«

»

Nov 26

योग – 1

yog

अर्जुन बोले – मैं योग के स्वरुप का तात्विक विवेचन सुनना चाहता हूँ | क्योंकि योग को समस्त उत्तम साधनों से भी उत्तम बताकर सब लोग उसकी बड़ी प्रशंसा करते हैं |

नारद जी ने कहा – कुरुश्रेष्ठ ! मैं संक्षेप से ही तुम्हें योग का तत्व बतलाता हूँ | इसके सुनने से भी चित्त निर्मल होता है, फिर सेवन करने से तो कहना ही क्या है ? चित्त की वृत्तियों को जो रोकना है वही योग का तत्व कहलाता है | योगी पुरुष अष्टांग योग की विधि से उसकी साधना करते हैं | यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्येय, ध्यान और समाधि (पातंजलि योगदर्शन के अनुसार योग के आठ अंगों में आसन की भी गणना की गयी है, ध्येय तो साध्य है | अतः साधन का अंग नहीं माना गया है; इसलिए वहां साध्य को अष्टांग में नहीं लिया गया है | यम नियम आदि अन्य सात साधन उसमें भी वे ही हैं, जो यहाँ है) – ये योग के आठ अंग हैं | इस प्रकार योग आठ अंगों से युक्त बताया गया है | उन आठों में से प्रत्येक का लक्षण सुनो, जिसके साधन से साधक को योग की प्राप्ति होती है |

अंहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह – ये पांच यम कहे गए हैं | इन सबका भी लक्षण सुनो | जो सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मभाव रखकर सबके हित के लिए चेष्टा करता है, उसकी वह प्रवृत्ति ‘अंहिंसा’ कही गयी है | जिसका वेदों में भी विधान किया गया है, जो स्वयं देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो; अथवा अपने अनुभव में लाया गया हो, उसे दूसरों को पीड़ा न देते हुए यथार्थ रूपसे वाणी द्वारा प्रकट करना ‘सत्य’ कहलाता है | अपने ऊपर आपत्ति पड़ने पर भी मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी प्रकार भी दूसरों का धन ने लेना ‘अस्तेय’ कहा गया है | मन, वाणी, शरीर और क्रिया द्वारा मैथुन से सर्वथा दूर रहना, यह सन्यासियों का ‘ब्रह्मचर्य’ है तथा ऋतुकाल में अपनी ही पत्नी के साथ केवल एक बार समागम करना तथा अन्य समय में पूर्ण संयम रखना यह गृहस्थों का ‘ब्रह्मचर्य’ है | मन, वाणी, शरीर और क्रिया द्वारा सब वस्तुओं का त्याग कर देना, यह सन्यासियों का ‘अपरिग्रह’ है तथा सब वस्तुओं का संग्रह रखते हुए भी केवल मन से उनका त्याग करना – उनके प्रति ममता और आसक्ति का न होना – यह गृहस्थों का ‘अपरिग्रह’ माना गया है |

ये पांच यम बतलाये गए हैं, अब पांच नियमों का श्रवण करो | शौच, संतोष, तप, जप और गुरुभक्ति – ये पांच नियम हैं | (योग दर्शन में शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान – ये पांच नियम कहे गए हैं | यहाँ भी तीन तो वैसे ही हैं | स्वाध्याय के स्थान में यहाँ जप लिया गया है परन्तु जप के लक्षण में स्वाध्याय को ग्रहण करके दोनों की एकता मान ली गयी है | शिव की भक्ति ही यहाँ गुरुभक्ति है, अतः वह भी ईश्वर प्रणिधान से भिन्न नहीं है | ) अब इनका भी पृथक पृथक लक्षण श्रवण करो |

