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Dec 06

अघोरी बाबा की गीता – भाग 1

रोजाना की तरह मैं अपने आफिस से घर जा रहा था । एक हाथ में स्टीयरिंग, एक हाथ मे मोबाइल और कार में भजन, जैसा रोज होता है । अचानक मेरे अवचेतन मस्तिष्क ने कार में जोरदार ब्रेक लगाये । सामने देखा तो एक बाबा, लंबी जटाओं वाले, भगवा कपड़े पहने, कार के सामने खड़े थे । उन्होंने जोर से कार पर हाथ मारा और बोले – मूर्ख, ध्यान कहाँ हैं तेरा ? और यह कहकर आगे बढ़ गए । मैने बोनट को देखा तो उस ओर एक बड़ा हाथ के पंजे का निशान बना हुआ था ,शायद धूल के हटने से उनके पंजे का निशान छप गया था ।

घर आया, बेटी ने पानी दिया और फिर थोड़ी देर बाद श्रीमती जी ने खाना परोस दिया, पर मेरे दिमाग मे उस अघोरीनुमा साधु का चेहरा और उसका वाक्य, ध्यान किधर है तेरा, ही घूम रहा था । रोजाना की दिनचर्या के बाद मैं थक कर सोने चला गया।

रात करीब 2 बजे के आसपास बेल बजी । जैसा कि हमेशा होता है, आवाज आने पर मेरी ही नींद पहले खुलती है, तब भी मेरी नींद ही खुली । इतनी रात को कौन आया होगा, हाल की लाइट जला कर, सोचते सोचते दरवाजे पर पहुंचा | झाँक कर देखा, कुछ दिख नहीं रहा था | मैंने थोडा जोर से पूछा – कौन ? दूसरी तरफ से आवाज आयी – तेरा ध्यान किधर है, दरवाजा क्यों नहीं खोलता ! आवाज कान में क्या पड़ी, जैसे किसी ने गर्म तेल डाल दिया हो ! पूरे शरीर में पीठ के पीछे से एक सिहरन गर्दन तक दौड़ गयी | ये तो उसी बाबा की आवाज है ! मेरे हाथो ने अपने आप दरवाज खोल दिया | दरवाजे पर वही अघोरीनुमा बाबा खड़े थे | लम्बी लम्बी जटाएं, भगवा कपडे, गले में मोटे रुद्राक्ष की माला, आँखों में तेज और चेहरे पर अजीब सी मुस्कान | बिना कोई बात कहे, वो अन्दर घुस के आकर सामने सोफे पर पालती मार कर बैठ गए | मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था, इतनी रात को ये कैसे ऊपर आ गए ? बाहर चौकीदार ने इनको रोका नहीं ? इस समय तो गेट भी अन्दर से बंद होता है, ये ऊपर कैसे आ गए ? अचानक उनकी फिर से कडक आवाज ने मेरा ध्यान तोडा – क्या हुआ, क्या सोच रहा है ? मेरे मुंह से कुछ निकल नहीं रहा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था, धीरे से मुंह से बस इतना निकला – आप ! इस से आगे में वाक्य में कुछ और जोड़ पाता, उन्होंने पुछा – क्यों, दूसरी गीता नहीं चाहिए ? मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है, मेरे मुंह से धीरे से बस इतना ही निकला – दूसरी गीता !!!

