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Dec 25

अघोरी बाबा की गीता – भाग ६

#नटराज_का_नर्तन
 
अगले दिन ही मैंने गीता जी मिलने का निश्चय किया लेकिन रविवार सुबह मैं पूजा करता हूँ तो थोडा लेट हो जाता है इसलिए शाम को ४-५ बजे के आस पास निकलने का तय किया | यही सोचते सोचते अखबार उठा कर पढने लगा | अचानक अखबार की खबर पढ़ कर जैसे करंट सा लगा |
 
“दिल्ली महिला आयोग अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने २० लड़कियां G.B.रोड से बचाई और पुलिस ने १७ लड़कियों को आधार कार्ड में १८ साल से बड़ी आयु होने के कारण वापिस G.B. रोड भेज दिया |”
 
मैं तुरंत दौड़ कर कोट की जेब से गीता जी के एड्रेस वाली पर्ची निकाल कर लाया | हे भगवान् ! ये तो G.B. रोड ही लिखा हुआ है | तो क्या अब मुझे वहां भी जाना पड़ेगा !!! नहीं नहीं, मैं उस एरिया में नहीं जा सकता | मुझ जैसे आदमी के लिए उस जगह पर पैर रखना भी गुनाह था | मैं नहीं जा सकता | क्या करू, ये कैसी दुविधा में डाल दिया बाबा ने | जाऊं या न जाऊं |
 
मुझे मेरे बड़े भाई की एक लाइन याद आयी जिसे में हमेशा परेशानी में याद करता हूँ | मेरी स्टूडेंट लाइफ में, एक बार मेरे ऊपर चोरी का इल्जाम लगा था, मेरे ही एक दोस्त की घर की शादी में | शादी का सारा पैसा कोई छीन कर भाग गया था और मेरे ऊपर आरोप लगा कि तुम्हारी मिली भगत थी, तुमने इशारा किया और मुझे धर लिया गया, पुलिस वुलिस का ड्रामा हुआ | तब मेरे दोस्त के घर वालों ने मुझे धमकाया कि अपने घर से पैसे मंगा दे, लूट के पैसे के बराबर, तो हम तेरे को छोड़ देंगे नहीं तो पुलिस केस हुआ तो तेरी सारी इन्जिनीरिंग धरी रह जायेगी, करैक्टर सर्टिफिकेट भी बिगाड़ देंगे | मैंने अपने बड़े भाई को फ़ोन किया और उनको बताया कि मुझे पैसे चाहिए, वो भी पूरे ८०,००० |
 
उन्होंने मुझ से पूछा – तूने चोरी की है ?
 
मैंने कहा – नहीं |
 
पक्का ? – इस बार जोर से पुछा |
 
कैसी बात कर रहे हो भाईसाहब | मैंने कोई चोरी नहीं की है | – मैंने उनको लगभग रोते हुए बताया था |
 
तो अब चाहे डंडा पड़े, चाहे पुलिस मारे, कुछ भी हो जाए यही सोच बोलते रहना | सच से मत हिलना | जब चोरी ही नहीं की तो किस बात के पैसे देना ? सुबह तक मैं आ जाऊँगा | सच बोलने के लिए कोई तुझे जान से तो नहीं मार सकता | पुलिस भी जान से नहीं मार सकती | तू चिंता मत कर | उनकी इस बात ने इतना विश्वास और हौंसला दिया कि मैं अगले २ घंटे तक वही सच बोलता रहा | वो डराते रहे, धमकाते रहे लेकिन मैं टस से मस नहीं हुआ और पैसे देने से भी मना कर दिया | २-३ घंटो के बाद मेरे दोस्त के घर वालों को यकीन हो गया और उन्होंने माफ़ी मांग कर मुझे मेरे रूम पर जाने दिया |
 
आज उनकी वो ही बात बरबस मुझे याद आ गयी | जब मैं गलत नहीं हूँ तो मुझे G.B. रोड जाने में किस बात का डर होना चाहिए ? मुझे पता है, मैं गलत आदमी नहीं हूँ, ये भी पता है कि गलत इरादे से भी नहीं जा रहा हूँ, तो क्यों नहीं जाना चाहिए | अगर कुछ नहीं मिला तो वहां से भी वापिस आ जाऊंगा | मैं जानता हूँ, मेरी आत्मा जानती है कि मेरे चरित्र में कोई दोष नहीं है | क्या पता यही से बाबा का कुछ सुराग मिल जाये | क्या पता ये कोई परीक्षा ही हो | जाना तो पड़ेगा ही | एक बार ही सही पर जाउगा | मैंने निश्चय कर लिया था | शाम को मैंने गाडी उठा ही ली और गूगल मेप से ढूढता हुआ पहुच ही गया |
 