शौच दो प्रकार का बताया गया है  – वाह्य और आभ्यंतर | मिटटी और जल से जो शरीर की शुद्धि की जाती है, वह ‘वाह्य शौच’ कहलाता है और मन की शुद्धि को ‘आतंरिक शौच कहते हैं | न्याय से प्राप्त हुई जीविका या भिक्षा अथवा वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि) के द्वारा जो कुछ प्राप्त हो, उसी से सदा संतुष्ट रहना ‘संतोष’ कहलाता है | अपने आहार को घटाते हुए साधक पुरुष जो चान्द्रायण आदि विहित तप का अनुष्ठान करता है, उसका नाम ‘तप’ है | वेदों एक स्वाध्याय तथा प्रणव के अभ्यास आदि को ‘जप’ कहा गया है | भगवान् शिव ही ज्ञानस्वरुप गुरु हैं, उनमें जो भक्ति की जाती है, वही ‘गुरुभक्ति’ मानी गयी है | इस प्रकार नियमों और यम का भली भांति साधन करके विद्वान् पुरुष प्राणायाम के लिए सन्नद्ध होवे, अन्यथा वह योग की सिद्धि नहीं कर सकता क्योंकि जिसका शरीर बाहर से और भीतर से शुद्ध नहीं हुआ है, उसमें वायु का महान प्रकोप हो जाता है और वायु के प्रकोप से शरीर में कोढ़ बढ़ जाती है | इतना ही नहीं, वह जड़ता आदि का भी उपभोग करता है (लकवा आदि मार जाने से उसका शरीर जड़ हो जाता है), इसलिए बुद्धिमान पुरुष शरीर को शुद्ध करके ही दुसरे साधन का प्रयोग करे |

पांडुनंदन ! अब मैं प्राणायाम का लक्षण बतलाता हूँ, सुनो | प्राण और अपान वायु का निरोध ‘प्राणायाम’ कहलाता है | विद्वान् पुरुषों ने उसे तीन प्रकार का बतलाया है – लघु, मध्यम और उत्तरीय (उत्तम) | लघु प्राणायाम बारह मात्रा का होता है | आँख को बंद करने और खोलने में जितना समय लगता है, वह एक मात्रा है | लघु से दूना अर्थात चौबीस मात्रा वाला मध्यम प्राणायाम बताया गया है | त्रिगुण अर्थात छत्तीस मात्रा का उत्तम प्राणायाम माना गया है | प्रथम अर्थात लघु प्राणायाम से स्वेद (पसीने) को जीते, मध्यम से कंप को तथा तृतीय (उत्तम) प्राणायाम से विषाद को जीते | इस प्रकार क्रमशः तीनों दोषों पर विजय प्राप्त करे |

किसी सुन्दर आसन पर सुखपूर्वक विराजमान हो पद्मासन (पद्मासन लगाने की विधि यह है – दांयी जांघ पर बाया चरण रखे और बायीं जांघ पर दायाँ चरण रखे | फिर बाएं हाथ को पीठ की ओर से जाकर दायें चरण का अंगूठा दृडता के साथ पकड़ ले | इसी प्रकार दांये हाथ को पीछे की ओर ले जाकर बाएं चरण का अंगूठा पकड़ ले | फिर गर्दन झुका कर अपनी ठोड़ी को छाती से सटा ले और नेत्रों से केवल नासिका के अग्रभाग को ही देखे | यह योगाभ्यासी पुरुषों के उपयोग में आने वाला पद्मासन कहलाता है, यह रोगों का नाश करने वाला है | ) लगा कर रेचक, पूरक और कुम्भक भेद से त्रिविध प्राणायाम का अभ्यास करे | प्राणों का उपरोध (संयम) करने से उस साधन का नाम ‘प्राणायाम’ है | जैसे आग में धोंके जाने पर पर्वतीय धातु की मैल जाती है, उसी प्रकार प्राणायाम से इन्द्रियजनित सम्पूर्ण दोष दग्ध हो जाते हैं | सौ कपिला गायों का दान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही प्राणायाम से भी मिल जाता है | इसलिए योगज्ञ पुरुष सदैव प्राणायाम करे | प्राणायाम से शान्ति आदि गुण सिद्ध होते हैं | शान्ति, प्रशांति, दीप्ति और प्रसाद – ये क्रमशः प्रकट होने वाले दिव्य गुण हैं | स्वाभाविक और आगंतुक पापों की निवृत्ति तथा उनकी वासनाओं का शमन, यह ‘शान्ति’ नामक प्रथम गुण है | मन और बुद्धि के द्वारा लोभ और मोहरुपी दोषों का पूर्णतया निराकरण करके जो शान्ति की प्राप्ति होती है, उसी को इस लोग में ‘प्रशांति’ कहा गया है | भूत, भविष्य, दूरस्थ तथा अदृश्य पदार्थों का यहाँ भलीभांति ज्ञान होना ही ‘दीप्ति’ है | सम्पूर्ण इन्द्रियों की प्रसन्नता तथा बुद्धि और प्राणों की भी निर्मलता ‘प्रसाद’ कहा गया है | इस प्रकार चार फल प्राणायाम के द्वारा प्राप्त करने योग्य हैं | ऐसे फल वाला प्राणायाम योगी पुरुष सदैव अभ्यास करे | जैसे सदा सेवन करने पर सिंह, व्याघ्र और हाथी भी मृदुता (कोमलता एवमं नम्रता) को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम साधित (संयम में लाया हुआ) प्राण भी वश में हो जाता है | यह प्राणायाम बताया गया है |