तूने दूसरी गीता नहीं मांगी थी, दो दिन पहले ? अचानक मेरे दिमाग में आया कि मैंने दो दिन पहले फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें मैंने लिखा था – “कर्म कर फल की चिंता मत करो – इति गीता ज्ञानम, पर बिना लक्ष्य संधान के बाण नही छोड़ा जाता प्रभु, कर्म करने के लिए हेतु तो चाहिए ही चाहिए । बिना हेतु कोई कर्म नही हो सकता, ये अकाट्य सत्य है । तब हेतु हो,लक्ष्य हो पर फल की चिंता न हो ,साला इसको साधने के लिए एक गीता और चाहिए, महाराज । कब दे रियो हो, दूसरी गीता ? “ तो क्या ये, गीता ही समझाने आये हैं ! अचानक मेरे दिमाग में कौंधा, कहीं ऐसा तो नहीं, ईश्वर ने इन बाबा को ही भेज दिया हो, मेरे गीता के संशय को दूर करने के लिए ! अन्दर से एकदम से बड़ी ख़ुशी सी हुई | इस समय बाबा को लेकर कोई सवाल दिमाग में नहीं आ रहा था | अचानक बेडरूम का दरवाजा खुला और श्रीमती जी प्रकट हुई और बोली – क्या हो रहा है, यहाँ क्यों बैठे हो ? मैंने उसको हाथ के इशारे से जैसे ही बताया कि देखो बाबा और गर्दन घुमाई तो वहां कोई भी नहीं था | सारी ख़ुशी एकदम से काफूर हो गयी | एकदम से ऐसा लगा, जैसे मैंने कोई सपना देखा हो | श्रीमती जी मेरी तरफ ऐसे घूर रही थी, जैसे वो मेरी बेटी को घूरती है, जब वो स्कूल न जाने का कोई बहाना बनाती है | मेरे मुंह से यही निकला – कुछ नहीं, बस नींद नहीं आ रही थी, तो थोड़ी देर के लिए बाहर आकर बैठ गया था | श्रीमती जी ने लाइट बंद कर दी, जिसका एक ही मतलब था | सोने गया, तो आँखों में नींद कम और प्रश्न ज्यादा घूम रहे थे !

उस रात मुझे अच्छे से नींद नही आई । रात भर दिमाग में अलग अलग प्रश्न घूमते रहे । ये बाबा कौन थे ? कहाँ से आये थे ? मैने तो उनसे उनका नाम तक न पूछा ! नाम तो छोड़िए, पानी तक को न पूछा । कोई सवाल भी न पूछ पाया, अब कब मिलेंगे ? कहाँ मिलेंगे ! सवालों का कोई अंत नही हो रहा था । अगले दिन सुबह जब मैं आफिस जा रहा था, तो स्टीयरिंग तो हाथ में था पर इस बार दूसरे हाथ मे मोबाइल नही था । आंखें सड़कों पर कुछ ढूढना चाह रही थी । सड़क के किनारों पर, भीड़ में शायद बाबा कहीं दिख जाए ।

आफिस जाते में, आफिस से आते में, दो तीन दिन तक यही कोशिश रही कि कहीं बाबा दिख जाए पर शायद मैं एक स्वर्णिम अवसर गवां चुका था । मुझे बाबा तो क्या उनकी परछाई तक नही मिली । दो, चार दिन और इस बात की उम्मीद रही कि शायद अब मिल जाएं, अब कहीं कार के सामने आ जाएं और बोल दें, तेरा ध्यान किधर है ! पर ऐसा कुछ भी नही हुआ । कुछ दिनों बाद मैं भी उम्मीद छोड़ चुका था कि अब उनसे दुबारा मुलाकात होगी ।

सेल्स में हूँ, तो पूरा भारत भ्रमण चलता रहता है । अबकी बार मेरा टूर था रांची, झारखंड में । रांची शहर मुझे पसंद है क्योंकि उसके एयरपोर्ट के पास मेकॉन लिमिटेड नाम का PSU है और उसके ही पास में कल्पवृक्ष के दो बड़े बड़े पेड़ सड़क पर लगे हुए हैं । पहले सुना था कि तीन थे पर एक आंधी में गिर गया ,अब बस दो बचे हैं । एक अखबार के मुताबिक, पूरे भारत में शायद अब केवल 9 पेड़ ही बचे हैं और ये दो भी वन विभाग द्वारा संरक्षित हैं । इसके फूल बड़े प्यारे होते हैं । बाहर से आये बहुत से लोग इसको देखते हैं, पर कोई कोई ही हाथ जोड़ता है, क्योंकि ये पेड़ मंदिर में नही है, मेन रोड पर ही है, सो बड़ा सवाल है कि चार लोग क्या कहेंगे ! ये जो चार लोग हैं, ये बचपन से लेकर बुढापे तक पीछा ही नही छोड़ते । यही पेड़ मंदिर में होता तो लोगो का तांता खत्म नही होता । खैर, मैंने भी हर बार की तरह इस बार भी अपनी टैक्सी रुकवाई, बाहर जाके कल्पवृक्ष के सामने खड़ा हो गया । पर अब मांगू क्या ? सो मेरे मन में विचार आया कि क्यों न बाबा से मुलाकात ही मांग लूँ, शायद पूरी हो जाये । हाथ जोड़के, आंख बंद करके मैने कल्पना की मेरी बाबा से मुलाकात हो जाये जिससे शायद कुछ जानने को मिले और मुझे मेरे सवालों के जवाब मिल जायें ।

