Category Archive: ज्ञान और अज्ञान

Oct 09

जीवन में क्या चाहिए ?

इस संसार में केवल तीन ही चीज याद रखने लायक हैं – 1. मृत्यु २. ईश्वर ३. कर्तव्य 1. मृत्यु – क्यों ? मृत्यु को ही सबसे पहले क्यों ? ईश्वर को क्यों नहीं ? क्योंकि मृत्यु को जब आप याद करते हैं तो आपको पता चलता है कि सब को एक दिन मर जाना …

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May 26

“मैं पानी में हूँ, पर गीला नहीं हूँ |”

यस्याज्ञया जगतस्रष्टा विरंचिः पालको हरिः | संहर्ता कालरुद्राख्यो नमस्तस्यै पिनाकिने || —- स्कन्द पुराण अर्थ – जिनकी आज्ञा से ब्रह्मा जी इस जगत की सृष्टि तथा विष्णु भगवान् पालन करते हैं और जो स्वयं ही कालरूद्र नाम धारण करके इस विश्व का संहार करते हैं, उन पिनाकधारी भगवान् शंकर को नमस्कार है | अंतर्ध्यान – …

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May 15

अहम् ब्रह्मास्मि

क्रोधस्तु प्रथमं शत्रुर्निष्फलो देह्नाशनः, ज्ञानखड्गेन तं छित्वा परमं सुखमाप्नुयात | तृष्णा बहुविधा माया बन्धनी पापकारिणी, छित्वेतां ज्ञानखड्गेन सुखं तिष्ठति मानवः ||                                                — ब्रह्म पुराण अर्थ – मनुष्य का पहला शत्रु है क्रोध | उसका फल तो कुछ भी नहीं है, उलटे वह शरीर का नाश करता है, अतः ज्ञान रुपी खड्ग से उसका नाश …

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Mar 07

नारद जी के समस्त प्रश्नों का समाधान

8. चौदह मनुओं के मूल दिवस का किसको ज्ञान है ? ये युगादि तिथियाँ बताई गयी हैं, अब मन्वन्तर की प्रारंभिक तिथियों का श्रवण कीजिये । अश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक की द्वादशी, चैत्र और भाद्र की तृतीया, फाल्गुन की अमावस्या, पौष की एकादशी, आषाढ़ की पूर्णिमा, कार्तिक की पूर्णिमा, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ की पूर्णिमा …

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Feb 18

ब्राह्मण के प्रकार – नारद जी के छठे एवं सातवें प्रश्न का उत्तर

किस श्रेष्ठ ब्राह्मण को आठ प्रकार के ब्राह्मणत्त्व का ज्ञान है ? विप्रवर !  अब आप ब्राह्मण के आठ भेदों का वर्णन सुने – मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि – ये आठ प्रकार के ब्राह्मण श्रुति में पहले बताये गए हैं । इनमें विद्या और सदाचार की विशेषता से पूर्व पूर्व …

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Jan 01

दान की परिभाषा और प्रकार

द्विहेतु षड्धिष्ठानाम षडंगम च द्विपाक्युक् । चतुष्प्रकारं त्रिविधिम त्रिनाशम दान्मुच्याते ।। सन्दर्भ – राजा धर्म वर्मा दान का तत्व जानने की इच्छा से बहुत वर्षों तक तपस्या की, तब आकाशवाणी ने उनसे उपरोक्त श्लोक कहा । जिसका अर्थ है “दान के दो हेतु, छः अधिष्ठान, छः अंग, दो प्रकार के परिणाम (फल), चार प्रकार, तीन …

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Dec 16

संसार सृष्टि

मस्तकस्थापिनम मृत्युम यदि पश्येदयम जनः । आहारोअपि न रोचते किमुताकार्यकारिता ।। अहो मानुष्यकं जन्म सर्वरत्नसुदुर्लभम । तृणवत क्रियते कैश्चिद योषिन्मूढ़ेर्नराधमै ।। सन्दर्भ – जब अर्जुन पांच तीर्थों में स्नान  करने के लिए गए और जब उन्होंने पांच ग्राहों को श्राप मुक्त कराया और उन पांचो सुंदर स्त्रियों से ग्राह्स्वरूप में श्रापग्रस्त होने का कारण पुछा तब …

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Nov 27

मनुष्य जन्म का सार

धर्मे रागः श्रुतो चिंता दाने व्यसनमुत्तमम । इन्द्रियार्धेषु वैराग्यं संप्राप्तं जन्मनः फलम ।। सन्दर्भ – कात्यायन ने धर्म को समझने के लिए कठोर तप किया, जिस से आकाशवाणी हुई और उसने कहा की हे कात्यायन तुम पवित्र सरस्वती नदी के तट पर जा कर सारस्वत मुनि से मिलो । वे धर्म के तत्व् को जान …

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