अब प्रत्याहार का वर्णन सुनो – विषय-सेवन में लगे हुए चित्त को विषयों की ओर से लौटाने का जो प्रयत्न है, उसे ‘प्रत्याहार’ कहते हैं | चित्त को संयम में रखना ही प्रत्याहार का मुख्य लक्षण है | इस प्रकार प्रत्याहार बताया गया है |

अब धारणा का लक्षण सुनो – जैसे जल पीने की अभिलाषा रखने वाले लोग पत्र और नाल आदि के द्वारा धीरे धीरे जल पीते हैं, उसी प्रकार योगी पुरुष धारणा के द्वारा साधित वायु का धीरे धीरे पान करता है | गुदा, लिंग, नाभि, ह्रदय, तांक तथा भ्रूमध्यभाग (ललाट) में क्रमश चतुर्दल, षड्दल, दशदल, द्वादशदल, षोडशदल तथा द्विदल कमल का चिंतन करके उन सबमें प्राणवायु की धारणा करे और धीरे धीरे एक स्थान से समेट कर दूसरे स्थान में ऊपर उठाते हुए उस प्राण को मस्तक के भीतर ब्रह्मरन्ध्र में स्थापित कर दे | गुदा आदि छह अंग और चतुर्दल आदि छह चक्र – इन बारह स्थानों में प्राणवायु की धारणा तथा संकोच करने से सब मिलाकर १२ प्रकार के प्राणायाम होते हैं | इसी को ‘धारणा’ कहा गया है | इन धारणाओं को सिद्ध कर लेने पर योगी पुरुष अक्षर ब्रह्म की समता को प्राप्त हो जाता है |

धारणा में स्थित हुए पुरुष के ये जो ध्येय तत्व हैं, उसका लक्षण सुनो – अर्जुन ! ध्येयतत्व बहुत प्रकार का है, उनका कहीं अंत नहीं मिलता | कोई शिव का, कोई विष्णु का, कोई सूर्य, कोई ब्रह्मा और कोई महादेवी का ध्यान करते हैं | जो जिसका ध्यान करता है, वह उसी में लीन हो जाता है, इस लिए सदा कल्याण करने वाले पंचमुख भगवान् शंकर का ध्यान करना चाहिए | भगवान् शिव वृषभ की पीठ पर पद्मासन से विराजमान हैं, उनकी अंगकान्ति गौर है, उनके दस हाथ हैं और मुख पर अत्यंत प्रसन्नता छा रही है तथा वे ध्यानमग्न हो रहे हैं | इस प्रकार तुम्हारे लिए ‘ध्येय’ का स्वरूप बताया गया | इसका सडा ध्यान करना चाहिए | ‘ध्यान’ का लक्षण इस प्रकार है | धारणा में स्थित हुआ साधक आधे पल के लिए भी अपने ध्येय (इष्टदेव) से भिन्न वस्तु का चिंतन न करे |