ये एक अलग ही तरह की दिल्ली है | भीडभाड वाली, छोटी छोटी गलियां, लड़कियां सड़क पर इधर से उधर घूम रही हैं या घरों के बाहर बैठी हुई हैं | कैसे पता करू, गीता जी का ? डरते डरते एक लड़की से पुछा – गीता किधर रहती है (जानबूझ कर उस लड़की के आगे मैंने गीता के नाम के आगे जी नहीं लगाया )
उसने सडा सा मुंह बनाकर बोला – यहाँ से चौथा मकान उसी का है |
 
जैसे ही मैंने आगे की ओर कदम बढाया, मेरे कानो में उसी लड़की की आवाज आयी – हमारे पास तो यहाँ के लोग भी नहीं आते और उस के यहाँ लोग पता पूछते पूछते आ जाते हैं, ऐसा क्या है उसमें ?
 
मुझे लगा, मैं पहला आदमी नहीं हूँ जो गीता जी को ढूढ़ रहा हूँ | मुझ से पहले भी कुछ लोग आ चुके हैं | मैं दरवाजे पर पंहुचा, दरवाजा पहले से खुला हुआ था | मैंने दरवाजे की सांकल खटखटायी | अन्दर से आवाज आयी – अन्दर आ जाइए |
 
मैं धीरे धीरे अन्दर की तरफ गया | केवल एक ही कमरा था, छोटा ही था | डबल बेड के साइज़ से थोडा सा बड़ा | कमरा बड़ा ही साफ़ था और बीचों बीच एक पलंग पडा था | पलंग थोडा पुराने जमाने का था जिसमें चारों कोनो पर चार बड़े बड़े काले रंग के डंडे लगे थे, जिन पर निक्काशी हो रखी थी | एक किनारे में एक दीपक जल रहा था और ऊपर नटराज की एक मूर्ती रखी हुई थी, जिसके पीछे उस से भी बड़ी नटराज की एक पेंटिग बनी हुई थी | इस घर से बाहर मुझे हेय का जैसा भाव आ रहा था, वो पता नहीं क्यों, इस घर में नहीं आ रहा था | अन्दर से आवाज आ रही थी, जो मैं साफ़ साफ़ सुन पा रहा था –
 
जलौघमाग्ना सचराचरा धरा विषाणकोट्या ऽ खिलविश्वमूर्त्तिना ।।
समुद् धृतायेन वराहरूपिणा स मे स्वयंभूर्भगवान् प्रसीदतु ।।
 
थोड़ी देर में कमरे के एक तरफ से पर्दा हटा और उसमें से एक औरत निकली, उम्र करीब ३२-३३ साल के आस पास रही होगी और चेहरा गोरा था | मैंने सभ्य आदमी की तरह हाथ जोड़ कर नमस्कार किया जिसके जवाब में उसने कहा – मुझे लगा आप नहीं आयेंगे | अब आ ही गए हैं तो विराजिये |
 
बैठने के लिए पूरे कमरे में केवल एक पलंग ही था सो मैं उस पर ही बैठ गया पालती मार कर | वो खड़ी ही रही | मुझे पता तो चल ही गया था तो कि यही गीता है |
 
पूछिए, क्या पूछना चाहते हैं ? – ये सवाल सुन कर थोड़ी जान में जान आयी | मैंने भी मौका नहीं गंवाया और पहला सवाल लुढकाया, ये देखने के लिए कि मैं सही जगह आया हूँ या नहीं –
 
बाबा मुझे छोड़ कर अचानक क्यों चले गए ?
 
