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Dec 10

अघोरी बाबा की गीता – भाग ४

एक बात बता, मैं इतना समझाता हूँ, उसके बाद भी तेरे प्रश्न ख़त्म नहीं होते ! लाता कहाँ से है इतने सवाल ? – बाबा ने आज डायरेक्टली ही पूछ लिया |

आज बाबा ने वो बात पूछ ली, जिसे मैं बिना पूछे शायद किसी को भी नहीं बताता –

बाबा, मैंने तो अभी तक जो भी थोडा बहुत पढ़ा लिखा है, उस से एक ही बात समझ में आयी है कि हमारे यहाँ शास्त्रों को प्रश्नों की तरह ही लिखने की प्रथा रही है | कृष्ण गीता में; अर्जुन कृष्ण जी से प्रश्न पूछ रहा है और कृष्ण जी उसके प्रश्नों का जवाब दे रहे हैं | ऐसे ही भीष्म गीता में युधिष्ठिर प्रश्न पूछ रहा है और भीष्म उसके प्रश्नों के जवाब दे रहे हैं, नचिकेता यमराज से प्रश्नोत्तर करते हैं | पूरा भागवत पुराण और अन्य भी १७ पुराण प्रश्न उत्तर में ही लिखे गए हैं जिसका एक ही अर्थ है कि हमारा धर्म और शास्त्र प्रश्नों से परे नहीं है | प्रश्नोपनिषद नामक ग्रन्थ बहुप्रसिद्ध है, केवल सनातन धर्म में ही ऐसा सूना गया है कि सही गलत और किसी भी बात का निर्धारण शास्त्रार्थ से ही हुआ करता था |

इन सबका लब्बोलुआब ये है कि यदि कोई धर्म का ठेकेदार ये कहता है कि धर्म प्रश्न करने की चीज नहीं है तो वो सिर्फ आपको मूर्ख बना रहा है और अपना उल्लू सीधा कर रहा है | उसके पास आपके प्रश्न का जवाब नहीं है इसलिए धर्म को आस्था का मुलम्मा चढ़ा रखा है वास्तव में ज्ञान तो बिना प्रश्नों के आ ही नहीं सकता | यहाँ तक कि मेरे हिसाब से ईश्वर भी प्रश्नों से परे नहीं है | प्रश्न पूछने से आप अपने गुरु से ऐसी ऐसी बातें भी पता कर सकते हैं जो वो शायद अपने उपदेश में न कहे, या उसे लगे कि ये तो इसे आता ही होगा | कई बातें, दिमाग से निकल भी जाती हैं किन्तु प्रश्न पूछने से वो बातें भी प्रकाश में आती हैं, जो आम भाषा में छूट जाती हैं | और यदि धर्म या ईश्वर केवल कोरी आस्था का विषय होता तो हमारे सारे पुराण, शास्त्र, गीता प्रश्नों के रूप में न होती और सारे ऋषि मुनि अपना पल्ला यह कह कर झाड लेते कि धर्म और ईश्वर तो आस्था का विषय है किन्तु ऐसा नहीं है, कृष्ण से लेकर सूतजी तक ने, सबने छोटे से छोटे और बड़े से बड़े प्रश्न का जवाब दिया है | किसी की जिज्ञासा की प्यास अपने ज्ञान के अमृत से बुझाना सबसे बड़ा परोपकार है | बस उसी परम्परा को ध्यान में रखते हुए मैं इतने प्रश्न पूछता हूँ |

आज बाबा पहले मुझे देख कर मुस्कुराए, फिर ऊपर आसमान की तरफ देख कर मुस्कुराए और कुछ बडबडाये पर शायद बगल से गुजरते ट्रैफिक की वजह से मैं उसे सुन नहीं पाया | बाबा मुस्कुरा रहे थे तभी मेरी नजर बाबा के पीछे पड़ी, जहाँ पर एक लड़की आगे जा रही थी और हमारी ही साइड में आ रही थी और कुछ ४ लड़के उसका पीछा कर रहे थे | लड़की की भाव भंगिमा से ऐसा लग रहा था कि वो परेशान थी और लडको से कुछ कह भी रही थी रुक रुक कर और लड़के उसका शायद मजाक उड़ा रहे थे या कुछ और कह रहे थे, हंस हंस कर | मुझे समझते देर न लगी कि वो लड़के उस लड़की को छेड़ रहे थे | मैंने उनसे ध्यान हटा कर बाबा पर ध्यान केन्द्रित किया दुबारा | इतने में बाबा ने मेरे से पूछ लिया –

क्या देख रहा है ? क्या है वहां ? – बाबा ने मेरा ध्यान भंग नोटिस कर लिया था |

मैंने बोला – कुछ नहीं बाबा ! कुछ भी तो नहीं !

