दो, श्री राम तुम्हारे अपराध को क्षमा कर देंगे क्योंकि क्षमा वीरों का आभूषण रही है | तुमने नहीं सुना क्या –

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो |

उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो। *५

जो सांप काट सकता है, किन्तु फिर भी न काटे तो वो क्षमा है लेकिन जो सांप काट ही न सकता हो, उसका क्षमा करना क्या और न करना क्या ? जो तुम उस लड़की के लिए उठ खड़े न हुए, ये न तो तुम्हारे क्षमा करने के कारण हुआ और न ही तुमने अपना कर्तव्य किया | इसे ही हमारे यहाँ भय कहा जाता है | तुम्हें ये भय था कि वो चार थे और तुम अकेले थे | तुम्हें ये भी भय था कि तुम्हें चोट आ सकती है, बाबा गायब हो सकते हैं और खामखाँ तुम एक पचड़े में फंस जाओगे |

यह बात सभी को ध्यान रखनी चाहिए कि –

न बिभेति रणाद यो वै संग्रामेsप्यपरान्ग्मुखा |

धर्मयुद्धे मृतो वापि तेन लोकत्रयं जितम || *६

जो मनुष्य युद्ध में नहीं डरता, पीठ नहीं दिखता और जो धर्मयुध्द में मृत्यु को प्राप्त होता है, वह तीनो लोको को जीत लेता है |

यदि स्वदेश अथवा स्वधर्म के लिए युद्ध करते करते मनुष्य की मृत्यु हो जाए, तो योगीजन जिस पद को ध्यान द्वारा पाते हैं, वही पद उस मनुष्य को भी मिलता है | किन्तु यहाँ यह पूर्णतः स्पष्ट होना चाहिए कि स्वधर्म क्या है | कलियुग में प्रायः मनुष्य स्वधर्म को अधर्म और अधर्म को स्वधर्म समझ कर लड़ता मरता रहता है | जैसे तुमने अपने कर्तव्य को अपनी दुर्बलता से, अपने भय से ढक लिया | किन्तु ये सिर्फ तुम्हारे साथ नहीं है अपितु आजकल सभी की यही स्थिति है | मनुष्य धर्म अधर्म में भेद नहीं कर पाता है और शास्त्रों के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगाने लगा है | उसमें मनन और चिंतन करने लायक बुद्धि भी नहीं है और न ही उसने समुचित अध्ययन ही किया है किन्तु वो व्याख्या सारी दुनिया की, सारे शास्त्रों की कर सकता है | शास्त्रों में कर्तव्य बहुत ही गूढ़ विषय है, जैसे मैंने तुमको उदाहरण देकर बताया, इन सब शास्त्रों को हो सकता है तुमने भी पढ़ा हो, किन्तु तुमने इस प्रकार उन से निकलने वाले विषयों पर समुचित चिंतन नहीं किया और इसीलिए तुम अपने कर्तव्य से विमुख हो गए | एक बात और यहाँ स्पष्ट कर दूं कि जो एक व्यक्ति का कर्तव्य किसी समय हो सकता है, हो सकता है उसी परिस्थिति में दूसरे का वह कर्तव्य न हो | विभिन्न देश, काल और परिस्थिति के अनुसार कर्तव्य भी भिन्न भिन्न होते हैं और हम जिस अवस्था में रहे, हमें उन्ही के उपयोगी कर्तव्य करने चाहिए |

तुम्हारे इस प्रसंग से एक भाव जो मिलता है वो है भय का, जो कि सर्वथा ही घृणास्पद और परित्याज्य है | हमारे दर्शन, धर्म और कर्म के भीतर, हमारी समस्त शास्त्रीय विद्याओं के भीतर – यही एक मुख्य भाव है यानि भय का त्याग किया जाए | यदि तुमने कभी वेद पढ़े हों तो देखा होगा उसमें लिखा रहता है ‘नाभयेत’ ‘ अभीः’ अर्थात किसी से डरना नहीं चाहिए – यह बात बार बार कही गयी है | भय दुर्बलता का चिन्ह है और यही दुर्बलता मनुष्य को ईश्वर प्राप्ति के मार्ग से हटाकर उसे नाना प्रकार के पापकर्मो की ओर खींच ले जाती है | इसीलिए संसार के उपहास अथवा व्यंग्य की ओर तनिक भी ध्यान न देकर मनुष्य को निर्भयता से अपने कर्तव्य करते जाना चाहिए |