तुम्हे याद है, पहली बार बाबा क्यों चले गए थे ? क्योंकि तुम्हारा ध्यान बाबा से भंग हुआ था | ऐसे ही दूसरी बार भी तुम्हारा ध्यान भंग हुआ और ऊपर से तुमने अपना कर्तव्य भी नहीं पूरा किया | बाबा को लगा कि तुम अभी उनसे ज्ञान लेने लायक नहीं हो और इसीलिए चले गए ! – उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया |
 
क्या ? मै बाबा से ज्ञान लेने लायक नहीं हूँ ? तो इसलिए पहले अंग्रेज को भेजा, फिर भिखारी को और फिर मेहतर को और अब एक – ये कहते कहते मैं चुप हो गया | मेरे मन में अजीब तरह का गुस्सा सा आया कि क्या मैं इन लोगों से ज्ञान लेने लायक हूँ !
 
वो हँसते हुए बोली – तुम यहाँ आये हो, इसे अपनी किस्मत समझो क्योंकि यहाँ तक भी कोई कोई ही आ पाता है | लोग गिर्राज और किशोर से मिल कर ही भाग जाते हैं | जब उनसे ज्ञान लेते हैं तब ही मेरे पास आ पाते हैं पर तुम सीधे मेरे पास आ गए | तुम ज्ञान प्राप्त करने के लिए नीचे नहीं जा रहे, ऊपर की ओर जा रहे हो |
 
पर मैंने क्या गलत किया था ? लड़ना मरना ब्राहमण का धर्म नहीं होता | ये क्षत्रियोचित कर्म, ब्राहमणों को शोभा नहीं देते | ब्राहमण का कर्तव्य ज्ञानार्जन होता है | महाभारत में जब द्रौपदी युधिष्ठिर से कहती है कि देखिये इस भीम को, ये अकेले सारे कौरवों का नाश कर सकता है, आज तुम्हारे भाई के पास खाने के लिए भोजन तक नहीं है | जो भीम इतना भोजन किया करता था वो आज कंद और मूल खा कर जीवन जी रहा है सिर्फ इसलिए क्योंकि उसका भाई युद्ध नहीं करना चाहता | ये अर्जुन, जिसके गांडीव से निकले तीरों का इस धरा पर कोई भी सामना नहीं कर सकता, वो भी आज अपने हाथ पर हाथ रख कर बैठा है, वो इस प्रकार जीवन जीने योग्य नहीं है | और तो और मैं, तुम्हारी पत्नी, जिसके केश खींच कर सभा में लाया गया, उसका अपमान किया गया फिर भी आपको उन कौरवो पर क्रोध क्यों नहीं आता है | तब युधिष्ठिर ने द्रौपदी को क्षमा का महत्त्व बताया था | वो क्षत्रिय होते हुए, क्षमा कर सकता है और मैं ब्राहमण होते हुए लड़ने मरने जाऊं, ये कैसे संभव है ? इसमें क्या गलत है ?
 
तुम अभी कर्तव्य के बारे में कुछ भी नहीं जानते हो | बातें बड़ी बड़ी कर रहे हो, अपने को बड़ा विद्वान् दिखाने की कोशिश कर रहे हो लेकिन वास्तव में ये सब मूर्खतापूर्ण प्रलाप ही है | जब आदमी अँधेरे से गुजरता है तो सीटी बजाता है, उसके अन्दर भय है बस उसे छिपाने के लिए वो सीटी बजाता है | जैसे दुर्योधन युद्ध शुरू होने से पहले भयातुर हो गया था और आत्मविश्वास प्राप्त करने के लिए द्रोणाचार्य के पास जाता है, उनसे पांडवों के बल को और सेना को द्वेष भावना से द्रोणं से कह कर उनको आवेशित करने की कोशिश करता है ताकि वो कुछ कहें और उसे प्रसन्नता हो किन्तु द्रोणाचार्य चुप ही रहते हैं | फिर भीष्म उसके इस प्रलाप को बचपना समझ कर सिंह की गर्जना जैसा शंखनाद करते हैं जिससे उस भयातुर दुर्योधन को थोडा हर्ष हो |*१ ऐसे ही जो आदमी डरता है या गलत होता है वो इस प्रकार के सही से न जाने हुए शास्त्रों का तर्क देता है | कई बार कुछ लोग शराब पीते हैं और कहते हैं, भैरो बाबा पीते हैं तो हम भी प्रसाद समझ कर पी लेते हैं | अगर उस से पूछा जाए, क्या तुम तांत्रिक क्रिया करते हो ? क्या तुम भैरव जैसे योगी बनने के लिए प्रयत्न करते हो ? तो पता चलेगा वो ऐसा कुछ भी नहीं करता | बस शराब पीने के लिए एक बहाना चाहिए चाहे वो भैरो बाबा का ही क्यों न हो | ऐसे ही तुम कर्म के बारे में कुछ भी नहीं जानते और न ही कर्तव्य के बारे में जानते हो लेकिन बातें ऐसी कर रहे हो जैसे जाने कितने भारी पंडित हो |
 
