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Dec 10

अघोरी बाबा की गीता – ३

मेरा गुरु के बारे में टॉपिक चेंज करने का आईडिया सही बैठ गया और बाबा, अब थोड़ा गंभीर हो गए ।

क्या तुम्हें पता है, शंकराचार्य को उसके गुरु कैसे मिले ? तानसेन को उसके गुरु कैसे मिले ? सूरदास को उसके गुरु कैसे मिले ? – सवालों की झड़ी लगा दी बाबा ने, मुझ मूर्ख के सामने जो अभी तक उनसे सवाल पूछ रहा था, वो अब उसी से सवाल कर रहे थे !

अच्छा हुआ, बाबा ने खुद ही जवाब दिया और मेरे जवाब का इंतजार नही किया, नही तो और पोल पट्टी खुल जाती कि मैं किस स्तर का मूर्ख हूँ –

7 वर्ष की उम्र में शंकराचार्य, गुरु की तलाश में दो हजार किलोमीटर पैदल चलकर अपने जन्म स्थान केरल के कलाड़ी से नर्मदा किनारे ओंकारेश्वर आए थे। ओंकारेश्वर में श्री गोविन्द भगवत्पादाचार्य ने उन्हें गुरुदीक्षा दी।
सूरदास जन्मांध थे और वो जब गऊघाट पहुचे तो वहां उनकी भेंट उनके गुरु बल्लभाचार्य से हुई और उन्होंने उनसे दीक्षा ली । तानसेन गुरु की खोज में ग्वालियर से मथुरा पहुचे और वहां स्वामी हरिदास से संगीत शिक्षा ली ।

अब बताओ, तुमने गुरु को ढूंढने के लिए क्या किया ? या जिन्हें तुम साधारण जन कह रहे हो, उन्होंने गुरु ढूढने के लिए क्या कभी कोई प्रयास किये ? एक बच्चे को भी बिना गुरु के इतनी बैचेनी होती है कि 7 साल की उम्र में हजारों किलोमीटर चल जाता है और दूसरी तरफ कुछ लोगो को बुढापा आ जाता है, वो बस गुरु कैसे ढूंढें, कोई मिलता ही नहीं का झंडा उठा कर घुमते रहते हैं और यही रटते रह जाते है कि हमें गुरु नही मिला, वास्तव में उन्होंने गुरु पाने के लिए एक कदम भी नही बढ़ाया होता ।

ये तो बाबा ने मेरे ऊपर अटैक सा कर दिया । मुझे ऐसा लगा बाबा डायरेक्ट बता रहे हैं कि तुम एक नम्बर के कामचोर, आलसी टाइप प्राणी हो । मुझे थोड़ा बुरा लगा | मेरी चाय ख़त्म हो चुकी थी और कुल्हड़ एक ओर रखते हुए मैंने बाबा को बोला

पर बाबा, अब पहले जैसा जमाना थोड़े ही है, अब तो बहुत माध्यम हैं जिनसे गुरु लोगो का पता चल जाता है । –

यही तो, अब पहले जैसा जमाना नहीं है | सोचो, उस ७ साल के बच्चे ने कितने लोगो से रास्ता पुछा होगा !! सोचो, वो ७ साल के बच्चे ने कितनी बार ऐसा सोचा होगा, कि यार अब चला नहीं जा रहा, छोड़ो, घर वापिस चलते हैं ! कितने दुर्गम वनों, रास्तों, सड़कों से वो पैदल ही गुजरा होगा ! और अब तो तुम लोग हवाई जहाज से आते जाते हो ! किसी आदमी से कुछ पूछना भी नहीं पड़ता, सब कुछ गूगल से मिल जाता है पर सच तो ये है कि जितनी सुविधा मिल रही है, मनुष्य उतना ही निकम्मा और आलसी हुआ जा रहा है !

