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Aug 05

अहिंसा क्या है ?

अहिंसा परमो धर्मः”1

अंतर्ध्यान – अंहिंसा क्या है ? अहिंसा का एक साधारण अर्थ जो हमें बताया जाता है – “हिंसा न करना” ही अहिंसा है | हिंसा नहीं करनी चाहिए क्योंकि हिंसा करना पाप है जबकि अहिंसा परम धर्म है | क्या सही में अहिंसा का वही अर्थ है जो हमें बताया जा रहा है, जो हमें सिखाया जा रहा है, जो हम सुनते आ रहे हैं | ये विचार मेरे दिमाग में इसलिए आया क्योंकि अगर अहिंसा ही परम धर्मं होता तो क्या कृष्ण जी ने पूरी गीता में अर्जुन को हथियार उठाने और युद्ध के लिए प्रेरित करके अधर्म किया था ? वो गलत था या हमारे समझने में कुछ फेर है ? क्योंकि अगर अहिंसा का अर्थ हिंसा न करना होता और अहिंसा ही परम धर्म होता तो क्या महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा, शिवा जी, रानी लक्ष्मीबाई, ये सब अधर्मी थे क्या ? क्या अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए इन्होने जो युद्ध किये वो केवल अधर्म का ही अनुसरण था ?

रामायण में कहा गया है –जननी धर्म भूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी”2, तो उस मातृभूमि की रक्षा के लिए जो हिंसा की जाए, वो अधर्म कैसे हो सकती है | जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है, या तो गीता और रामायण गलत बता रहे हैं या फिर “अहिंसा परमो धर्मः” को समझने में कुछ भूल है | स्कन्द पुराण में लिखा है कि एक ब्राहमण भी यदि स्त्री रक्षा, गौ रक्षा और कुटुंब की रक्षा के लिए शस्त्र उठा ले और लड़ते लड़ते मारा जाए तो उसकी गति उन परम तपस्विओं के फल से भी कहीं अधिक होती हैं जो हजारों वर्षों से तपस्या कर रहे हैं |3

मैंने जब और ढूँढा तो मैंने मनुस्मृति का वो श्लोक पढ़ा जिसमें धर्म के दस लक्षण बताये गए हैं –

“धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो, दसकं धर्म लक्षणम “

इसमें धर्म के दस लक्षण हैं पर कहीं भी अहिंसा नहीं है, हाँ, अक्रोध अवश्य है |  पर अक्रोध और अहिंसा तो अलग अलग है |फिर अहिंसा परम धर्म कैसे हुआ ? क्या ये सारे शास्त्र, पुराण धर्म के बारे में कुछ गलत कह रहे हैं या हम अहिंसा को कुछ गलत समझ रहे हैं ? इन सारी बातों पर बहुत विचार करने पर एक निष्कर्ष निकला कि अहिंसा का अर्थ “हिंसा न करना” नहीं है अपितु अंहिंसा का जो संभव अर्थ हो सकता है – “अकारण हिंसा न करना” | किसी जीव को अकारण नुक्सान न पहुँचाना ही अहिंसा है, चाहे मानसिक हो या शारीरिक क्योंकि हिंसा मानसिक भी हो सकती है | हाँ, यदि आपके पास कारण है, यदि सामने कोई आताताई है, यदि कोई किसी स्त्री का शोषण कर रहा है, यदि कोई आपके कुटुंब पर आघात करता हो, यदि कोई आपकी मातृभूमि पर कब्ज़ा करने का प्रयास करता है तो हिंसा आवश्यक है और परम पुण्य की प्राप्ति कराने वाली है |

समय के साथ बहुत सी बातें और बहुत सा ज्ञान विलुप्त हो रहा है, ऐसा इसलिए नहीं कि कलियुग है या फलाना है या ढिकाना  है, वरन इसलिए क्योंकि हमने शब्दों के अर्थ बदल दिए हैं | हम शब्दों के अर्थों पर उतना मनन नहीं करते जितना आवश्यक है क्योंकि ये कार्य तो हमने विचारकों के लिए छोड़ दिया है | जो बाबा जी ने स्टेज पर से बता दिया वही सही है, क्यों सही है ? अरे देखो कितने लोग इनको follow करते है | ये क्या गलत कहेंगे ? इन्होने इतने शास्त्रों का अध्ययन किया है, ये क्या गलत बात बोलेंगे ? ये जो खुद की बुद्धि को प्रयोग न करने वाली जो प्रवुत्ति है, ये जो खुद को विचार न करने देने की प्रवृत्ति है, ये खतरनाक है |  इसने ही धर्म का नाश किया है | आप केवल बाबाओं के lecture मत सुनिए, उनसे प्रश्न कीजिये | गुरु-शिष्य परम्परा कभी lecture वाली नहीं रही | उसमें शिष्य अपने अज्ञान को मिटाने के लिए अपने गुरु से विभिन्न प्रश्न करता है और गुरु उन प्रश्नों का समाधान करते हैं | आप भी प्रश्न कीजिये | पूछिए अपने गुरुओं से, बाबाओं से, डरिये मत कि लोग क्या कहेंगे ? कहने दीजिये लोग जो कहते हैं, यदि आप को सही में ज्ञान चाहिए तो आपको खड़े हो कर सवाल करने पड़ेंगे | चीजो को सही में समझना होगा | धर्म क्या है इसके अंत तक जाना पड़ेगा | यदि आप धर्म को सझते हैं तो आपका जीवन ऊर्ध्वगामी होगा अन्यथा जो बाबा जी कह रहे हैं उसे follow कीजिये और किसी भी बात को मान कर के उसे अपने जीवन में उतारिये | आप समझ रहे हैं कि आप धर्म कर रहे हैं, पुण्य कार्य कर रहे हैं किन्तु वास्तव में आपके जीवन में सिवाय कष्टों के कुछ नहीं है |