इस प्रकार इस दुर्गम भूमि में स्थित होकर योगवेत्ता पुरुष कुछ भी चिंतन न करे – वही ‘समाधि’ कहलाती है | समाधि का ठीक ठीक लक्षण बता रहा हूँ, सुनो | जो शब्द, स्पर्श, रस, गंध, तथा रूप से सर्वथा रहित हैं, उस परम पुरुष परमात्मा को प्राप्त हुआ योगी ‘समाधिस्थ’ कहा गया है | समाधि में स्थित हुआ मनुष्य कभी विघ्नों से अभिभूत नहीं होता | भारी से भारी दुःख क्यों न आ जाए, वह उस से विचलित नहीं होता | उसके कानो के पास यदि सैकड़ों शंख फूंके जाएँ और बहुत से नगाड़े पीते जाएँ तो भी वह बाहर के शब्द को नहीं सुनता | कोड़ों के प्रहार से उसे घायल कर दिया जाय, आग से उसका शरीर जल जाए तथा सर्दी से भरे हुए भयंकर स्थान पर उसे बैठा दिया जाए, तो भी वह बाहर के स्पर्श का अनुभव नहीं करता | फिर वैसे पुरुष के लिए भारी रूप, गंध और रस के विषय में तो कहना ही क्या है ? जो इस प्रकार आत्मा का साक्षात्कार करके पुनः समाधि को प्राप्त करता है, उसे भूख और प्यास कभी बाधा नहीं पहुंचा सकती | निश्छल समाधि को पाकर मनुष्य जिस सुख का अनुभव करता है, वह न तो स्वर्गलोक में है और न ही पाताल में ही है; फिर मनुष्यलोक में तो वह हो ही कहाँ सकता है |

yog 2

कुरुनन्दन ! इस प्रकार योगमार्ग पर आरूढ़ हुए पुरुष के लिए भी पांच उपसर्ग प्राप्त होते हैं, जो बड़े ही कटु हैं – उनका परिचय सुनो | प्रतिभा, श्रावण, दैव, भ्रम और आवर्त – ये ही पांच उपसर्ग हैं | सम्पूर्ण शास्त्रों की प्रतिभा (ज्ञान) का हो जाना ही ‘प्रतिभा’ उपसर्ग है | यह है तो सात्विक परन्तु इसके कारण जिसके ह्रदय में अहंकार आ जाता है, इससे वह योगी अपनी स्थिति से नीचे गिर जाता है | हजारों योजन दूर से भी शब्द को सुन लेना ‘श्रावण’ नामक उपसर्ग है | यह दूसरा विघ्न है | यह भी सात्विक ही है परन्तु इसके कारण भी जो गर्व करता है वह नष्ट हो जाता है (साधना से गिर जाता है) | जिससे देवताओं की आठ योनियों को देखता है, उस शक्ति का प्राप्त होना ‘दैव’ उपसर्ग है | यह भी सात्विक दोष है, इससे भी घमंड होने पर साधक का नाश होता है | जैसे जल के भंवर में डूबा हुआ मनुष्य व्याकुल होता है, उसी प्रकार सहसा प्रकट हुए विविध विज्ञान के आवर्त में जो चित्त की व्याकुलता होती है, उसका नाम ‘आवर्त’ है | यह राजस दोष है, जो बड़ा ही भयंकर है | जब योगी का मन अनेक प्रकार के दोषों से आक्रांत हो समस्त आधारों से भ्रष्ट होने के कारण अवलंबशून्य होकर भटकने लगता है तब उसे ‘भ्रम’ नामक दोष बताया गया है | यह तामस दोष है | इन अत्यंत घोर उपद्रवों से योग का नाश हो जाने के कारण सम्पूर्ण देवयोनियाँ बार बार आवर्तन करती (आवागमन में पड़ी रहती है) हैं |