मैं उसकी शक्ल की ओर देख रहा था | इसका मतलब मेरी बात में कोई तथ्य नहीं है ! मुझ से रहा नहीं गया और मैंने पूछ लिया |
 
तो फिर आप ही बताइये, कर्तव्य क्या होता है ?

 

भगवद गीता – 1|२ – 1|११ (ये सन्दर्भ इसलिए दिए हैं ताकि आप उन श्लोको को उठा कर पढ़ें, पिछले भागों में भी और इस भाग में भी और आगे भी | )
उसने गंभीर मुद्रा में कहना प्रारंभ किया – कर्तव्य का अर्थ होता है, किसी खास स्थिति या परिस्थिति में करने योग्य कर्म । कर्तव्य के लिए अलग से कोई सहिंता नही है और न ही कोई संविधान है कि ये ये चीजें कर्तव्य हैं और ये चीजें कर्तव्य से बाहर हैं और ऐसा हो भी नही सकता क्योंकि कर्तव्य देश, काल और परिस्थिति से बद्ध होता है । कर्तव्य बहुत सोच समझ के किया जाता है, क्योंकि कर्तव्य शास्त्रोक्त होना चाहिए ।
 
जैसे पुत्र और पुत्री के लिए माता और पिता की आज्ञा ही कर्तव्य है। जिसके पिता न हों, उसके लिए बड़ा भाई ही पिता स्वरूप होता है | उसको बड़े भाई की आज्ञा ही पित्राज्ञा समझ कर शिरोधार्य करनी चाहिए | जो अपने बड़े भाई से द्रोह करता है या द्वेष रखता है वो नरकगामी होता है | यदि कोई पर पुरुष या कन्या पुत्र या पुत्री को पसंद भी आये तो पहले माता पिता से आज्ञा ले । ये नही कि स्वयं फैसला ले लें और घर छोड़ कर भाग जाएं, मां बाप को कलपता छोड़ कर। यदि मां बाप राजी नही है तो उनकी चिरौरी करे । मां, बाप और गुरु को सदैव चिरौरी करके प्रसन्न रखने का प्रयास करे। उनको समझाए और उनकी जब आज्ञा मिल जाये तब उसको कर्तव्य समझ कर शिरोधार्य करे जैसे पार्वती ने अपने माता पिता हिमवान और मैना को बहुत समझाया, वो तैयार नही थे पार्वती को वन में जाकर तप करने की आज्ञा देने के लिए किंतु उसने मा बाप की चिरौरी की, उनको समझाया और फिर आज्ञा लेकर वनगमन किया (*१) | पुत्र आजीवन और पुत्री विवाह तक माता पिता के अधीन होते हैं और माता पिता की आज्ञा ही उनके लिए कर्तव्य रूप होती है । पिता के लिए कर्तव्य है कि अपनी पुत्री के साथ कभी अकेले में न रहे और न ही कभी उसके साथ शयन करे |
 
विवाह के बाद पत्नी के लिए पति की आज्ञा ही कर्तव्य है । यदि पति आज्ञा दे और पिता आज्ञा दे तो पति की आज्ञा ही शिरोधार्य करने योग्य है । पति जैसा भी है, जिस भी स्थिति में है, त्यागने योग्य नही होता है जैसे वनगमन के समय में, दुष्कर स्थितियों में भी सीता जी ने, जो राजा जनक की पुत्री थी, जमीन पर सोंना और कंद मूल खाना स्वीकार किया और राम जी को त्याग कर राजा जनक के घर पिता के कहने के बाद भी नही गयी । ऐसे ही द्रौपदी ने जंगल जंगल खाक छानी, एक राजपुत्री होते हुए भी सैरिंध्री (दासी) का कार्य किया और एक दासी जैसे जीवन निर्वाह किया किन्तु युधिष्ठिर को, जिसने जुआ खेल और अपने पूरे परिवार को दांव पर लगाने जैसा धतकर्म किया, उसका त्याग नही किया । यही नही सावित्री ने, राजर्षि अश्वपति की पुत्री होने के बाद भी अपने पति का त्याग नही किया, वो जैसा था उसे वैसा ही स्वीकार किया । ऐसा नही है कि ऐसे कर्तव्य केवल पत्नी के लिए ही विदित हैं ,अपितु पति के लिए भी अपनी पत्नी के लिए कर्तव्य हैं –
 