और तुम्हें क्या लगता है कि जो लोग टीवी पर आ रहे हैं, आश्रम चला रहे हैं, करोड़ो रूपये का कारोबार कर रहे हैं, क्या वो गुरु हो सकते हैं ? जो स्वयं माया से मुक्त नही हैं, जो स्वयं योगी नही है, वो क्या योग सीखा सकते हैं !

जाका गुरु है आंधरा, चेला निरा निरंध |
अंधे अंधा ठेलिया, दोनों कूप पडंत ।।- 1*

अगर गुरु अज्ञानी है तो शिष्य ज्ञानी कैसे हो सकता हैं। अन्धे को मार्ग दिखाने वाला अगर अंधा मिल जाए तो सही मार्ग कैसे दिखाएगा ? दोनों ही नरक के कुएं में गिरते हैं ।

गुरु का तो काम है कुम्हार की तरह से तुम्हारे अंदर से बुराइयों को निकाले । जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी के बर्तन से डेले, कंकर निकालता है वैसे ही गुरु भी तुम्हारे अंदर से माया, मोह को चुन चुन कर निकालता है । जब घड़ा कच्चा होता है तो कंकड़, निकल जाते हैं किंतु यदि वह पक जाए तो वो बड़ा ही खराब बर्तन बनेगा ऐसे ही जो लोग बिना गुरु के बड़े होते हैं, उनके चरित्र में अनेक दोष होते हैं, जो उन लोगो को स्वयम नही पता होते । कोई घमंडी होगा, कोई द्वेष करने वाला होगा, कोई वाचाल होगा, कोई भोगी होगा और कोई कुछ और ।

जो सच्चा गुरु होगा, वो तुमसे कुछ भी अपेक्षा नही रखेगा और कम से कम धन की तो कदापि नही रखेगा । जो बाबा, तुमसे धन की आशा रखता है, यकीन मानो उसका उद्देश्य तुम्हें कुछ देना नही अपितु तुमसे धन निकालना ही है । वो तो ज्ञान को बेचने का दोषी है | गुरु टीवी पर ढूढ़ने से नही मिलेगा, उसके लिए स्वयम प्रयास करना पड़ता है, जैसे बाकी सब लोगो ने किया। जो ढूढ़ेगा, उसे मिलेगा अवश्य । “जिन खोजा तिन पाइयां..गहरे पानी पैठि..मै बपुरा बुडन डरा..रहा किनारे बैठि..!” खाली गुरु गुरु करने से और दुनिया को दिखाने से कि मुझे तो गुरु मिल ही नही रहा, आपको गुरु की प्राप्ति नही हो सकती। उसके लिए आपको हाथ पैर मारने पड़ेंगे, प्रयास करने पड़ेंगे। तब ही गुरु की प्राप्ति संभव है ।

बाबा, बड़ी तेजी से हर समस्या को सुलझा रहे थे पर मैं क्या करूँ, जैसे ही वो एक बात सुलझाते, मुझे उसी बात में एक नयी उलझन दिख जाती है | मैंने फिर से एक बाउंसर डालने का प्रयास किया –

पर बाबा ये कैसे पता चला चलेगा कि कौन सच्चा गुरु है !, किसको ढूंढा जाए ? क्या गुरु का भी टेस्ट लिया जाए !