इस बात को समझना होगा कि तिलक छापे लगाने वाला आवश्यक नहीं कि पंडित हो, पंडित का अर्थ तो है ग्यानी, जिसने वेद का, पुराणों का, शास्त्रों का अध्ययन किया हो और न केवल अध्ययन किया हो वरन अध्ययन के बाद चिंतन भी किया हो | हर कोई इतना अध्ययन नहीं कर सकता, इसलिए समाज में ब्राहमण की परिकल्पना की गयी जिसका कार्य केवल समाज में ज्ञान का प्रचार और प्रसार था (ब्राहमणों में कई टाइप होते थे, जिनमें सभी कार्य ज्ञान का प्रचार प्रसार नहीं होता था) | यदि आप को अपने जीवन में कोई कष्ट है, कोई समस्या है तो राह चलते किसी तिलक छापे वाले से मत पूछिए, किसी भी बाबा से मत पूछिए बल्कि अपने चारों ओर  ऐसे व्यक्ति को ढूंढिए जो सही में ग्यानी हो | ऐसे व्यक्ति को, ऐसे गुरु को ढूंढना पड़ता है, वो आसानी से नहीं मिलते | वो तम्बू डेरा लगा कर भाषण देने नहीं  आते | पहले खुद को शिष्य बनाना पड़ेगा, सौम्य बनाना पड़ेगा, ये मानना पड़ेगा कि जो मुझे जो आता है, जो मैंने सीखा है वो पूर्ण नहीं है क्योंकि जब तक आपका खुद का गिलास खाली नहीं होगा, तब तक उसमें और जल नहीं भरा जा सकता | जब आप ये मान लेंगे, गुरु आपको मिलेगा और जब तक आप ये नहीं मानेगे, यकीन मानिए वो आपके सामने आकर निकल जाएगा और आप अपने अहंकार में ही डूबे रहेंगे कि मैंने तो इतना अध्ययन किया है, मैंने तो गीता पढ़ी है, मैंने तो फलाने गुरु जी से ज्ञान प्राप्त किया है, मुझे तो सब पता है | जाने कितने पड़े हैं गीता पढने वाले, जाने कितने पड़े हैं पुराण पढने वाले जिन्हें पूरी पूरी गीता कंठस्थ है किन्तु वो रट्टू तोते से ज्यादा कुछ नहीं…. वो केवल शब्दों का अर्थ जानते हैं, बता सकते हैं कि कौन से पेज पर, कौन से श्लोक में, क्या लिखा है लेकिन ये ज्ञान नहीं है, ज्ञान तो बिना चिंतन के बिना मनन के आ ही नहीं सकता | आपको ऐसा चिंतन करना पड़ेगा | एक एक वाक्य पर, एक एक शब्द पर, आपके दिमाग में प्रश्न आयेंगे, आप उनका समाधान ढूंढिए, प्रश्न पूछिए अपने आप से, अपने गुरु से तभी आपको आगे का रास्ता साफ़ दिखाई देगा |

आइये एक बार फिर से पढ़ते हैं –

अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो तपः।
अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते।
अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो दमः।
अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तपः॥
अहिंसा परम यज्ञः अहिंसा परमो फलम्‌।
अहिंसा परमं मित्रः अहिंसा परमं सुखम्‌॥

महाभारत/अनुशासन पर्व (११५-२३/११६-२८-२९)

याद रखने वाली बात है अहिंसा का अर्थ है अकारण हिंसा न करना | जीव हत्या पाप है यदि अकारण हो किन्तु यदि वही जीव आप पर आक्रमण कर दे तो उसका वध करना ही उचित है | यदि कोई आपको या आपकी स्त्री को, कुटुंब को, गाय को और अन्यान्य प्राणियों को कष्ट पहुंचता है तो आपको भी हिंसा करनी पड़ेगी और उस समय वह धर्म होगा | बस आपकी ओर से हिंसा शुरू नहीं होनी चाहिए वो भी अकारण | तब ये अहिंसा ही धर्म बन जाती है |

ॐ श्री गुरुवे नमः | ॐ श्री भैरवाय नमः | ॐ श्री पितृ चरण कमलेभ्यो नमः |

references –

1. महाभारत/अनुशासन पर्व (११५-२३)

२. वाल्मिक रामायण

३. पृष्ठ संख्या ३८, संक्षिप्त स्कन्द पुराण, गीता प्रेस

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