इसलिए योगी मनोमय श्वेत कम्बल (मन में यह भावना करे कि मेरे सब ओर श्वेत कम्बल का आवरण पड़ा है, मैं अकेला हूँ, जगत की कोई विघ्न-बाधा मेरे पास तक नहीं पहुँच सकती)  का आवरण डालकर परब्रह्म परमात्मा में चित्त को स्थिर करके निरंतर उन्ही का चिंतन करे | सिद्धि की इच्छा रखने वाले योगी को सदा सात्विक आहार का सेवन करना चाहिए | राजस और तामस आहारों से योगी की कभी सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती | स्वधर्म पालन में लगे हुए श्रद्धालु जितेन्द्रिय श्रोत्रिय महात्माओं के यहाँ योगी को भिक्षा मांगनी चाहिए | भिक्षा में मिले हुए यवान्न, मद्य, दूध, जोकी, लपसी, पका हुआ फल-मूल अथवा कण, तिल की खली या सत्तू – ये सब पवित्र आहार है, जो योगियों की सिद्धि प्रदान कराने वाले हैं |

यदि वह उस मृत्यु को नहीं चाहता तो उसे वह नहीं प्राप्त होती अथवा यदि मुक्ति की इच्छा हो तो उस मृत्यु को ब्रह्मरन्ध्र में छोड़ दे | इस प्रकार विमुक्त हुए शरीर में भी जो उपसर्ग योगी को प्राप्त होते हैं, उनके नाम सुनो – ईशान, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, इंद्र, चन्द्र, प्रजापति तथा ब्रह्मा – इनसे सम्बन्ध रखने वाली आठ लोकों में क्रमशः आठ सिद्धियाँ होती हैं, जो इस प्रकार हैं – पार्थिवी, जलमयी, तैजसी, वायुसम्बन्धिनी, मानसी, अहंकारोद्भवा तथा बुद्धिजा | इनमें प्रत्येक के आठ आठ भेद हैं और ये उत्तरोत्तर लोकों में क्रमशः द्विगुण-त्रिगुण आदि के क्रम से स्थित हैं | पूर्व अर्थात ईशानलोक में आठ सिद्धियाँ है और अंतिम अर्थात ब्रह्मलोक में इनकी संख्या चौसठ हो जाती है | ऐसा किस प्रकार होता है, सो सुनो ! मोटा होना, पतला होना, बालक बन जाना, बूढा होना, जवान हो जाना, भिन्न भिन्न जाति के जीवों के रूप में अपने को प्रकट करना, एक ही जाति में भी अनेक रूप ग्रहण करना तथा पार्थिव अंश के बिना ही केवल चार तत्वों से शरीर को धारण करना – ये आठ पार्थिवी सिद्धियाँ हैं, जो ईशानलोक में पृथ्वीतत्व पर विजय प्राप्त होने के बाद प्रकट होती हैं |

जलतत्व पर विजय होने के पश्चात मनुष्य पृथ्वी की ही भांति जल में निवास करता है | बिना किसी घबराहट के समुन्द्र को पी सकता है, उसे सर्वत्र जल की प्राप्ति होती है, वह सूखे फल को भी हरा और रसीला कर सकता है | पृथ्वी और जल को छोड़कर केवल तीन भूतों से शरीर धारण करता है | नदियों को हाथ में रख सकता है, उसके शरीर में कोई घाव नहीं होता तथा उसकी बड़ी सुन्दर कान्ति होती है | इस प्रकार ये आठ नूतन और आठ पहले की, कुल सोलह सिद्धियाँ राक्षस लोक में मानी गयी हैं |