जिस तेजी से सवाल हो रहे थे, उसी तेजी से जवाब भी आ रहे थे –

गुरु का अर्थ क्या है ? गुरु का अर्थ संस्कृत में होता है – बड़ा । किस चीज में बड़ा ? जो आपसे किसी भी बात में बड़ा हो, वो गुरु हो सकता है ! जो आपसे धन में बड़ा है और आपको धन प्राप्त करना है तो वो भी गुरु है । कुछ लोगो के लिए अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान आदर्श है, यदि आप एक्टिंग सीखना चाहते हैं तो आपके लिए वो भी गुरु हो सकता है ! आप क्या चाहते हैं, आपको उसके लिए स्वयं से बड़ा ढूढना पड़ेगा ! याद रखना ढूढना पड़ेगा, घर से आफिस और आफिस से घर की दिनचर्या करते करते रोने से कि हमें तो गुरु मिला ही नही, इस प्रपंच से गुरु नही मिलेगा । जो आपको लगता है कि आध्यत्म में, वैराग्य में, ज्ञान में आपसे बड़ा है, वो भी गुरु है । ध्यान रखना, गुरु उसको मिलेगा जो स्वयम को छोटा मानेगा । जो स्वयम को ही दुनिया का सबसे अक्लमंद आदमी मानेगा, उसे गुरु नही मिल सकता । जब खुद को छोटा मानोगे तब ही बड़ा ढूंढ पाओगे । समस्या ये है कि लोग खुद को ही विद्वान मान लेते है और गुरु न मिलने की ये एक बड़ी वजह है ।

शंकराचार्य ने 7 वर्ष की आयु तक अनेकों उपनिषद, पुराण, वेद सब पढ़ लिए थे फिर भी स्वयम को छोटा मानते हुए गुरु की खोज में निकल पड़े और आज का आदमी, जिसने कुछ नही पढ़ा है, जो खुद आध्यात्म में कुछ नही जानता है, वो भी स्वयम को ब्रह्म समझने लगता है । आप खुद को छोटा सिर्फ तब ही मानेंगे, जब आप सबसे पहले अपने घमंड और अभिमान का त्याग करेंगे ! आप दूसरे को गुरु तब ही मान पाएंगे जब खुद को अभिमान और घमंड त्याग कर छोटा मानना शुरू कर देंगे और ये बड़ा कष्टकर है । ये आसान नही है । लोग अपना घमंड, अपना अभिमान नही त्याग सकते हैं । वो क्षणभर को भी ये मानने को तैयार नही होते कि दूसरा उनसे ज्यादा जानता है, जब आपमें ज्ञान की प्यास है ही नही तो ब्रह्मा भी आ जाये तो आपको ज्ञान नही दे सकते क्योंकि आपको तो प्यास है ही नही, जब प्यास ही नही तो कोई क्या प्यास बुझायेगा ?

मूरख हृदय न चेत ,यदयपि गुरु विरंची सम,
फूलैं फलें न बैंत ,यद्यपि सुधा बरसहिं जलधि। – २*

इसलिए पहले ज्ञान की प्यास बढ़ानी पड़ेगी, ज्ञान की भूख तब लगेगी, प्यास तब लगेगी, जब स्वयम आप ये मानोगे कि जो भी तुम जानते हो, वो अपूर्ण है, हो सकता है दोषयुक्त भी हो । जब ये मानोगे तब ही गुरु को गुरु पहचान पाओगे । वरना गुरु सामने खड़ा होगा और आपका घमंड उसे गुरु मानने को तैयार ही नही होगा और गुरु आपके सामने से मुस्कुराते हुए निकल जायेगा पर आप उसे पहचान ही नही पाओगे । जहां सबने गंदे कपड़े पहन रखे हों, उस शहर में कोई साफ कपड़ो के बारे में कैसे जानेगा ! वो तो गंदे कपड़ो को ही साफ समझ रहे है और यदि कोई साफ कपड़े वाला आ भी जाएगा तो उसे ही कहेंगे देखो तो कैसा विचित्र आदमी है, कैसे कपड़े पहन रखें हैं ! ऐसे भी कपड़े कोई पहनता है क्या भला और उसी की हँसी उड़ाएंगे और वो आदमी वहां पर उन लोगो की मूर्खता पर हंसता हुआ वहां से आगे बढ़ जाएगा ! ऐसे ही इस संसार में, लोग अपना अपना घमंड उठाये घूमते हैं । वो गुरु को पहचान ही नही पाते क्योंकी वो खुद को छोटा महसूस नही कर पाते । जब स्वयम में लघुता आएगी, गुरु आपको मिल जाएगा ।

