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Nov 27

मनुष्य जन्म का सार

धर्मे रागः श्रुतो चिंता दाने व्यसनमुत्तमम । इन्द्रियार्धेषु वैराग्यं संप्राप्तं जन्मनः फलम ।।

सन्दर्भ – कात्यायन ने धर्म को समझने के लिए कठोर तप किया, जिस से आकाशवाणी हुई और उसने कहा की हे कात्यायन तुम पवित्र सरस्वती नदी के तट पर जा कर सारस्वत मुनि से मिलो । वे धर्म के तत्व् को जान ने वाले हैं । वे तुम्हें धर्म का उपदेश प्रदान करेंगे ।

यह सुन कर मुनिवर कात्यायन मुनिश्रेष्ठ सारस्वत जी के पास गए और भूमि पर मस्तक रख कर उन्हें प्रणाम कर के अपने मन की शंका को इस प्रकार पूछने लगे – महर्षे ! कोई सत्य की प्रशंसा करते हैं, कुछ लोग तप और शौचाचार की महिमा गाते हैं, कोई साँख्य (ज्ञान) की सराहना करते हैं, कुछ अन्य लोग योग को महत्व देते हैं, कोई क्षमा को श्रेष्ठ बतलाते हैं, कोई इन्द्रिय संयम और सरलता तो कोई मौन को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं, कोई शास्त्रों के व्याखान की तो कोई सम्यक ज्ञान की प्रशंसा करते हैं, कोई वैराग्य को उत्तम बताते हैं तो कुछ लोग अग्निष्टोम आदि यज्ञ-कर्म को श्रेष्ठ मानते हैं और दुसरे लोग मिटटी के ढेले, पत्थर और सुवर्ण मैं समभाव रखते हुए आत्मज्ञान को ही सबसे उत्तम समझते हैं । कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में प्रायः लोक की यही स्तिथि है । अतः सबसे श्रेष्ठ क्या है ?

सारस्वत जी बोले – ब्राह्मण ! माता सरस्वती जी ने मुझे जो कुछ बताया है, उसके अनुसार मैं सारतत्व का वर्णन करता हूँ, सुनो ! धन, यौवन और भोग जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा की भाँती चंचल है । यह जान कर और इस पर भली भाँती विचार करके भगवान् शंकर की शरण में जाना चाहिए और दान भी करना चाहिए । किसी भी मनुष्य को कदापि पाप नहीं करना चाहिए, यह वेद की आज्ञा है और श्रुति भी यही कहती है की महादेव जी का भक्त जन्म और मृत्यु के बंधन में नहीं पड़ता । दान, सदाचार, व्रत, सत्य और प्रिय वचन, उत्तम कीर्ति, धर्म पालन तथा आयुपर्यंत दूसरो का उपकार – इन सार वस्तुओं का इस असार शरीर से उपार्जन करना चाहिए ।

अर्थ – राग हो तो धर्म में, चिंता हो तो शास्त्र की, व्यसन हो तो दान का – ये सभी बातें उत्तम हैं । इन सबके साथ यदि विषयों के प्रति वैराग्य हो जाए तो समझना चाहिए की मैंने जन्म का फल पा लिया है ।

इस भारतवर्ष में मनुष्य का शरीर, जो सदा टिकने वाला नहीं है, पाकर जो अपना कल्याण नहीं कर लेता, उसे दीर्घ काल तक के लिए अपनी आत्मा को धोखे में डाल दिया । देवता और असुर सब के लिए मनुष्य योनी में जन्म लेने का सौभाग्य अत्यंत दुर्लभ है । उसे पाकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिए, जिस से नरक में न जाना पड़े । महान पुण्य रुपी मूल्य देकर तुम्हारे द्वारा यह मानव शरीर रुपी नौका इसलिए खरीदी जाती है की इसके द्वारा दुःख रुपी समुन्द्र के पार पंहुचा जा सके । जब तक यह नौका छिन्न भिन्न नहीं हो जाती, तब तक तुम इसके द्वारा संसार समुन्द्र पार कर लो । जो नीरोग मानव शरीर रुपी दुर्लभ वस्तु को पाकर भी उसके द्वारा संसार सागर के पार नहीं हो जाता, वह नीच मनुष्य आत्म हत्यारा है । इस शरीर में रह कर यतिजन परलोक के लिए ताप करते हैं, यज्ञ कर्ता होम करते हैं और दाता पुरुष आदरपूर्वक दान देते हैं ।

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