मुझे आशा है कि अब तुम्हारी समझ में ये आ गया होगा कि कर्तव्य क्या है और वो क्या है जिस से एक कर्म कर्तव्य बन जाता है ? कैसे, एक मनुष्य अपना आपा खो कर किसी को मार दे तो वो कर्तव्यभ्रष्ट कहलायेगा लेकिन वहीँ कोई सैनिक युद्ध में सैकड़ों दुश्मनों को मार डाले तो वो उसकी कर्तव्यनिष्ठा कहलाएगी क्योंकि कर्तव्य देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते हैं | पहले तो मनुष्य को जन्म से प्राप्त कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए और उसे कर चुकने के बाद सामाजिक जीवन में हमारे पद के अनुसार जो कर्तव्य हैं, उन्हें संपन्न करना चाहिए | सबसे श्रेष्ठ कार्य तभी होता है जब उसके पीछे किसी प्रकार का कोई भय न हो, कोई स्वार्थ की प्रेरणा न हो | तुम्हारे प्रसंग में तुम्हारे हृदय में भय भी था और स्वार्थ भी था | बस इसीलिए तुम अपने कर्तव्य से च्युत हो गए थे | आशा है, आगे भविष्य में यदि कोई ऐसा मौका दुबारा काल यदि तुमको देगा तो तुम उसे व्यर्थ नहीं जाने दोगे |

गीता जी, इधर से उधर घूम घूम कर मुझे ये सब बता रही थी | मैंने गीता जी की बात बड़े ध्यान से सुनी और इस बात को समझने की पूरी कोशिश करता रहा कि कर्तव्य क्या है, मेरे दिमाग की एक एक नस कीर्तन कर रही थी, पर मुझे समझ में आया कि मुझे उस समय बाबा की चिंता नहीं करनी चाहिए थी और उठ कर खड़ा हो जाना चाहिए था और इसीलिए बाबा उठ कर खड़े हो गए क्योंकि मैं बैठा रह गया | इस पूरे प्रसंग से मेरे ज्ञान चक्षु खुले लेकिन इस सारे प्रसंग में एक बात समझ में नहीं आयी, जो मैंने पूछना आवश्यक समझा और बोला –

मेरा एक और संशय है – मेरे दिमाग में अचानक एक सवाल और आया | कहीं ऐसा तो नहीं कि ये मुझे बड़ी बड़ी बातें करके भरमा रही हों |

पूछो – उन्होंने एक जगह रुक कर मेरी ओर देख कर कहा |

जी, आपने जो भी बातें कर्तव्य के बारे में बतायी हैं, ऐसा तो नहीं है कि ये सब बड़ी बड़ी बातें पौराणिक काल में चलती हों | ये सब आदर्श बातें हैं जिन्हें शायद आजकल कोई नहीं मानता | इतने आदर्श की बातो को अंगीकार करना मेरे हिसाब से तो संभव ही नहीं है |

क्रमशः –

१* – पंचतंत्र

२* – महाभारत – वन पर्व

३* – रामायण – अरण्यकाण्ड

४* – रामचरित मानस – अयोध्या काण्ड

५* – शक्ति और क्षमा – रामधारी सिंह दिनकर

६* – महानिर्वाण तंत्र

नटराज का नर्तन

मुझे पता है कि तुम बहुत मंहगी मंहगी रिसर्च मशीन बेचते हो | वो मशीन रिजल्ट सही दे रही हैं या नहीं, ये कैसे पता करते हो ? – उन्होंने बॉल मेरे ही पाले में फ़ेंक दी |

जी, उसके लिए एक स्टैण्डर्ड रिफरेन्स मटेरियल होता है जिस से उस मशीन को चेक किया जाता है | ये स्टैण्डर्ड रिफरेन्स मटेरियल एक आदर्श सैंपल होता है, जिस से उस मशीन को calibrate किया जाता है | इस कैलिब्रेशन में, एक ग्राफ खींचा जाता है जो एक आदर्श ग्राफ होता है, टेस्ट रिजल्ट का | यदि मशीन की वैल्यू इस ग्राफ के ऊपर या नीचे आ रही हैं, इसका मतलब मशीन गलत रिजल्ट दे रही है और यदि उसी ग्राफ के ऊपर मशीन रिजल्ट दे रही है तो उसका मतलब मशीन सही रिजल्ट दे रही है | इसी को मशीन का स्टैण्डर्ड कैलिब्रेशन कहते हैं | – मैंने उनको बताया कि कोई भी मशीन कैसे टेस्ट की जाती है |