बताता क्यों नहीं ? – बाबा थोडा डांटते हुए बोले |

कुछ नहीं बाबा – एक लड़की आ रही है और शायद कुछ लड़के उसे परेशान कर रहे हैं |

और तू देख रहा है ? – बाबा ने मुझे अजीब सी नज़रों से देखा |

मैं क्या कर सकता हूँ बाबा, वो ४ लड़के हैं और मैं अकेला और ऊपर से मैं ब्राहमण हूँ, ये सब लड़ना मरना मेरा काम थोड़े ही है | – मैंने अपनी मजबूरी बतायी या कहूं, न उलझने का बहाना मारा |

एकदम से बाबा की आँखें जो दिए की ज्योति की तरह चमक रही थी, उनमें मुझे एक क्षण के लिए अंगारे जलते दिखाई दिए | अचानक बाबा बिजली की फुर्ती से, जो पैर आगे की ओर मुड़ा हुआ था, उस पर जोर लगा कर खड़े हो गए | उन्होंने जोर से अपनी जटाओ को झटका और कूद कर सड़क पर आ गए, वो लड़की और लड़के भी अब तक आगे आ चुके थे | बाबा ने जो लड़का बीच में खडा था, उसके कान के नीचे, एक जोर का रेपटा रख दिया | लड़का एक ही झटके में नीचे जमीन सूंघ रहा था | बाबा बिलकुल रौद्र रूप में दिख रहे थे, उनका ये रूप देख कर, बाकी के तीन लड़के पीछे की ओर भाग गए |

अचानक सड़क पर गुजरती कार के बेक मिरर से सूरज की रौशनी मेरी आँखों पर पड़ी और मेरी आँखें चौंधिया गयी | जब मेरी आँखें खुली तो न तो वहां वो लड़का था, न लड़की थी और न ही बाबा थे | जाने कैसी माया थी ! सब कुछ इतनी जल्दी हो गया कि कुछ भी समझने से पहले ही, सब कुछ गायब हो चूका था | बाबा जा चुके थे | मैंने सड़क पर दायें और बाएं दोनों तरफ देखा लेकिन ट्रैफिक के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा था | मैं समझ चुका था, मेरा बाबा के साथ आज इतना ही समय लिखा था |

मैं मन मसोसता हुआ, अपनी टैक्सी की तरफ वापिस आ गया | मेरे मन में यही चल रहा था कि आज मैंने सोचा था कि बाबा से नजरें नहीं हटाऊंगा, नजरें हटाते ही बाबा गायब हो जाते हैं लेकिन फिर भी मैं कुछ नहीं कर पाया | बाबा चले ही गए | खुद से बाते करते करते मैं टैक्सी तक जा पहुंचा |

ड्राईवर मेरी तरफ कुछ अजीब से देख रहा था, फिर बोला – और सर, हो गयी पूजा ?

मैंने पुछा – कौन सी पूजा ?

अरे, आप बैठे बैठे उधर पूजा कर तो रहे थे, एक घंटे से | कभी पेड़ के आगे हाथ जोड़ रहे थे, कभी हंस रहे थे, कभी कुछ बडबडा रहे थे तो मुझे लगा शायद कोई मन्त्र पढ़ रहे होंगे |

अरे भाई, वो मैं पूजा नहीं कर रहा था, वो तो मैं बाबा से बातें कर रहा था | – मैंने थोडा झुंझलाते हुए बोला |

बाबा, कौन से बाबा ? आप वहां अकेले बैठे थे सर जी | – ड्राईवर हँसते हुए बोला !

मैंने बोला – क्या बकवास कर रहा है, वहां बाबा बैठे थे और मैं उन्ही से बात कर रहा था |

सर जी, मुझे तो आपकी हरकतें अजीब से लग रही थी, मैं तो कितना टाइम लगेगा ये पूछने के लिए बीच बीच में आपको देख कर भी आया था, आप बस पेड़ की तरफ देखे जा रहे थे | – ड्राईवर ने थोडा मुंह बनाते हुए और मजाक उड़ाने के लहजे में बोला |

अरे भाई, वहां बाबा बैठे थे, ऐसा कैसे हो सकता है | मैंने उनके साथ चाय भी पी थी ! – मैंने अपनी बात का प्रमाण देने की कोशिश की ताकि वो कम से कम मुझे सरफिरा तो न समझे |

