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Oct 11

प्रणव क्या है ?

यो विद्याचतुरो वेदान साङ्गोपानिषदो द्विजः | न चेत पुराणं सविद्यावैध्यं स ख्यातिचक्षणः ||
इतिहास्पुराणास्थां वेदं समुपर्वह्येत | विभेत्वल्प्श्रुताद वेदो मामर्थं प्रहरिष्यति ||

अर्थ – अङ्ग और उपनिषद के सहित चारो वेदों का अध्ययन करके भी, यदि पुराणों को नहीं जाना गया तो ब्राहमण विचक्षण नहीं हो सकता; क्योंकि इतिहास पुराण के द्वारा ही वेद की पुष्टि करनी चाहिए | यही नहीं, पुराणज्ञान से रहित अल्पज्ञ से वेद भी डरते रहते हैं, क्योंकि ऐसे व्यक्ति के द्वारा ही वेद का अपमान हुआ करता है |

पुराणों में दस प्रकार के बीजरूपी प्रणव का उल्लेख मिलता है |  ओज को अनुस्वार से युक्त करके ‘ओं’ को प्रथम वर्ण कहा गया है, अंशुमान और अंशु का योग ‘आं’ यह नायकस्वरूप द्वितीय वर्ण है | अंशुमान और ईश्वर -‘ईं’ ये तीसरा वर्ण है और अंशु (अनुस्वार) से आक्रांत ऊहक अर्थात ॐ यह चतुर्थ वर्ण है | सानुस्वार वरुण (व्), प्राण (य्)  और तेजस (र) – अर्थात ‘व्यं’ इसे पञ्चम बीजाक्षर बताया गया है | तत्पश्चात सानुस्वार कृतांत (मकार) अर्थात ‘मं’ यह षष्ठ बीज है | सानुस्वार उदक और प्राण (व्यं) सप्तम बीज रूप में उधृत हुआ है | इन्दुयुक्त पद्म  -‘पं’ आठवां तथा एकपादयुक्त नन्दीश ‘नें’ नवां बीज है | अंत में प्रथम बीज ‘ओं’ का ही उल्लेख किया जाता है | इस प्रकार जो दशबीजात्मक मंत्र हैं, इसे ‘क्षपण’ कहा गया है | इसका पहला, तीसरा, पांचवां, सातवाँ तथा नवां बीज क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजातस्वरुप है | द्वितीय आदि बीज ह्रद्यादि अंगन्यास में उपयुक्त होते हैं |1

अग्नि पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि वेद के श्लोकों का प्रारम्भ प्रणव से करना चाहिए और प्रणव का तात्पर्य होता है परब्रहम, परमात्मा | अग्नि पुराण में जहाँ वेदों का प्रारंभ प्रणव से करने को कहा गया है, वहां ओं (ओंकार) को ही प्रणव कहा गया है (जिसे बिंदी को हटा कर ‘ओम्’ भी लिख दिया जाता है)  और उसका महात्म्य ऐसे कहा गया हैं |2

“यह एकाक्षर ही ब्रहम है, यही प्रणव है, यही परम तत्व है | वाणी में जितने भी विषय की स्थिति है, सब प्रणव है अतः प्रणव का अभ्यास करना चाहिए | तीन मात्राएँ, तीनो वेद, भू आदि तीनो लोक, तीन गुण, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति – ये तीनो अवस्थाएं तथा ब्रह्मा, विष्णु, और शिव – ये तीनो देवता प्रणवरूप ही हैं | ऐसे ओंकार को जिसने जान लिया वही मुनि है | मनुष्य को चाहिए कि मन से ह्रदयकमल में स्थित आत्मा या ब्रह्म का ध्यान करे और जिह्वा से सदा प्रणव का जाप करता रहे (यही ईश्वरप्रणिधान है) | ‘प्रणव’ धनुष है, ‘जीवात्मा बाण है तथा ‘ब्रह्म’ उसका लक्ष्य कहा जाता है | इस प्रणव का देवी गायत्री छंद है, परमात्मा देवता है तथा भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए इसका विनियोग किया जाता है |” – (अग्नि पुराण, ३७२ वां अध्याय)”

कुछ लोग ॐ और ओम में कोई अंतर नहीं समझते हैं | कुछ लोग तो ॐ की व्युत्पत्ति भी ऐसे करते है कि अ उ और म से मिलकर बना है ॐ (जैसा विकिपिडिया पर लिखा हुआ है) और कई जगहों पर आपको ओ, इ और म भी मिल जाएगा, जबकि ऐसा नहीं है |  अग्नि पुराण में  ॐ  को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि ॐ (जैसा कि ऊपर दिया गया है), अंशु (अनुस्वार) से आक्रांत ऊहक (बड़ा ऊ) है अर्थात इसमें अकार (अ) नहीं है, जबकि ‘ओम्‘, अकार, उकार (छोटा उ) और अर्धमात्राविशिष्ट मकार हैं |3 अ और उ मिलकर ओ बनाते हैं और उस पर अर्धमात्राविशिष्ट मकार यानि म् या बिंदी है अर्थात इसे ओं या ओम्’ लिखा जाएगा किन्तु इसे एकाक्षर कहा गया है अतः ‘ओं’ लिखना ज्यादा उचित होगा | अतः जहाँ वेद के मंत्रो की बात आती है वहां उनका प्रारंभ ‘ओं’ से करना ही उचित है | (इनके उच्चारण भी अलग अलग होने चाहिए, ऐसा मत है, कुछ विद्वान् ॐ का उच्चारण भी ‘ओं’ जैसा ही कर देते हैं जबकि इसका उच्चारण आँ, ईं जैसा ही होना चाहिए यानि ॐ का उच्चारण ओम् न कह कर ऊम् होना चाहिए क्योंकि ॐ केवल अंशु से आक्रांत  ऊहक है और इसमें अकार नहीं है अतः इसका उच्चारण ओम् से भिन्न होगा |)

ओंकार बिंदु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः, कामदं मोक्षणम् चैव ओङ्काराय नमो नमः | – यहाँ भी ओम् (प्रणव) के बारे में ही कहा गया है (ध्यान दें) ॐ के बारे में नहीं |

म् एक संस्कृत का शब्द भी है जिसका अर्थ स्वीकृति देने के अर्थ में लगाया जाता है जिसके पर्यायवाची एवं और परमम होते हैं | अग्नि पुराण के निरुक्त के निरूपण में ऐसा कहा गया है |

नोट – अग्नि पुराण (गीता प्रेस) में इस विषय में अनुवादक ने ओंकार के स्थान पर ॐकार का प्रयोग किया है, जो कि भ्रामक है और तत्व विवेचन के पश्चात ही और अग्नि पुराण को ही प्रमाण मान कर ‘ॐ’ और ‘ओं’ में अंतर किया गया है |

1. अग्नि पुराण (हिंदी अनुवाद, गीता प्रेस) – पृष्ठ संख्या ६५३

२  अग्नि पुराण (हिंदी अनुवाद, गीता प्रेस) – पृष्ठ संख्या ८२०
३. अग्नि पुराण (हिंदी अनुवाद, गीता प्रेस) – पृष्ठ संख्या ८२०
ॐ श्री गुरुवे नमः | ॐ श्री भैरवाय नमः | ॐ श्री मातृ-पितृ चरण कमलेभ्यो नमः |

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