बहुत अच्छा, स्टैण्डर्ड को हिंदी में क्या कहते हैं ? – गीता जी ने मुस्कुराते हुए पूछा |

जी आदर्श ! – मैं जवाब तो दे रहा था पर थोड़ा आश्चर्यचकित था कि ये भी तो आदर्श ही था, किन्तु ये आदर्श, गीता जी की बातों से कैसे जुड़ा हुआ है !

बढ़िया | यानि किसी भी चीज को यदि सही करना हो तो उसे आदर्श परिस्थिति के सापेक्ष ही देखा जाता है | जब ये बात आजकल के विज्ञान में चलती है तो शास्त्रों से यदि मैं इस जीव के लिए आदर्श कर्तव्य ग्राफ प्लाट कर रही हूँ तो क्या गलत है ! इस से तुमको पता चल जाएगा कि इनमें से तुम्हारे लिए क्या मुश्किल है | यदि तुम ऐसी परिस्थितियों में फंसते तो तुम्हारी वैल्यू उस ग्राफ से कितना ऊपर या नीचे जा रही है और उस ग्राफ तक आने के लिए तुमको किन चीजो को कम या ज्यादा करना होगा, अपने अन्दर | तुमको ये तो पता चल ही गया न, कि अभी तुम इस स्टैण्डर्ड ग्राफ को मैच नही करते हो | कैसे करोगे, इसी के लिए बाबा ने हम सबको काम पर लगाया है और इसीलिए तुम्हें कभी गुवाहाटी में कोई मिल जाता है, कभी मथुरा में कोई मिलता है और कभी तुम दिल्ली आ जाते हो और हम सब तुम्हारी वैल्यू अलग अलग तरीके से उस ग्राफ के ऊपर ले आएंगे, बाबा का ऐसा ही आदेश है |

किन्तु मैं तो देखता हूँ, सब ओर भय ही भय है | लोग लालच, क्रोध, भय आदि भावों से घिरे हुए हैं | वो कैसे इन आदर्श परिस्थितिओं को पा सकते हैं ? उनके लिए तो लगभग असंभव है | – मैंने फिर से प्रश्न दागा |

गीता जी थोड़ा सा मुस्कुराई और पुनः चलना प्रारंभ करती हुई बोली – साफ़ साफ़ बोलो, कि जैसे तुम भय के कारण उन चार लड़को को रोकने के लिए नहीं उतरे, वैसे ही तुम जानना चाहते हो कि उस भय से कैसे मुक्ति मिले !

मैंने तुमको आदर्श के बारे में जितनी भी बातें बतायी, अब फिर से सोचो, क्या वो आदर्श बातें हैं ? वो आदर्श तो तब होती जब मैं तुमको सिर्फ कुछ शिक्षाएं ही देती मसलन माता पिता की आज्ञा माननी चाहिए | गुरु की आज्ञा माननी चाहिए | पत्नी को पति की बात माननी चाहिए और इन सब बातों के बाद मैं तुमको ये नहीं बताती कि इनको कैसे किया जाए तब तो ये आदर्श बातें होती तब लगता कि ये हो ही नहीं सकता किन्तु यहाँ तो मैंने तुमको अनेकानेक उदाहरण भी दिए | माता पिता की बात मानी जाए, किन्तु शास्त्रोंमुख हो कर, जैसे चिरकारी ने मानी | चिरकारी ने सिर्फ सोचा, कोई काम नहीं किया तो उस आदर्श को कैसे अपनाया जाए, ये भी मैंने बताया ? मैंने ये भी बताया कि कैसे पार्वती ने माता पिता की चिरौरी की और तुमको बताया कि माता पिता और गुरु यदि तुम्हारी बातों से असहमत हों तो उनको कैसे सहमत किया जाये | यहाँ आदर्श तो ये है कि माता पिता की बात मानी जाए किन्तु वो असहमत हों तो कैसे उनसे अनुरोध किया जाए, ये भी मैंने तुमको बताया तो फिर ये केवल एक आदर्श स्थिति का मृत ज्ञान कैसे हो गया ? ये तो वस्तुतः पूरा उदाहरण देकर मैंने बताया है कि कैसे इन आदर्श कर्तव्यों को तुम कर सकते हो, शास्त्रों को पढ़ कर, माता पिता की चिरौरी कर के अथवा यदि आखों के सामने कुछ गलत हो रहा है तो उसका विरोध कर के |

