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Apr 24

ब्राहमण की खोज के लिए नारद जी के बारह प्रश्न

मातृकाम को विजानाति कतिधा किद्रशक्षराम । पञ्चपंचाद्भुतम गेहं को विजानाति वा द्विजः ।। बहुरूपाम स्त्रियं कर्तुमेकरुपाम च वेत्ति कः । को वा चित्रकथं बन्धं वेत्ति संसारगोचरः ।। को वार्णव महाग्राहम वेत्ति विद्यापरायणः   । को वाष्टविधं ब्रह्मंयम वेत्ति ब्राह्मणसत्तमः ।। युगानाम च चतुर्णां वा को मूल दिवसान वदेत । चतुर्दशमनूनाम वा मूलवारम च वेत्ति कः ।। कस्मिश्चैव दिने …

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Apr 24

दान की परिभाषा और प्रकार

द्विहेतु षड्धिष्ठानाम षडंगम च द्विपाक्युक् । चतुष्प्रकारं त्रिविधिम त्रिनाशम दान्मुच्याते ।। सन्दर्भ – राजा धर्म वर्मा दान का तत्व जानने की इच्छा से बहुत वर्षों तक तपस्या की, तब आकाशवाणी ने उनसे उपरोक्त श्लोक कहा । जिसका अर्थ है “दान के दो हेतु, छः अधिष्ठान, छः अंग, दो प्रकार के परिणाम (फल), चार प्रकार, तीन …

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Apr 24

माता-पिता का महत्व

पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि  परमं तपः । पितरि प्रितिमापन्ने सर्वाः प्रोणन्ति देवताः ।। यह सन्दर्भ चिरकारी की कथा से लिया गया है जिसमें चिरकारी माता और पिता के महत्त्व को लेकर असमंजस में हैं । उनके पिता ने उन्हें अपनी माता का वध करने का आदेश दिया । क्योंकि वो चिरकारी थे अतः …

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Apr 24

भगवान् शिव की पूजा और फल

 यह सन्दर्भ तब का है जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया किन्तु यह सोच कर दुखी होने लगे कि मैंने शिव भक्त का वध किया अतः इस शोक से निकलने के लिए मुझे प्रायश्चित करना चाहिए । भगवान् विष्णु ने तब कार्तिकेय को नाना प्रकार से समझाया किन्तु वे नहीं माने तब भगवान् विष्णु …

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Apr 24

ब्रह्माण्ड और पृथ्वी की परिकल्पना

स्कन्द जी ने अर्जुन को ब्रह्माण्ड के बारे में ऐसा कहा है कुंतीनंदन ! सृष्टि से पहले यहाँ सब कुछ अव्यक्त एवं प्रकाश शून्य था । उस अव्याकृत अवस्था में प्रकृति और पुरुष – ये दो अजन्मा (जन्मरहित) एक दूसरे से मिल कर एक हुए, यह हम सुना करते हैं । तत्पश्चात अपने स्वरूपभूत स्वभाव  …

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Apr 24

नवग्रहों की स्तिथि एवं विभिन्न पातालों का वर्णन

नारद जी ने कहा – कुरुश्रेष्ठ ! भूमि से लाख योजन ऊपर सूर्य मंडल है । भगवान् सूर्य के रथ का विस्तार नौ सहस्त्र योजन है । इसकी धुरी डेढ़ करोड़ साढ़े सात लाख योजन की है । वेद  के जो सात छंद हैं वे ही सूर्य के रथ के सात अश्व हैं । उनके नाम सुनो – …

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Apr 24

विभिन्न नरकों का वर्णन

पाताल के नीचे बहुत अधिक जल है और उसके नीचे नरकों की स्तिथि बताई गयी है । जिनमें पापी जीव गिराए जाते हैं । महामते ! उनका वर्णन सुनो – यों तो नरकों की संख्या पचपन करोड़ है; किन्तु उनमें रौरव से लेकर श्वभोजन तक इक्कीस प्रधान हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं – …

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Apr 24

काल का मान

अब मैं तुमसे काल का मान बताऊंगा, उसे सुनो – विद्वान लोग पंद्रह निमेष की एक ‘काष्ठा’ बताते हैं । तीस काष्ठा की एक ‘कला’ गिननी चाहिए । तीस कला का एक ‘मुहूर्त’ होता है । तीस मुहूर्त के एक ‘दिन-रात’ होते हैं । एक दिन में तीन तीन मुहूर्त वाले पांच काल होते है, …

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Apr 24

कालभीति का शिवजी से वाद विवाद

न जायते कुलम यस्य बीजशुद्धि बिना ततः | तस्य खादन पिबतृ वापि साधुः सांदति तत्क्षणात् || कालभीति एक बिल्व वृक्ष के नीचे एक पैर के अंगूठे के अग्र भाग पर खड़े हो मंत्रों का जाप करने लगे | जाप  का नियम ग्रहण करने के पश्चात वे सौ वर्षों तक जल कि एक एक बूँद पीकर …

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Apr 24

श्राद्ध से पितरों की पूर्ती कैसे होती है ?

नारद जी कहते हैं – अर्जुन ! इसके बाद राजा करन्धम ने महाकाल से पूछा – भगवन ! मेरे मन में सदा ये संशय रहता है की मनुष्यों द्वारा पितरों का जो तर्पण किया जाता है, उसमें जल तो जल में ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उस से तृप्त कैसे होते हैं ? …

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