अग्नितत्व पर अधिकार हो जाने पर देह से अग्नि प्रकट करना, अग्नि के ताप का भय दूर हो जाना, समस्त लोकों को भस्म कर डालने की शक्ति का होना, पानी में आग लगा देना, हाथ से आग को उठा लेना, स्मरणमात्र से किसी को भी पवित्र देना, आग से जलकर भस्म हुए पदार्थ का पुनः निर्माण पर देना तथा केवल दो महाभूत बायु और आकाश के आधार पर शरीर को धारण करना – ये आठ तैजस सिद्धियाँ और पहले की सोलह सब मिलकर चौबीस सिद्धियाँ यक्ष लोक में प्रकट होती है |

मन के समान गमनशक्ति का होना, प्राणियों के भीतर प्रवेश करना, पर्वत आदि बड़ी भारी वस्तुओं का भार लीलापूर्वक ढोना, भारी हो जाना, हल्का हो जाना, दोनों हाथों से वायु को पकड़ लेना, अंगुली के अग्रभाग के धक्के से समूची पृथ्वी को हिला देना तथा एकमात्र आकाशतत्व से ही शरीर को धारण करना – ये वायुसम्बन्धी शक्तियां गन्धर्वलोक में हैं | पहले की चौबीस और आठ नूतन कुल मिला कर बत्तीस सिद्धियाँ गन्धर्व लोक में हैं }

अपनी छाया को मिटा देना, इन्द्रियों का दर्शन न होना, सदा आकाश में चलना, इन्द्रिय और मन आदि का स्वयं शांत रहना, दूर के शब्द सुन लेना, सब प्राणियों के शब्द को समझ लेना, तन्मात्राओं के चिन्ह को ग्रहण कर लेना तथा समस्त प्राणियों को देखना – ये आठ आकाशतत्व को जीतने से प्राप्त होने वाली तथा पहले की बत्तीस कुल चालीस सिद्धियाँ इंद्रलोक में हैं |

इच्छा के अनुरूप वस्तुओं का प्राप्त होना, जहाँ इच्छा हो वही निकल जाना, सब प्रकार की शक्तियों का होना, समस्त गोपनीय वस्तुओं को देखना तथा समस्त संसार की घटनाओं को देखना आदि आठ सिद्धियाँ मानी जाती है | ये तथा पहले की चालीस कुल अडतालीस सिद्धियाँ चन्द्र लोक में मानी गयी है |

काटना, तपाना, छेदना, संसार को बदल डालना, समस्त प्राणियों को प्रसन्न कर देना तथा मृत्युकाल पर विजय पाना आदि आठ अहंकारोद्व्या तथा पहले की अडतालीस, कुल छप्पन सिद्धियाँ प्राजापत्यलोक में हैं |

संकेतमात्र से ही संसार की सृष्टि कर दिन, सब पर अनुग्रह करना, प्रलय का अधिकार प्राप्त करना, अन्य लोगों के चित्त में प्रवेश करके उसे प्रेरित करना, जिसकी कहीं समता नहीं ऐसी वस्तु प्रकट कर देना, चित्रलिखित वस्तु को प्रत्यक्ष प्रकट कर देना, अशुभ को शांत कर देना तथा कर्तुत्व शक्ति से संपन्न होना – ये आठ बुद्धि जनित सिद्धियाँ तथा पहले की छप्पन मिला कर चौसठ सिद्धियाँ ब्रह्म लोक में विद्यमान हैं |

यह गोपनीय रहस्य मैंने तुमसे प्रकट किया है | ये सब सिद्धियाँ जीते जी अथवा देह-भेद होने पर योगी को प्राप्त होती है | परन्तु इनके द्वारा सदैव पतन का भय बना रहता है | इसलिए लोगी को इन सिद्धियों के प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिए |  इन सब सिद्धिजनक गुणों का निवारण करके सदा योगसाधना लगे रहने वाले योगी को ऐसी आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, जो योग में भली भांति सिद्धि प्रदान करने वाली हैं | उनके नाम इस प्रकार हैं – अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य ईशित्व, वशित्व तथा कामावसायिता | ये आठ सिद्धियाँ माहेश्वर पद में स्थिति सूचित करती हैं | सूक्ष्म से सूक्ष्म हो जाना ‘अणिमा’ शक्ति है | अत्यंत शीघ्रता से कोई काम करना ‘लघिमा’ शक्ति है | समस्त लोक से पूजनीय पद की प्राप्ति होने से ‘महिमा’ मानी गयी है | ‘प्राप्ति’ नामक सिद्धि वह है, जब कि योगी के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं रह जाता है | सर्वत्र व्यापक होने के कारण उसमें ‘प्राकाम्य’ नामक सिद्धि का उदय माना जाता है | सिद्ध योगी जिससे ईश्वरतुल्य हो जाता है, वह ‘ईशित्व’ नामक सिद्धि है | सबको वश में करने के कारण ‘वशिता’ नामक उत्तम सिद्धि मानी गयी है |

