Category Archive: तीर्थ

Jul 06

भीम और बर्बरीक का युद्ध

मलं मूत्रं पुरीषं च श्लेष्मनिष्ठिवितं तथा, गण्डूषमप्सु मुञ्चन्ति ये ते ब्रह्मभिः समाः | अर्थ – जो जल में मल, मूत्र, विष्ठा, कफ, थूक और कुल्ला छोड़ते हैं, वे ब्रह्महत्यारों के सामान है | ये श्लोक उस समय का है, जब पांडव जुए में हार कर, जंगलो में घुमते हुए माँ चंडिका के दर्शन करके उस …

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Jun 17

तीर्थ क्या, क्यों और कैसे ?

महतां दर्शनं ब्रह्मज्जायते न हि निष्फलं | द्वेषादज्ञानतो वापि प्रसन्गाद्वा प्रमादतः || अयसः स्पर्शसंस्पर्शो रुक्मत्वायैव जायते | — ब्रह्म पुराण अर्थ – महापुरुषों का दर्शन निष्फल नहीं होता, भले ही वह द्वेष अथवा अज्ञान से ही क्यों न हुआ हो | लोहे का पारसमणि से प्रसंग या प्रामद से भी स्पर्श हो जाय तो भी …

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Dec 02

धर्माचारण में मृत्यु

यज्जीवितं चाचिराम्शुसमानम क्षण्भंगुरम, तच्चेधर्मक्रते याति यातु दोषोअस्ती को ननु । जीवितं च धनं दारा पुत्राः क्षेत्रं ग्रहाणी च, याति येषाम धर्मक्रेते त एव भुवि मानवाः ।। सन्दर्भ – एक बार अर्जुन बारह वर्षो के लिए तीर्थयात्रा के लिए निकले । वह मणिपुर होते हुए वहां के पांच तीर्थो में स्नान करने के लिए आये । …

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Nov 11

तीर्थ क्या हैं ?

जायन्ते च भ्रियन्ते च जलेप्वेव जलौकसः। न च गच्छअन्ति ते स्वर्गमविशुदहमनोमलाः ।। चित्तमंतर्गतम दुष्टं तीर्थस्नानंच शुध्यति । शतशोअपि जलैधौतम सुराभाण्डमिवाशुची ।। सार : अगत्स्य ने लोपामुद्रा से कहा – निष्पापे ! मैं मनासतीर्थो का वर्णन करता हूँ, सुनो । इन तीर्थों मैं स्नान करके  मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है । सत्य, क्षमा, इन्द्रिसंयम, …

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Nov 10

काशी – निषेध क्षेत्र ?

पापमेव ही कर्तव्यं मतिरस्ती याठेद्रशी सुखेनान्यात्रा कर्तव्यं मही ह्वास्ति महीयसी । अपि कामातुरो जन्तुरेकाम रक्षति मातरम, अपि पाप्क्रता काशी रक्ष्या मोक्षर्थिनैकिका ।। परापवादाशीलेन परदाराभिलाशिणा, तेन काशी न संसेव्यं क्व काशी निरयः क्व सः । अभिल्ष्यन्ति ये नित्यं धनं चात्र प्रतिग्रहे, परस्त्रम कपटैवार्पि काशी सैव्या न तैर्नरै । पर्पीडाकारम कर्म काश्याम नित्यं विवर्जयेत, तदेव चेत किमत्र …

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