करंट हमेशा ज्यादा से कम की ओर बहता है, जल हमेशा ऊपर से नीचे की ओर बहता है ऐसे ही ज्ञान भी ज्यादा से कम की ओर बहता है | नार्थ पोल हमेशा साउथ पोल को ही खींचेगा | लेकिन ये घमंड आपके चारों ओर ऐसी दीवार बना देता है कि आप स्वयम में खोखले होते हुए भी, ऐसा मानने लगते हो जैसे आप आप पूर्ण हो, पूरा भरे हुए हो ! लेकिन वास्तव में सत्य ये होता है कि आप खोखले होते हुए भी इसी भ्रम में जीते रहते हुए पूरा जीवन काट देते हैं | ये घमंड का ही प्रताप है |

बाबा ने पूर्ण रूप से गुरु की महत्ता और गुरु को ढूढने का तरीका बता दिया था और मुझे सही में लगा कि मैंने प्रयास तो आज तक चवन्नी का भी नहीं किया है फिर इस बात के कोई मायने नहीं है कि किसी को गुरु मिला या नहीं | नहीं तो जहाँ चाह, वहां राह तो बचपन से सुनता तो मैं भी आ रहा था | बाबा की बातें मेरी एक एक गुत्थी सुलझा रही थी | जिन सवालों को मैं अनसुलझा ही मानता था – वो गांठे एक एक कर खुलती जा रही थी | मैंने बाबा की तरफ एक प्रश्न ओर धीरे से लुढकाया –

बाबा, आपने अभिमान का भी प्रयोग किया, घमंड का भी प्रयोग किया लेकिन अहंकार का प्रयोग नहीं किया ? ऐसा क्यों ? अहंकार, अभिमान और घमंड में क्या फर्क होता है बाबा ? मैं आपकी बातों से मोहित हुआ जा रहा हूँ, कृपयाकर मेरा भ्रम दूर करें ! – सवाल पूछते पूछते, अचानक मेरे हाथ बाबा की तरफ जुड़ गए !

1* – कबीर के दोहे
२* – राम चरित मानस

बाबा अपने ज्ञान का पानी मेरे ऊपर डाले जा रहे थे लेकिंन मुझे वो जिज्ञासा के हवन कुंड में डाली हुई आहुतियां लग रही थी । जैसे जैसे वो मेरे प्रश्नों का शमन कर रहे थे वैसे वैसे मेरी जिज्ञासा की अग्नि भड़क रही थी ।

बाबा ने अहंकार अभिमान और घमंड को समझाते हुए कहा – त्रिगुणात्मकः प्रिकृति – प्रकृति तीन गुणों वाली है | इसको सांख्य सूत्र में जो पहला श्लोक है – सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः (1*) अर्थात सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है और इसी को गीता में कहा गया है सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः (२ *) , प्रकृति से ये सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण उत्पन्न होते हैं | क्योंकि ये संसार प्रकृति से ही उत्पन्न है अतः इस संसार में जो कुछ भी होगा वो तीन प्रकार का होगा – सतोगुणी, रजोगुणी और तीसरा तमोगुणी |

इसीलिए अहंकार भी तीन प्रकार का होता है | अहंकार यानि अहम् का आकार | मेरे चित्त और आत्मा का एक आकार है, वो ही अहंकार है | अहंकार सभी में होता है और ये सात्विक होता है | जब आप ये समझते हैं कि जैसे सब हैं, वैसा ही मैं भी हूँ | एक entity हूँ | मैं हूँ, मेरा एक रूप है, रंग है, प्रकृति है अतः इस संसार में जैसे सब हैं, वैसे ही मैं भी हूँ | ये अहंकार है | किसी भी साधारण जन में, जो जन्म लेगा, उसमें अहंकार होगा ही |