जहां इच्छा हो वहां पहुच जाना ‘कामावसायिता नामक सिद्धि है | ये समस्त सिद्धियाँ ईश्वर पद को प्राप्त हुए योगी में प्रकट होती हैं } इसलिए वह ना तो जन्म लेता है, न बढ़ता है और न ही मृत्यु को प्राप्त होता है | ऐसा योगी मुक्त कहा गया है | जो इस प्रकार मुक्ति प्राप्त हो जाता है, उसकी आत्मा परमात्मा के साथ उसी प्रकार एक हो जाती है, जैसे जल में डाला हुआ जल परस्पर एकता को प्राप्त होता है | योग का ऐसा फल जानकर योगी पुरुष सदा योग का अभ्यास करे | निर्मल योगीजन वहां योगसिद्धि के लिए कुछ उपमाएं दिया करते हैं | जैसे सूर्यकान्तमणि चंद्रमा की किरणों के संयोग से अथवा चन्द्रकांतमणि के संयोग से अग्नि प्रकट नहीं करता अपितु अकेला होने पर ही सजातीय सूर्यकिरण के संयोग से वह आग प्रज्ज्वलित करता है, उसी प्रकार योगी की भी उपमा है | योगी भी तभी सिद्धि लाभ करता है, जब वह प्रतिबंधको से दूर रह कर अनुकूल साधन सामग्री के साथ अकेला रहकर साधन में सलग्न होता है | जैसे चिड़ियाँ, चूहा, नेवला घर में स्वामी की भांति निवास करते हैं और घर गिर जाने पर अन्यत्र चले जाते हैं, किन्तु उनके मन को इसके लिए दुःख नहीं होता | यही उपमा योगी के लिए भी है | उसको भी देह गेह में ममता नहीं रखनी चाहिए | जैसे चींटी या दीमक अपने बहुत छोटे मुखाग्र से थोड़ी थोड़ी मिटटी जमा करके मिटटी का ढेर लगा देते हैं, यही उपदेश योगी के लिए भी है | योगी निरंतर थोड़ी थोड़ी साधनाशक्ति का संचय करते हुए एक दिन महती योगशक्ति से संपन्न हो जाता है | पत्र, पुष्प और फल से भरे हुए वृक्ष को पशु, पक्षी और मनुष्य आदि नष्ट कर देते हैं | इस रहस्य को समझ कर योगी पुरुष सिद्धि प्राप्त कर लेते हिं | सारांश ये है कि यदि योगी भी सिद्धि का चमत्कार प्रकट करने लगे तो संसार के लोग उसे अपनी साधना से भ्रष्ट कर देंगे | अतः उसे गुप्त रहकर ही साधना करनी चाहिए | हिरन के बच्चे के सर पर जब पहले सींग उगते हैं तो वे तिलक के सामान दिखाई देते हैं और धीरे धीरे बढ़ कर बहुत बड़े हो जाते हैं | इस बात को लक्ष्य करके योगी उस हिरन के सींग के साथ साथ यदि बढ़ने लगे (धीरे धीरे अपनी साधना बढाता रहे) तो वह सिद्धि को प्राप्त कर लेता है | मनुष्य जल या तेल आदि द्रव पदार्थों से भरे हुए पात्र को लेकर पृथ्वी से बहुत ऊंचे मार्ग पर चढ़  जाता है, यह देखकर भी क्या योगी पुरुषों को अपने कर्तव्य का ज्ञान नहीं होता | उसको भी चाहिए कि वह अत्यंत सावधान होकर योगी के उच्च शिखर का आरोहण करे |