आपने चाय पी थी, बाबा के साथ ? – उसने प्रश्नवाचक मुद्रा में मुझे घूरा |

मैंने जोर देकर कहा – हाँ |

अच्छा, चाय का कुल्हड़ दिखाना बाबा का ! – उसने मेरा मजाक सा उड़ाते हुए कहा |

मैंने पेड़ की तरफ देखा तो केवल मेरा ही चाय का कुल्हड़ रखा हुआ था | बाबा का कुल्हड़ वहां नहीं था | अब मेरे पास चुप चाप टैक्सी में बैठने के अलावा कोई चारा नहीं था |

तो क्या मैं खुद से बात कर रहा था ? क्या ये कल्पवृक्ष का प्रताप था जो मुझे बाबा दिखाई दे रहे थे और किसी को दिखाई नहीं दिए | अब बाबा कब मिलेंगे ? अब कहाँ ढूढूंगा उनको ? मिलेंगे भी या नहीं ? क्या बाबा, मेरे उन लडको से कुछ न कहने से नाराज तो नहीं हो गए ? पर ऐसा क्यों होगा ? मैंने कोई गलत बात थोड़े ही कही थी ! लड़ना मरना ब्राहमणों का काम नहीं होता, ब्राहमणों का काम ज्ञानार्जन होता है | क्षत्रियोचित कर्म ब्राहमण को शोभा नहीं देता | नहीं, नहीं | इस बात से बाबा नाराज नहीं हो सकते, जो बात सही है, वो सही है | उसके लिए कैसा क्षोभ !

मैं खुद ही सवाल कर रहा था और खुद ही जवाब दे रहा था | शायद खुद को समझाने की कोशिश कर रहा था | इस बार मेरे पास पिछली बार से ज्यादा प्रश्न थे पर इस बार ये संतोष भी था कि बाबा से बड़ी गूढ़ बातें, बड़ी सरल भाषा में सीखने को मिली | अब आगे बाबा, कब और कहाँ मिलेंगे – इसके लिए तो बस समय की प्रतीक्षा ही की जा सकती है | पता नहीं – मिलेंगे भी या नहीं ?

प्रश्नों के भंवर में डूबता उतरता मैं वापिस दिल्ली अपने घर आ गया । शनिवार का दिन था, छुट्टी का । सो मैने सबसे पहला काम किया कि बाबा ने जो भी बताया था उनके पहले दिन से लेकर कल तक को 7 पार्ट में बांट कर नोट्स बनाये क्योंकि मेरी नजर में ऐसा दुर्लभ ज्ञान इतने आसान शब्दो में बार बार नही मिलता । अगर नोट्स नही बनाऊंगा तो भूल जाऊंगा और अगर भूल ही गया तो इस जिंदगी मे बाबा से हुए ऐसे संत्संग का क्या लाभ ? सो मैने नोट्स बनाये और सभी पार्ट्स के प्रिंट आउट ले लिए ।

पार्ट 6 मुझे सबसे ज्यादा इम्पोर्टेन्ट लगा और मैंन decide किया कि इसको जीवन में उतारना है तभी गीता का असली लाभ मिलेगा अन्यथा बड़ी बड़ी बातो को कहानी की तरह पढ़ के भूल जाने वाले जाने कितने लोग दुनिया में भरे पड़ें हैं । बहुत लोगो को गीता का एक एक श्लोक याद है, कौन से पेज पर क्या लिखा है ये भी याद है लेकिंन अगर उसे जीवन में कभी उतारा ही नही तो क्या लाभ । पुस्तक में रखा ज्ञान कभी काम नही आता । इसलिए पार्ट ६ को २-३ बार पढ़ा |

ऐसा निश्चय कर मैंने रोजमर्रा के कामो में प्रणवाक्षर का ध्यान करना शुरू किया और शुरुआत हुई ब्रश करने से । मुझे कतई कोई परेशानी नही हुई । हाथ अपना काम कर रहे थे रोज का और मन में जैसे माला चल रही थी । फिर शेव करते में भी ऐसा ही किया। ये तो बहुत आसान है बे ! अब तो रोज खाना खाते में, ट्रेडमिल पर दौड़ते में, हर वक्त बस एक ही काम हो रहा था ।

इस सब की प्रैक्टिस में मैं इतना रम गया कि कब एक महीना निकल गया पता ही न चला । करीब एक महीने बाद, मुझे बाबा की फिर से याद आयी । सोच रहा था ,बड़े दिन हो गए, बाबा मिल ही नही रहे फिर से । पर बड़ा सवाल ये था कि उनको ढूढने कहां जाऊँ ? कहाँ मिलेंगे ? कुछ समझ में नही आ रहा था और दिन गुजरते जा रहे थे और बाबा से मिलने की बैचेनी बढ़ती ही जा रही थी ।

क्रमशः
अभिनन्दन शर्मा
दिल से….

 

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