मैं हूँ तो सही, किन्तु दुसरे से श्रेष्ठ हूँ, ये अभिमान है | अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ समझना | पंडित जन और ज्ञानी लोग अक्सर इसी में रहते हैं | मैं हूँ, किन्तु दूसरों से श्रेष्ठ हूँ | आदि शंकराचार्य का रास्ता एक चंडाल ने रोक लिया था, सभी लोगों ने उस से रास्ते से हट जाने के लिए आग्रह किया क्योंकि उनको अभिमान था कि वो श्रेष्ठ हैं किन्तु जब उस चंडाल ने प्रश्न किया कि ‘शंकर किससे मार्ग छोड़ने को कह रहे हो ? शरीर से या आत्मा से ? यदि मैं आत्मा हूँ तो अपवित्र होने का प्रश्न ही नहीं और यदि मुझे शरीर मानकर चला जा रहा है, तो ये तो नश्वर शरीर है, क्या पवित्र और क्या अपवित्र ?’ शंकराचार्य ने उस चंडाल को विस्मयपूर्वक देखा, प्रणाम किया और मार्ग बदल कर चले गए | सो अभिमान में श्रेष्ठता का भाव होता है और ये राजसिक होता है |

जब आप ये सोचते हैं कि मैं ही हूँ और बाकी सब तो मूर्ख हैं यानि दूसरों को हीन या तुच्छ समझना – ये घमंड है | जब तक मैं हूँ, ठीक है, ये मेरा अहंकार है कि मैं हूँ, लेकिन मैं ही मैं हूँ, बाकी कोई तो है ही नहीं, ये घमंड है | रावण को घमंड था, ये वनवासी ! ये बंदरों की सेना लेकर घूमने वाला ! ये मुझे हराएगा ? मैं त्रिलोकी का स्वामी हूँ और ये मुझे हराएगा ! ये घमंड था | यही रावण सहस्त्रबाहु की कांख में कितने सालों तक दबा रहा और और अपने पिता के अनुरोध पर छूटा, लेकिन रावण वो सब भूल गया | ये जो घमंड है, ये विनाशकारी होता है | ये किसी का भी अंत कर देता है और ये तामसिक होता है |

जिसमें न अहंकार है, न अभिमान है और न ही घमंड है, वह योगी है | वह ईश्वरतुल्य है | वह ब्रहमानंद में डूबा हुआ है | – ३*

बाबा ने जो बताया, वो समझ में तो आया लेकिन जो आखिरी लाइन बोली, वो मेरे पल्ले नहीं पड़ी | व्यक्ति या तो तमोगुणी होगा, या रजोगुणी होगा या सतोगुणी होगा | कोई गुण ही न हो उसमें, ऐसा कैसे हो सकता है ? इधर दिमाग में सवाल आया, उधर जिह्वा से निकला –

ऐसा कैसा हो सकता है बाबा कि किसी में अहंकार ही न हो ? ये तो लगता है असंभव सी बात है ! कोई न कोई गुण तो होगा ही न बाबा अगर मनुष्य है तो |

हमें बहुत सी बातें असंभव लगती हैं, हमें लगता है कि ये तो हो ही नहीं सकता किन्तु सब होता है | हमारी मान्यताएं बहुधा गलत होती हैं क्योंकि वो संसार के नियमो में बंधी होती हैं | हम उनसे ऊपर नहीं सोच पाते किन्तु जब आप किसी विषय में डूबेंगे तो आपको लगेगा, अरे ये तो हो सकता है बस हमने इस पर ध्यान नहीं दिया पहले |