वही घर है, जहाँ निवास हो | वही भोजन है, जिससे जीवन की रक्षा हो | जिससे प्रयोजन सिद्ध हो और जो स्वयं ही योगसिद्धि में सहायक हो, वैसे ही ज्ञान की योगी उपासना करे | वही उसके लिए कर्मसाधक हो सकता है | नाना प्रकार के ज्ञान का जो अधिक संग्रह है, वह योग की साधना में विघ्नकारक ही होता है | जो ‘यह जानने योग्य है, यह जानने योग्य है’ ऐसा सोचते हुए बहुविध ज्ञान के लिए प्यासा फिरता है, वह एक हजार कल्पों में भी ज्ञेय वस्तु को नहीं प्राप्त कर सकता | आसक्ति छोड़ कर, क्रोध को जीत कर, परिमित आहार सेवन करते हुए, जितेन्द्रिय होवे और बुद्धि के द्वारा इन्द्रियद्वारों को बंद करके मन को ध्यान में लगाए | सात्विक आहार का सेवन करे, ऐसी आहार का नहीं, जिससे उसका चित्त काबू के बाहर हो जाए | चित्त को बिगाड़ने वाले आहार का सेवन करने वाला मनुष्य रौरव नरक का प्रिय अतिथि होता है | वाणि दण्ड है, कर्म दण्ड है और मन दण्ड है | ये तीनो दण्ड जिसके अधीन है; वह ‘त्रिदंडी’ यति माना गया है | जब सामने आया हुआ मनुष्य अनुरक्त हो जाए, परोक्ष में गुणों का कीर्तन होने लगे और कोई भी जीव उस से भयभीत न हो, तब यह सब योगी के लिए सिद्धिसूचक लक्षण बताया जाता है | लोलुपता का न होना, नीरोग रहना, निष्ठुरता का अभाव होना, सुन्दर गंध प्रकट होना,  मल और मूत्र का कम हो जाना, शरीर में कान्ति, मन में प्रसन्नता तथा वाणी में कोमलता – ये योगसिद्धि के प्रारंभिक चिन्ह हैं | जो एकाग्रचित्त, ब्रह्मचिंतनपरायण, प्रमादशून्य, पवित्र, एकांतप्रेमी और जितेन्द्रिय है | वह महामना योगी इस योग में सिद्धि प्राप्त करता है और उस योग के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त हो जाता है | जिसका चित्त मोक्षमार्ग में आकर परब्रह्म परमात्मा में सलंग्न हो सुख के अपार सिन्धु में निमग्न हो गया है, उसका कुल पवित्र हो गया, उसकी माता कृतार्थ हो गयी, तथा उसे पाकर यह सारी पृथ्वी भी सौभाग्यवती हो गयी | जिसकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध है, जो मिटटी के ढेले और सुवर्ण में समान भाव रखता है, समस्त प्राणियों में समभाव से निवास करता है | वह यत्नशील साधक अपनी साधना पूर्ण कर्केउस सर्वोत्कृष्ट सनातन एवं अविनाशी पद को प्राप्त होता है, जहाँ पहुच जाने पर कोई भी मनुष्य पुनः इस संसार में जन्म नहीं लेता |

अर्जुन ! यह योग का रहस्य मैंने तुमसे बतलाया है | गौतम ने ऐसे ही योग को प्राप्त किया और उन्होंने ही इस गौतमेश्वर लिंग को स्थापित किया है, जो कि दर्शन करने वाले मनुष्य के समस्त कलिकलापों का विनाश करनेवाला है |

स्कन्द पुराण (माहेश्वर खंड)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>