न भार्या ताड़येत क्वापि मातृवत पालयेत सदा ।
न त्यजेत घोर कष्टेअपि यदि साध्वी पतिव्रता ।।
स्थितेषु स्वीयदारेषु स्त्रीयमन्यां न संस्पृशेत ।
दुष्टेन चेतसा विद्वान अन्यथा नारकी भवेत ।
विरले शयने वासं त्यजेत प्राज्ञह परस्त्रिया ।।
अयुक्तभाषणञचैव स्त्रियां शौर्यम न दर्शयेत ।।
धनेन वाससा प्रेम्णा श्रद्धयामृतभाषणे ।
सततं तोषयेत दारान् नाप्रियं क्वचिदाचरेत ।।
यस्मिन्नरे महेशानि तुष्टाम भार्यां पतिव्रताः ।
सर्वो धर्मह कृतस्तेन भवतीप्रिय एव सः ।। *२
 
इसी प्रकार मनुष्य का अपनी पत्नी के लिए भी कर्तव्य है । पति को अपनी पत्नी को कभी घुड़कना नही चाहिए औऱ मातृवत उसका पालन करना चाहिए । यदि पत्नी साध्वी अथवा पतिव्रताः है तो वह कष्ट मे भी उसका त्याग न करे । जो मनुष्य अपनी स्त्री के अतिरिक्त किसी दूसरी स्त्री का कलुषित मन से चिंतन करता है, वह घोर नरक में जाता है । ज्ञानी मनुष्य को चाहिए कि वह परस्त्री के साथ निर्जन में शयन या वास न करे । स्त्रियों के सम्मुख अनुचित वाक्य न कहे और न ‘ मैने यह किया, मैंने वह किया’ आदि कहके अपने मुख से अपनी बड़ाई ही करे । अपनी स्त्री को धन, वस्त्र, प्रेम, श्रद्धा एवम अमृततुल्य वाक्य द्वारा प्रसन्न रखे और उसे किसी प्रकार क्षुब्ध न करे । हे पार्वती ! जो मनुष्य अपनी पत्नीव्रता स्त्री का प्रेमभाजन बनने मे सफल होता है, उसे समझो कि अपने स्वधर्म के आचरण में सफलता मिल गयी । ऐसा व्यक्ति तुम्हारा प्रिय होता है ।
 
कर्तव्य निर्वहन में शास्त्र सम्मत होना चाहिए और ये तभी हो सकता है जब कोई शास्त्र पढ़े हों और उनका समुचित अध्ययन और चिंतन मनन करे | ऐसे ही गौतम ऋषि के पुत्र थे, वो हर काम बहुत सोच समझ कर करते थे | एक बार गौतम मुनि ने क्रोध के आवेश में उनसे माता का सर काटने के लिए कहा और उनके पुत्र ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की और माता का वध करने अपने घर पहुँच गए किन्तु पूरे रास्ते और घर पहुँचने तक भी वो अपने कर्तव्य का निश्चय नहीं कर पा रहे थे | पिता की आज्ञा मानना ठीक है किन्तु माता का वध कैसे करते क्योंकि शास्त्र कहते हैं –
 
नास्ति मात्रा समं तीर्थ, नास्ति मात्रा समा गतिः ।
नास्ति मात्रा समं श्राणं नास्ति मात्रा समा प्रपा ।।
कुक्षौ संधारणाधात्री, जननाच्जनानी तथा ।
अङ्गानम वर्धनादम्बा वॆर्मत्वेन वीरसूह ।। ३*
 