ऐसे ही पहले ये समझो कि मैं कौन हूँ ? मैं हूँ, ये अहंकार ! मेरा जो स्वरूप है, यही अहंकार है ! मेरा आकार ही मेरा अहंकार है – अहम् + आकार | लेकिन जब तक “मैं हूँ” रहेगा, ये अहंकार रहेगा, आप योग नहीं कर सकते, आप ईश्वर प्रणिधान नहीं कर सकते | होगा ही नहीं ! जब तक उस परमात्मा और इस आत्मा के बीच में कोई भी आएगा (अहंकार) योग कैसे होगा ? ध्यान के वक्त भी आपको खुद को भुलाना पड़ता है | इसे ठीक वैसे समझो – जैसे जब तुम अपनी कार या बाइक ड्राइव कर रहे होते हो और मन में ऑफिस की मीटिंग, घर कि समस्याएँ, मोबाइल में चेट या कोई विचार चल रहा होता है | आप ड्राइव करते करते काफी आगे आ जाते हैं और एकदम से आपका ध्यान टूटता है, अरे यहाँ तक आ गए ! आपको नहीं ध्यान रहता आपने कार या बाइक कैसे चलाई, कब कब मोड़ी, कब कब ओवरटेक किया |

आप उस वक्त ध्यान में ही होते हैं किन्तु ईश्वर के नहीं अपितु सांसारिक चक्करों में ! यही ध्यान आपको जमाना है ईश्वर में | आप कुछ भी कीजिये, कोई भी क्रिया कीजिये किन्तु मन में प्रणव का, उस ॐ का, उस अक्षरब्रहम का जप चलता रहे | अहंकार को भूल जाइए, भूल जाइए कि इस वक्त आपका शरीर क्या क्रिया कर रहां हैं या किस क्रिया में सलग्न हैं, जैसे आप ऑफिस की मीटिंग की चिंता में या घर की चिंता में थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि आप इस समय ड्राइव कर रहे हैं, ऐसे ही ईश्वर के ध्यान में, प्रणव का जप करते करते भी भूल जाइए कि आपका शरीर इस समय किस क्रिया में है | यकीन मानिए, क्रिया अपने आप होती जायेगी, कार अपने आप चलती जायेगी और आपका एक्सीडेंट नहीं होगा | आप मोबाइल में लगे रहेंगे तो हो सकता है, एक बार को एक्सीडेंट हो जाए, किसी और विचार में रहेंगे तो हो सकता है एक्सीडेंट हो जाए किन्तु आप यदि ईश्वर ध्यान में रहेंगे, एक्सीडेंट नहीं होगा | आप जो भी क्रिया कर रहे होंगे वो स्वतः सिद्ध होगी |

किसी भी ऐसी प्रक्रिया में रोबोटिक है, आप रोज करते हैं, जिसमें दिमाग लगाने कि जरूरत नहीं है, उसमें आप ये कर सकते हैं, औरतें रोटी बनाते समय, आदमी नहाने के बाद शरीर पोंछते में, पार्किंग तक पैदल जाने में, रिक्शे में जाते में, ऑटो में जाते में, ट्रेड मिल करते समय तुम, शेव करते समय, ब्रश करते समय और भी बहुत सी जगह |

जैसे सर पर मटके के ऊपर मटकी रखे चलती हुई एक गाँव की औरत का ध्यान सड़क पर नहीं होता, आँखें अपने आप ही सड़क को देख रही हैं, वो अपना काम कर रही हैं किन्तु उस औरत का ध्यान अपने सर पर रखी मटकी पर होता है, उसके बैलेंस पर होता है ऐसे ही तुम्हारी इन्द्रिया बिना ध्यान दिए भी रोजमर्रा के काम कर सकती हैं और तुम अपना ध्यान ईश्वर पर केन्द्रित कर सकते हो | ये बस थोड़े से अभ्यास की बात है |

