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May 12

ब्रह्माण्ड और पृथ्वी की परिकल्पना

स्कन्द जी ने अर्जुन को ब्रह्माण्ड के बारे में ऐसा कहा है

कुंतीनंदन ! सृष्टि से पहले यहाँ सब कुछ अव्यक्त एवं प्रकाश शून्य था । उस अव्याकृत अवस्था में प्रकृति और पुरुष – ये दो अजन्मा (जन्मरहित) एक दूसरे से मिल कर एक हुए, यह हम सुना करते हैं । तत्पश्चात अपने स्वरूपभूत स्वभाव  और काल की प्रेरणा ओने पर पुरुष के ईक्षण (सृष्टिविषयक संकल्प) से क्षोभ को प्राप्त हुई प्रकृति से महत्त्व की उत्पत्ति हुई । फिर महत्त्व में विकार आने पर अहंकार उत्पन्न हुआ । मुनियों ने उस अहंकार  को सात्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का बताया है । तामस अहंकार से पांच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुई तथा उन तन्मात्राओं से पांच महाभूतों की उत्पत्ति हुई और रूप रसादि  पांच विषय पांच महाभूतों के कार्य हैं । तेजस अर्थात राजस अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुई । पूर्वोक्त दस इन्द्रियों के देवता तथा ग्यारहवी मन सात्विक अहंकार से उत्पन्न हुए हैं, ऐसा विद्वान पुरुषों का मत है  । ये ही चौबीस तत्व पूर्व काल में उत्पन्न हुए, फिर परम पुरुष भगवान सदाशिव की दृष्टी पड़ने पर ये सभी तत्व बुलबुले के आकार में परिणत हो गए, उस बुलबुले से सुन्दर अंड उत्पन्न हुआ, जिसका परिमाण सौ कोटि योजन का है । इसी को ब्रह्माण्ड कहते हैं ।

ब्रह्माण्ड की आत्मा ब्रह्मा जी बताये गए हैं, उन्होंने इसके तीन विभाग किये – उर्ध्वभाग, मध्यभाग और अधोभाग ।उर्ध्वभाग स्वर्ग है, उसमें देवता निवास करते हैं । मध्यभाग भूलोक है, इसमें मनुष्य रहते हैं । अधोभाग को पाताल कहते हैं, इसमें नाग और दैत्य निवास करते हैं । इनमें से एक एक विभाग के पुनः सात सात भाग ब्रह्मा जी ने किये हैं । जो सात पातल , सात द्वीप और सात स्वर्ग के रूप में प्रसिद्ध हैं ।

पहले मैं सात द्वीपों का वर्णन करूँगा । उनकी कल्पना सुनो – पृथ्वी के मध्य में जम्बूद्वीप है; इसका विस्तार एक लाख योजन का बतलाया गया है । जम्बूद्वीप की आकृति सूर्यमंडल के सामान है । वह उतने ही बड़े खारे पानी के समुन्द्र से घिरा है । जम्बूद्वीप और क्षार समुन्द्र के बाद शाकद्वीप है , जिसका विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है । वह अपने ही बराबर प्रमाण वाले क्षीर समुन्द्र से, उसके बाद उस से दुगुना बड़ा पुष्कर द्वीप है, जो दैत्यों को मदोन्मत्त कर देने वाले उतने ही बड़े सुरा समुन्द्र से घिरा हुआ है । उस से परे कुश द्वीप की स्तिथि मानी गयी है, जो अपने से पहले द्वीप की अपेक्षा दुगुने विस्तार वाला है । कुशद्वीप को उतने ही बड़े विस्तार वाले दही के समुन्द्र ने घेर रखा है । उसके बाद क्रोञ्च नामक द्वीप है; जिसका विस्तार कुशद्वीप से दूना है,  यह अपने ही सामान विस्तार वाले घी के समुन्द्र से घिरा है । इसके बाद देने विस्तार वाला शाल्मलि द्वीप है; जो इतने ही बड़े ईख के रस के समुन्द्र से घिरा हुआ है । उसके बाद उस से दुगुने विस्तार वाले गोमेद (प्लक्ष) नामक द्वीप है; जिसे उतने ही बड़े रमणीय स्वादिष्ट जल के समुन्द्र ने घेर रखा है । अर्जुन ! इस प्रकार सात द्वीपों और सात समुन्द्रों सहित पृथ्वी का विस्तार दो करोड़ पचास लाख तिरपन हजार योजन है । शुक्ल और कृष्ण पक्ष में समुन्द्र के जल की पांच सौ दस अंगुल की वृद्धि और क्षय देखे गए हैं । उसके बाद दस करोड़ योजन तक सुवर्णमयी भूमि है; यह देवताओं की क्रीडा स्थली है । उसके बाद कंकड़ के सामान गोल आकार वाला लोकालोक पर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है । उस पर्वत के वाहय भाग में भयंकर अन्धकार है, जिसकी और देखना भी कठिन है । वहां कोई और जीव जंतु नहीं रहते । वह अन्धकार पूर्ण प्रदेश पैंतीस करोड़, उन्नीस लाख, चालीस हजार योजन तक फैला हुआ है । उसके बाद गर्भोदक सागर है, जिसका विस्तार सात समुन्द्रों के बराबर है । उसके बाद एक करोड़ योजन विस्तृत कडाह है, जो ब्रह्मा जी के अंडकटाह से ढका  हुआ है  ब्रह्माण्ड के मध्य में मेरु पर्वत है, उसकी दसों दिशाओं में पचास पचास योजन तक ब्रह्माण्ड का विस्तार जानना चाहिए । जम्बूद्वीप के मध्यभाग में मेरु पर्वत है, यह ऊपर से नीचे तक एक लाख योजन उंचा है । सोलह हजार योजन तो यह पृथ्वी के नीचे तक गया हुआ है और चौरासी हजार योजन पृथ्वी से ऊपर उसकी उचाई है । मेरु के शिखर का विस्तार बत्तीस हजार योजन है । उसकी आकृति प्याले के सामान है । वह पर्वत तीन शिखरों से युक्त है, उसके मध्य शिखर पर ब्रह्मा जी का निवास है, ईशान कोण में जो शिखर है, उस पर शंकर जी का स्थान है तथा नैरित्य कोण के शिखर पर भगवान् विष्णु की स्तिथि है ।