मैंने फिर से टोका – वो तो ठीक है लेकिन जो भी उदाहरण दिए, वो बहुत पुराने थे | आजकल तो भय से आगे कोई निकल ही नहीं पाता है | ऐसा पुराणकाल में होता होगा, किन्तु आजकल तो ये होता ही नहीं है |

गीता जी हंसने लगीं फिर बोली – तुम स्वयं डरते हो, इसलिए तुमको दुनिया में सभी दुर्बल चरित्र के लगते हैं | जो जैसा होता है, उसको दुनिया वैसी ही दिखती है | यदि कोई धन का लोभी होगा तो उसे दुनिया पैसे के पीछे भागती हुई ही दिखेगी | यदि कोई आध्यात्मिक होगा, तो उसे वैसे ही लोग दिखाई देंगे | यही हाल तुम्हारी मनस्थिति का है किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं | यदि तुम्हें ये सब पौराणिक बातें लगती हैं तो सोचो पन्ना धाय किस समय की हैं जिन्होंने अपने बेटे को राजकुमार की जगह लिटा दिया और अपने पुत्र के बारे में न सोच कर देश के बारे में पहले सोचा, क्या उसने अपने भय पर जीत न पायी ? सोचो, मंगल पाण्डेय किस मिटटी का बना होगा, जो अकेले अंग्रेजो से लड़ गया, किसलिए ? क्योंकि उसे गाय की चर्बी मुंह से न चबानी पड़े और भयमुक्त हो कर अंग्रेजो से लड़ते लड़ते शहीद हुआ | जरा सोचो उस भगत सिंह के बारे में जो सिर्फ २३ साल की उम्र में हँसते हँसते फांसी चढ़ गया, उसे न मृत्यु से डर लगा और न ही उसके घर वालों ने उस से कहा कि माफ़ी मांग लो ! उन सबने अपने डर पर विजय प्राप्त की और आज भी देश पर लड़ने वाले सैनिक जान हथेली पर रख कर घूमते हैं | क्या तुमको अभी भी यही लगता है कि लोग डरते हैं ? बाबा राम रहीम के खिलाफ केस लड़ने वाली लड़कियां, जिनके भाई तक को मार डाला गया, बिना पिता के उस डर से जीत कर ही, वो लड़कियां  केस के आखिर तक पहुंची  |

आज भी लोग भय पर जीत पाते हैं और एक तुम हो जो तुम्हें लगता है सब लोग भय में ही जी रहे हैं | इसीलिए मैंने पहले ही कहा, तुम्हारे कर्तव्य शास्त्रोक्त होने चाहिए और शास्त्र यही सिखाता है कि विभिन्न परिस्थितियों में भय मुक्त हो कर यदि युद्ध भी करना पड़े तो करना चाहिए, चाहे उसमें तुम्हारी मृत्यु ही क्यों न हो जाए क्योंकि उस युद्ध में भी तुम्हारी विजय है, मरने के बाद योगियों के जैसी गति अथवा ज़िंदा रहने पर यश | दोनों ओर ही जीत है इसीलिए कर्तव्य करने में भय का कोई स्थान नहीं है | फिर भी यदि तुम्हारे मन में भय है तो इसकी तीन वजह हो सकती हैं –