मेरे इस मानव जन्म में जो यह पञ्चभूतों का समुदाय स्वरुप शरीर प्राप्त हुआ है इसका कारण तो मेरी माता ही हैं । जिसकी माता जीवित हैं, वह सनाथ है । जो मातृहीन है, वह अनाथ है । पुत्र और पौत्र से युक्त मनुष्य यदि सौ वर्ष की आयु के बाद भी अपनी माता के आश्रय में जाता है, तो वह दो वर्ष के बालक की भाँती आचरण करता है । पुत्र समर्थ हो या असमर्थ, दुर्बल हो या पुष्ट – माता उसका विधिवत पालन करती है । “माता के समान कोई तीर्थ नहीं है, माता के समान कोई गति नहीं है, माता के समान कोई रक्षक नहीं है तथा माता के समान कोई प्याऊ नहीं है । माता अपने गर्भ में धारण करने के कारण ‘धात्री’ है, जन्म देने वाली होने से ‘जननी’ है, अंगो की वृद्धि करने के कारण ‘अम्बा’ है, वीर पुत्र का प्रसव करने के कारण ‘वीरप्रसू’ कहलाती है, शिशु की सुश्रुषा करने से वह ‘शक्ति’ कही गयी है तथा सदा सम्मान देने के कारण उसे माता कहते हैं ।” मुनि लोग पिता को देवता के समान समझते हैं परन्तु मनुष्यों और देवताओं का समूह भी माता के समीप नहीं पहुच पता – माता की बराबरी नहीं कर सकता । पतित होने पर गुरुजन भी त्याग देने योग्य माने गए हैं; परन्तु माता किसी भी प्रकार त्याज्य नहीं है । कौशिकी नदी के तट पर स्त्रियों से घिरे हुए राजा बलि की ओर वो देर तक निहारती रही; केवल इसी अपराधवश पिता ने मुझे अपनी माता को मार डालने का आदेश दिया है । चिरकारी होने के कारण वे इन्ही सब बातों पर अधिक समय तक विचार करते रहे, परन्तु उनकी चिंता का अंत नहीं हुआ ।
 
ऐसे ही पिता के बारे में भी उन्होंने विचार किया –
शरीर आदि जो देने योग्य वस्तुयें हैं, उन सबको एक मात्र पिता देते हैं, इसलिए पिता की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना चाहिए । पिता की आज्ञा पालन करने वाले पुत्र के पूर्वकृत पातक भी धुल जाते हैं ।
 
पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः ।
पितरि प्रितिमापन्ने सर्वाः प्रोणन्ति देवताः ।।
 
“पिता स्वर्ग है, पिता धर्म है और पिता ही सर्वश्रेष्ठ तपस्या है । पिता के प्रसन्न होने पर सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं ।”
यदि पिता प्रसन्न हैं तो पुत्र के सब पापों का प्रायश्चित हो जाता है । पुत्र के स्नेह से कष्ट पाते हुए भी पिता उसके प्रति स्नेह नहीं छोड़ते । इस प्रकार पिता के गौरव को भी उन्होंने भली भाँती विचारा | इस प्रकार वो किंकर्तव्यविमूढ़ता को प्राप्त हुए और माता का वध नहीं किया | गौतम ऋषि को अपनी भूल का अहसास हुआ और घर की ओर दोड़े, अपने पुत्र को रोकने के लिए किन्तु जब उन्होंने देखा कि उनका पुत्र अभी भी फरसा एक तरफ रख कर सोच ही रहा है तो उन्होंने उसको बड़ा आशीर्वाद दिया क्योंकि उनके पुत्र ने अपने पिता को नरकगामी होने से बचा लिया और तब से उनके पुत्र का नाम चिरकारी पड़ गया |
 
ऐसा ही सन्दर्भ परशुराम का भी है किन्तु यहाँ भी परशुराम को ज्ञात था कि यदि पिता की चिरौरी की जाय तो स्वर्ग का राज्य भी दुर्लभ नहीं है, वो अपने पिता के तपोबल की शक्ति को जानते थे अतः उन्होंने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और बाद में अपने कर्तव्य को निभाया और माता को पुनर्जीवित करवाया | अतः कर्तव्य बहुत ही विचारणीय विषय है और इसके लिए सभी को शास्त्रों का परिचय होना आवश्यक है जिसके आधार पर आप अपने कर्तव्य और अकर्तव्य जान सकें | पहले आश्रम में ये सब पढाया जाता था किन्तु आज की पढ़ाई ऐसी नहीं होती | अतः मनुष्य को अलग से स्वयम अध्ययन करना चाहिए |
 