मेरु पर्वत के चारों ओर चार विष्कम्भ पर्वत माने गए हैं । पूर्व में मंदराचल, दक्षिण में गंधमादन, पश्चिम में सुपार्श्व तथा उत्तर में कुमुद नामक पर्वत है । इनके चार वन हैं जो पर्वतों के शिखर पर ही स्तिथ हैं । पूर्व में नंदन वन, दक्षिण में चैत्र रथ वन, पश्चिम में वैभ्राज वन और उत्तर में सर्वतोभद्र वन है । इन्हीं चरों में चार सरोवर भी हैं । पूर्व में अरुणोद सरोवर, दक्षिण  में मान सरोवर, पश्चिम में शीतोद सरोवर तथा उत्तर में महाह्रद सरोवर है । ये विष्कम्भ पर्वत पच्चीस पच्चीस हजार योजन ऊचें हैं । इनकी चोडाई भी हजार हजार योजन मानी  गयी है । मेरुगिरी के दक्षिण में निषध, हेमकूट और हिमवान – ये तीन मर्यादा पर्वत हैं । इनकी लम्बाई एक लाख योजन और चौड़ाई दो हजार योजन मानी गयी है । मेरु के उत्तर में भी तीन मर्यादा पर्वत हैं – नील, श्वेत और श्रंग्वान । मेरु से पूर्व माल्यवान पर्वत है और मेरु के पश्चिम में गंधमादन पर्वत है । ये सभी पर्वत जम्बूद्वीप पर चारों ओर फैले हुए हैं  । गंधमादन पर्वत पर जो जम्बू का वृक्ष है, उसके फल बड़े बड़े हाथियों के समान होते हैं । उस जम्बू के ही नाम पर इस द्वीप को जम्बू द्वीप कहते हैं ।

पूर्व काल में स्वायम्भुव नाम से प्रसिद्ध एक मनु हुए हैं; वे ही आदि मनु और प्रजापति कहे गए हैं । उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद । राजा  उत्तानपाद के पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुव जी हुए, जिन्होंने भक्ति भाव से भगवान् विष्णु की आराधना करके अविनाशी पद को प्राप्त किया । राजर्षि प्रियव्रत के दस पुत्र हुए, जिनमें से तीन तो संन्यास ग्रहण करके घर से निकल गए और परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो गए । शेष सात द्वीपों में उन्होंने अपने सात पुत्रों को प्रतिष्ठित किया । राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीघ्र जम्बू द्वीप के अधिपति हुए । उनके नौ पुत्र जम्बू द्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं, जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार ईलावृत वर्ष, भद्राश्व वर्ष, केतुमाल वर्ष, कुरु वर्ष, हिरण्यमय वर्ष, रम्यक  वर्ष, हरी वर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भू भाग को  नाभि खंड कहते हैं । नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुष  की आकृति वाले  बताये गए हैं । नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ  से ‘भरत’ का जन्म हुआ; जिनके आधार पर इस देश को भारतवर्ष भी कहते हैं । अर्जुन ! यहाँ धर्म अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थों का उपार्जन होता है । भारतवर्ष के सिवा अन्य सब द्वीपों और वर्षों में केवल भोग भूमि है ।

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