आप जब इस शरीर को भुला देंगे, अपने शरीर की क्रियाओं से स्वयं को अलग कर लेंगे तब आप योग करेंगे | आप भुला तब ही पायेंगे, जब आपका अहंकार नष्ट हो जाएगा | जब आप सुबह सुबह ध्यान करने बैठते हैं तो क्या करते हैं ? हाथ जोड़ कर, आँखें बंद कर के, क्या करते हैं ? क्या उस समय आपको ये याद रहता है कि आप पूजा में है, हाथ जोड़ कर बैठे हुए हैं ? आपको अपने शरीर का कोई ध्यान नहीं रहता, आप अहंकार से मुक्त हो जाते हैं और फिर योग होता है | आप अपनी आत्मा और परमात्मा को मिलाने का प्रयास करते हैं | ये सिर्फ तभी हो सकता है जब आप अहंकार को त्याग देंगे | कबीर ने इसी अहंकार को “मैं” कहा है, अब फिर से सुनो, उसने क्या कहा है –

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाही |
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ||

जब तक अहंकार रहेगा, हरि नहीं दिखेगा और जब अहंकार समाप्त हो जायेगा तब उस हरि का दर्शन स्वतः ही हो जायेगा | अंततः तात्पर्य यही है कि गीता में योग है और योग करने के लिए अहंकार को भी त्यागना होगा | अहंकार सात्विक है, फिर भी छोड़ने की चीज ही है और इसे छोड़ा जा सकता है | – ४*

साधारण मनुष्य के लिए, ये एक ऐसी चीज है, जो होगी ही होगी | इसी अहंकार (अहम् के आकार) के लिए वो सब चीजें इकठ्ठा करता है, बढ़िया घर, बढ़िया गद्दे, बढ़िया भोजन – ये सब किसके लिए ? इस अहम् के आकार अर्थात शरीर के लिए | जब आप अहंकार से मुक्त हो जायेंगे तो आप महल में भी वैसे ही रहेंगे जैसे जंगल में रह रहे हैं और जंगल में भी वैसे ही रहेंगे जैसे महल में रह रहे हों | राजा जनक और राजा राम की ही भांति आपको भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि इस शरीर कि स्थिति क्या है, क्योंकि आप उस अहंकार से मुक्त हैं | याद रखिये ये सारा संसार शरीर के लिए ही व्याप्त है, आत्मा के लिए नहीं | सारे रिश्ते, नाते इस शरीर के ही हैं, इस अहंकार के ही हैं | आत्मा का किसी से कोई रिश्ता नहीं है | जब आप इस अहंकार को त्याग देंगे, तब आप विशुद्ध आत्मा हो जायेंगे | आप आत्माराम हो जायेंगे और अपनी आत्मा में ही रमने लग जायेंगे |

बाबा के सानिध्य में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे स्वयं भगवान् ही मुझे आसान से आसान तरीके से समझा रहे हैं क्योंकि मुझ मूढ़ की समझ में शास्त्रों की क्लिष्ट बातें नहीं आती हैं | मुझे हमेशा यही लगता था कि शास्त्रों की बातें पुराने समय में ही संभव थी, आजकल इन बातों के कोई मायने ही नहीं है क्योंकि मेरे हिसाब से ये सब बातें अब संभव ही नहीं हैं, एक तरीके से असंभव ही समझता था मैं अब तक | लेकिन बाबा तो हर बात, आज के सापेक्ष्य ही बता रहे हैं | इन चीजों को आजतक किसी ने इतनी आसान भाषा में मुझे नहीं समझाया था | बस अब एक ही डर सता रहा था कि ऐसा सत्संग, ऐसा सानिध्य जीवन में पहली बार मिला है, कहीं बाबा फिर तो गायब तो नहीं हो जायेंगे !

क्रमशः
अभिनन्दन शर्मा
दिल से….

1 – साङ्ख्य० १।२६

२ – गीता १४|५

३ – गीता १४/१९ (नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥)
भावार्थ : जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है |

४ – गीता १४|२६ (मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥)
भावार्थ : और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को ‘अव्यभिचारी भक्तियोग’ कहते हैं) द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है॥26॥

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