ऐसा नहीं है कि केवल चिरकारी ही किंकर्तव्यविमूढ़ हुए थे, महाभारत में युद्ध से पहले अर्जुन भी ऐसे ही किंकर्तव्यविमूढ़ता को प्राप्त हुए थे और अपना धनुष नीचे रख कर बैठ गए थे | ऐसा नहीं था कि अर्जुन कोई मूर्ख था, उसने शास्त्रों और शस्त्रो की शिक्षा दीक्षा गुरु द्रोण से ली थी अतः वह सभी शास्त्रों से भली भाँती परिचित था और शास्त्रों के अनुसार ही उसने अपना धनुष नीचे रख दिया था | अर्जुन फैसला नही ले पाता है कि उसने जो शास्त्र गुरु द्रोण से पढ़े हैं उनके हिसाब से तो बड़ो की हत्या और उसमें भी ब्राह्मण की हत्या तो घोर पाप है । राज्य जैसी अनित्य चीज के लिए वो अपने गुरु का वध कैसे कर सकता है !!! जब बुद्धि शास्त्रो का सहारा ले किन्तु फिर भी सही निर्णय न कर पाए इसे ही किंकर्तव्यविमूढ़ होना कहा गया है। अर्जुन का कोई भी प्रश्न बचकाना नहीं था, बल्कि पूर्णतः शास्त्रोक्त था (*४) और यही भगवान् कृष्ण ने उसका मार्गदर्शन किया और उसको कर्तव्य का बोध कराया | उसको बताया कि कर्तव्य का निर्धारण कैसे करना चाहिए और अंत में अर्जुन का सारा संशय दूर हो गया और अंत में वह स्वयं कहता है कि करिष्ये वचनं तव – अब मैं संशय रहित हूँ और दृण हूँ और आपके वचन के अनुसार ही करूँगा | (*५)
 
ये सब कर्तव्य को समझने के लिए कुछ उदाहरण मात्र हैं किन्तु इनके अलावा भी बहुत प्रकार के कर्तव्य हैं जो स्वयम जानने से पता चलेंगे | लोग रामायण, महाभारत इत्यादि ग्रन्थ पढ़ते हैं लेकिन वो इन्हें कहानी मात्र की भाँती पढ़ते हैं और उनमें से शिक्षा का निचोड़ नहीं निकाल पाते, जीवन में अपनाने की बात तो बहुत दूर की है | जैसा कि मैंने बताया कर्तव्य का कोई संविधान नहीं हो सकता, आपको स्वयम ही शास्त्रों का अध्ययन करके कर्तव्य और अकर्तव्य के बारे में जानना चाहिए | फिर भी ३ कर्तव्य ऐसे हैं, जिनमें शास्त्र विचार की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ये सदैव शास्त्रानुकूल ही है –
 
एक ब्राहमण भी यदि स्त्री रक्षा, गौ रक्षा और कुटुंब की रक्षा के लिए शस्त्र उठा ले और लड़ते लड़ते मारा जाए तो उसकी गति उन परम तपस्विओं के फल से भी कहीं अधिक होती हैं जो हजारों वर्षों से तपस्या कर रहे हैं | (६*)
 
कर्तव्य के बारे में भली भाँती मैंने सुना और कर्तव्य के रहस्य को समझने की कोशिश की पर फिर भी इस से मेरा उस लड़की के लिए लड़कों से लड़ना आवश्यक सिद्ध नहीं होता था इसलिए मैंने दुबारा उस से पूछ लिया –
 
तो इसमें मैंने कौन सा कर्तव्य नहीं किया ? वो लड़की न मेरी स्त्री थी, न मेरे कुटुंब से थी और गौ तो खैर थी ही नहीं | फिर मुझे उसकी उसके लिए क्यों लड़ना मरना चाहिए था ? ये कौन सा कर्तव्य हुआ ?
 
क्रमशः
अभिनन्दन शर्मा
दिल से ….
 
१* – शिव पुराण
२* – महानिर्वाण तंत्र
३* – स्कन्द पुराण
४* – भगवद गीता – १|३२ – 1|४६
५* – भगवद गीता – १८|७३
६* – स्कन्द पुराण – माहेश्वर खंड

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