अचानक आवाज आई – आ गया तू ? ये तो बाबा की आवाज है, हजार लोगों की भीड़ में भी अब मैं इस आवाज को पहचान सकता हूँ, जैसे गाय का बछड़ा, हजारों गायों में भी अपनी मां को पहचान लेता है, ऐसे ही मैंने वो आवाज तुरंत पहचान ली । आंख खोली, चारों तरफ देखा पर बाबा तो कहीं दिखाई नही दिए । मैने आवाज की दिशा में कदम बढ़ाए तो देखा बाबा, पेड़ के तने के दूसरी तरफ आराम से बैठे हुए चने खा रहे हैं । एक पैर सीधा है और एक पैर घुटने से मुड़ा हुआ है, ध्यान चनों पर है । मैंने बाबा को देखा तो एकदम से खुशी का कोई ठिकाना ही न रहा । पता नही ये मेरा यहां इंतजार कर रहे थे या कल्पवृक्ष ने ये इच्छा इतनी जल्दी पूरी कर दी । जो भी है, इस बार मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए । वो बोले – जमीन पर बैठ पायेगा ? कपड़ो की क्या चिंता करनी, कौन सा यहां मुझे कोई जानता है और कल तो दूसरे पहनने ही थे सो मैं तुरंत उनके सामने जमीन पर ही उस कल्पवृक्ष के नीचे पालती मार कर बैठ गया । बाबा बोले – ध्यान करने कैसे बैठता है ? मैं तुरंत सीधा होकर बैठ गया और दोनों हाथ घुटने पर ज्ञान मुद्रा मे रख लिए । वो थोड़ा झुके, हाथ लंबा करके मेरी पीठ में नीचे से थोड़ा छुआ और हल्का सा दबाया, फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बुदबुदाए – मैने उस से कहा था, इसकी कुंडलिनी सुप्तावस्था में नही है, जागृत है । मैंने पूछा, उससे किससे बाबा ? बोले, तू उसे नही जानता, जान जाएगा धीरे धीरे ।

मेरे मन में सवाल घुमड़ ही रहे थे कि क्या पूछूं, क्या पूछू ! इतने में उनकी कड़कती आवाज आयी – गीता पढ़ी है कभी ? मुझे उस समय बड़ी शर्म सी आयी, ऐसा लगा किसी ने दो का पहाड़ा पूछ लिया हो और मुझे वो भी न आता हो । मैने धीरे से सर हलाते हुए बोला ,नही । वो चने खाने मशगूल थे, जैसे उन्हें ये जवाब पहले से ही अपेक्षित था, खाते खाते ही, सर नीचे करके ही बोले – क्यों नही पढ़ी ?

मुझे लगा, मैं अभी उसका अधिकारी नहीं हूँ, जब हो जाऊंगा तब ही पढूंगा – मैंने धीरे से ये उत्तर खिसकाया ।

बाबा बोले – “बोर्ड की परीक्षा दी थी कभी ?”

हां, दी तो थी । – मैंने जवाब दिया |

तब क्या ये सोचा था कि पहले पूरा कोर्स निबटा लूँ, तब ही परीक्षा देने जाऊंगा ? जब तक सब कुछ याद नही हो जाता, तब तक परीक्षा नही दूंगा !! मैंने न में सर हिलाया । तो अब क्यों ऐसा सोचता है !

