Category Archive: Jyotish

Jan 02

नक्षत्रों का फल

नक्षत्रानुसार प्रभाव – जातक पर नक्षत्र का बहुत प्रभाव पड़ता है | अतः नक्षत्रानुसार जातक पर पड़ने वाला प्रभाव आगे दिया गया है | अश्विनी – विचारशील, अध्ययन, अध्यापन करने वाला, ज्योतिष, वैद्यक आदि शास्त्रों में रूचि रखने वाला, लेखक, ईमानदार, चंचल प्रकृति, मस्से का रोगी और गृह – कलह प्रिय | भरणी – बलवान, …

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Sep 21

अध्याय 5 – ज्योतिष शास्त्र

Navmansh chart

अध्याय – ५ हमने अध्याय 1 के अंत में संक्षेप में लिखा था कि प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में बांटा गया है | एक नक्षत्र13020| का होता है अतः नक्षत्र के एक चरण की दूरी 13020|/4 = 3020| होती है | सवा दो नक्षत्र अर्थात ९ चरण (300 ) की एक राशि होती है | चंद्रमा …

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Jul 16

कथाओ में ज्योतिष !

श्रीमते विदुषे यूने कुलीनाय यशस्विने, उदाराय सनाथाय कन्या देय वराय वै | – १ एकतः पृथिवी कृत्स्ना सशैलवनकानन, स्वलन्कृतोपाधिहीना सुकन्या चैकतः स्मृता | विक्रीणीते यश्च कन्यामश्वम् वा गां तिलान्यपि || (विस्तार १६५ | ८ – १६ ) ब्रह्म पुराण अर्थ – ये सन्दर्भ तब का है जब सूर्य अपनी पुत्री विष्टि का विवाह नहीं कर …

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Jun 29

अध्याय 4 – ज्योतिष शास्त्र

Annu kundali

जन्म कुंडली बनाने के साधन – जन्म कुंडली निम्नलिखित ३ साधनों से बनाई जा सकती है | 1. विभिन्न प्रकाशकों की Table of Ascendant के द्वारा जन्म के समय पृथ्वी की राशि (डिग्री) की गणना की जाती है | लग्न तालिका में इसे प्रथम भाव में लिखा जाता है तथा Table of Ephemeris के द्वारा …

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Mar 12

अध्याय ३ – ज्योतिष शास्त्र

bhaav talika

अध्याय ३ अब हम थोडा और आगे बढ़ेंगे | जैसे जैसे हम आगे बढ़ते हैं, वैसे वैसे हमारा वास्ता पंचांग और कैलेंडर से पड़ता जायेगा | अतः हमें पंचांग के भी कुछ अंगों से प्रत्यक्ष होना पड़ेगा | पंचांग में तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण, ये पांच अंग होते हैं इसीलिए इसे पंचांग कहा …

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Nov 04

अध्याय 2

Chitra 1

अध्याय २ योजनानि शतान्यष्टो भूकर्णों द्विगुणानि तु | तद्वर्गतो दशगुणात्पदे भूपरिधिर्भवते || अर्थात पृथ्वी का व्यास ८०० के दूने १६०० योजन है, इसके वर्ग का १० गुना करके गुणनफल का वर्गमूल निकालने से जो आता है, वह पृथ्वी की  परिधि है | इस श्लोक को विस्तार से आगे चर्चा करेंगे किन्तु इस श्लोक से स्पष्ट हो …

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Sep 22

अध्याय १

लोकानामन्तकृत्कालः कालोन्यः कल्नात्मकः | स द्विधा स्थूल सुक्ष्मत्वान्मूर्त श्चामूर्त उच्यते || अर्थात – एक प्रकार का काल संसार का नाश करता है और दूसरे प्रकार का कलानात्मक है अर्थात जाना जा सकता है | यह भी दो प्रकार का होता है (१) स्थूल और (२) सूक्ष्म | स्थूल नापा जा सकता है इसलिए मूर्त कहलाता …

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Aug 14

काल का मान

अब मैं तुमसे काल का मान बताऊंगा, उसे सुनो – विद्वान लोग पंद्रह निमेष की एक ‘काष्ठा’ बताते हैं । तीस काष्ठा की एक ‘कला’ गिननी चाहिए । तीस कला का एक ‘मुहूर्त’ होता है । तीस मुहूर्त के एक ‘दिन-रात’ होते हैं । एक दिन में तीन तीन मुहूर्त वाले पांच काल होते है, …

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