पहली कि तुम्हें स्वयं पर विश्वास नहीं है कि तुम भयमुक्त हो सकते हो | यदि स्वयं पर विश्वास नहीं है तो गीता पर विश्वास रखो, अर्जुन भी तुम्हारी तरह ही भय में है कि इन गुरुजनों को मार कर वो पाप करेगा और नरक का भागी होगा और परलोक की सोच कर भयातुर है | (*1) किन्तु सोचो कि वो परलोक की चिंता कर रहा है और तुम तो इसी लोक के कर्म प्रपंचो के भय से बाहर नहीं निकल पा रहे हो | अतः जैसे भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को उस भय से मुक्त किया ऐसे ही उस गीता पर विश्वास रख कर तुम भी इस भय को त्याग दो | किन्तु दूसरी बात हो सकती है कि तुम गीता पर भी विश्वास न रखते हो | यदि तुमको गीता पर भी विश्वास नहीं हैं फिर भी कोई बात नहीं है | फिर भगवान् की बातों पर विश्वास करो (मामेकं शरणम व्रज – २* ) क्योंकि पूरी गीता में कही भी कृष्ण नहीं बोले हैं, पूरी गीता में सब जगह भगवान् उवाच लिखा हुआ है, वह स्वयं भगवान् की वाणी है | उस पर विश्वास रखो और उनके कहे अनुसार चलो और तीसरी बात हो सकती है कि तुम्हें भगवान् पर भी विश्वास नहीं है | यदि तुम्हें भगवान् पर भी विश्वास नहीं है तो गीता ज्ञान तुम्हारे लिए नहीं है | तुम सांसारिक मोह बन्धनों से इतने घिरे हुए हो कि उनसे उत्पन्न भय से ही बाहर नहीं निकल पा रहे हो, योगी कैसे बनोगे ? गीता समझने के लिए योगी होना पड़ेगा, पहले अर्जुन जैसा शास्त्रों का अध्ययन करने वाला बनना होगा | तुम्हें उस पथ पर ले जाने के लिए ही बाबा ने हम सबको नियुक्त किया है कि तुम्हारी मूढ़ बुद्धि से उठा कर तुमको ज्ञान कराया जाये और तुमको गीता का ज्ञान दिया जाए | ऐसा ही बाबा ने सोचा है | विश्वास करो कि तुम्हें वो सब प्राप्त होगा वर्ना गीता तो जाने कितनो ने पहले से पढ़ रखी है लेकिन वो अपने जीवन में नहीं उतार पाते क्योंकि उनको प्रैक्टिकल ज्ञान नहीं मिल पाता और उनमें स्वयं ये सब जानने की जिज्ञासा नहीं होती | तुम्हारे लिए बाबा ने पूरा कोर्स तैयार किया हुआ है जिसमें प्रैक्टिकल भी है और थ्योरी भी है | क्योंकि तुम कलियुगी जीव हो, इतनी आसानी से नहीं समझ पाओगे | अर्जुन ने द्रोणाचार्य से ज्ञान लिया था इसलिए उसके पास पहले से शास्त्रों का ज्ञान था किन्तु तुम्हारे पास तो एक गुरु तक नहीं है किन्तु अब चिंता मत करो, अब तुम्हें बाबा का सानिध्य प्राप्त हैं | उन्होंने तुमको जो अभी तक बताया है, वो तुमको पहले से नहीं पता था इसी प्रकार पहले तुम्हारा बेस बनेगा फिर प्रैक्टिकल होगा लेकिन अब पहले तुम बताओ कि तुम्हें तीनो में से किस पर विश्वास नहीं है |

बात मेरे ऊपर आ गयी थी | यहाँ ये बात आ गयी थी, कि बाबा की गीता आगे बढ़ेगी या नहीं | मैं गीता ज्ञान के लायक हूँ भी या नहीं | मैं यहाँ फिर से कोई दुर्बलता दिखाता हूँ तो हो सकता है गीता जी आज ही सब ख़त्म कर दें | मैं क्या करूँ ? मैं फिर से भयभीत हूँ | मोह में हूँ | यदि मुझे भयहीन होना है तो अपनी बात को दृढ़ता से रखना होगा और विश्वास के साथ रखना होगा | जो बात समझ में नहीं आ रही, उसकी तह तक जाना होगा, तब ही मेरे गीता को समझने का कुछ फायदा है | ऐसा मन में निश्चय करके मैंने गीता जी से पूछा –

आपने बताया कि मैं संसार से उत्पन्न मोह बन्धनों से घिरा हुआ हुआ हूँ और उसी से मेरे अन्दर भय उत्पन्न हुआ है | आप इस भय के नाश के लिए, मुझे बताइये कि कैसे संसार मोह पैदा करता है और कैसे उस मोह से भय पैदा होता है और मैं कैसे इस भय को समाप्त कर सकता हूँ ?

क्रमशः

१* – भगवद गीता – 1|३८

२* – भगवद गीता – १८|६६

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