अगर समझ में ही न आये तो गीता पढ़ने से क्या फायदा ? – मैने शंका जाहिर की ।

अपनी बेटी को कभी कोई बड़े क्लास की किताब पढ़ाई है ? – बाबा ने पूछा |
हाँ, पढ़ाने की कोशिश तो की है | – मैंने जवाब दिया |

क्या हुआ फिर ? – बाबा के सवाल मेरे जवाबों से तेज चल रहे थे |

वो थोडा पढ़ी फिर बोर हो गयी और उसने किताब छोड़ दी, उसे कुछ समझ ही नहीं आया | – मैंने बताया |

बस फिर, अगर तू गीता पढ़ेगा और कोई बात समझ में नहीं आएगी तो तू भी बोर हो जाएगा और तू भी गीता बंद कर देगा | संसार में सर्वग्य कोई नहीं होता | सम्पूर्ण ज्ञान किसी को कभी नहीं मिलता | जो आदमी ये सोचता है कि मैं ये भी पढ़ लूं, वो भी पढ़ लूं तो हजारों जन्म बीत जाएं पर फिर भी सब कुछ सीखा-पढ़ा नहीं जा सकता ! पढने योग्य अगर कुछ है तो वह है योग | गीता में भी योग के बारे में ही बताया गया है | योग करोगे तो तत्व मिलेगा !
मैं खुश हो गया, मन ही मन सोचा, चलो अब योगा भी सीखने को मिल जाएगा, बाबा रामदेव के यहाँ जाए बिना ही योगा सीख जाऊँगा |

“योगा नहीं मूर्ख ! योग |” – बाबा एकदम से गरजे | जब कोई अध्यापक किसी छात्र पर बिगड़ता है तो छात्र कुछ कर तो पाता नहीं है, बस मन ही मन अपनी सफाई दे रहा होता है, ऐसे ही मैंने भी अपने मन में सोचा – अरे यार ! ये बार बार मुझे मूर्ख क्यों बोलते हैं ! योग कहो या योगा, क्या फर्क पड़ता है !!!
फर्क पड़ता है | योग बहुत से होते हैं, कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग, हठ योग और भी अन्य लेकिन योगा कुछ नहीं होता | आसन मारने को योग नहीं कहा जाता | शब्दों शब्दों में फर्क होता है | कोई भी दो शब्द एक अर्थ वाले नहीं होते, यहाँ तक की पर्यायवाची शब्द भी समान अर्थ लिए होते हैं, लेकिन 100% समान नहीं होते हैं | उसके आस पास का ही एक शब्द पर्यायवाची होता है | शब्दों के अर्थ न बदलें इसके लिए सही शब्द प्रयोग और सही उच्चारण दोनों महत्वपूर्ण हैं | गलत शब्द या गलत उच्चारण से अर्थ बदल जाते हैं | स्वजन कभी श्वजन (कुत्ता ) नहीं हो सकता और सकल (सम्पूर्ण) कभी शकल (टूटा हुआ) नहीं हो सकता | शब्दों पर और उच्चारण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है | विशेष में भी श का उच्चारण अलग होता है और ष का उच्चारण अलग होता है |

हैं ? – मेरे दिमाग के सारे तार एक साथ झनझना गए ! ये क्या बोल रहे हैं ! श और ष में भी फर्क होता है ? ये तो पता ही नहीं था ! एक मिनट, एक मिनट, एक मिनट ! ये क्या मेरे मन की बात भी पढ़ रहे हैं ? इन्हें कैसे पता कि मैंने मन में योग सोचा या योगा सोचा ? मैंने रामदेव के बारे में कुछ सोचा या नहीं !!! ओ तेरी ! ये तो मेरे मन की बात भी पढ़ लेते हैं | अब ऐसा लग रहा था कि कुछ भी उलटा सीधा ख्याल भी मन में आया तो जैसे बचपन में के के मिश्रा आचार्य जी, गालियाँ सुनाते थे, (मूर्खाधिपति, लंकेश, दशानन) वैसे ही इनके मुख से भी गालियों के झरने फूट पड़ेंगे | इसलिए अब मन को शांत किया जाए नहीं तो फिर चालू हो जायेगा, मूर्ख, तेरा ध्यान किधर है !

श और ष में क्या फर्क है बाबा ? – मैंने बातों को साधने की कोशिश की |

क्रमशः
Abhinandan Sharma
दिल से….

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