यह सन्दर्भ तब का है जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया किन्तु यह सोच कर दुखी होने लगे कि मैंने शिव भक्त का वध किया अतः इस शोक से निकलने के लिए मुझे प्रायश्चित करना चाहिए । भगवान् विष्णु ने तब कार्तिकेय को नाना प्रकार से समझाया किन्तु वे नहीं माने तब भगवान् विष्णु ने उन्हें शिव जी की पूजा कर के उन्हें प्रसन्न करने का सुझाव दिया । इस पर कार्तिकेय जी ने शिव जी की पूजा प्रारंभ की । पूजा के समय साक्षात् भगवान् शिव उस शिवलिंग में स्थित हो स्वयं पूजन सामग्री ग्रहण करते थे । भक्ति भाव में डूबे हुए स्कन्द ने पूजन करते समय भगवान् शंकर से पुछा – “भगवन ! आपको कौन सा उपहार भेंट करने से क्या क्या फल प्राप्त होता है ?”

भगवान् महेश्वर बोले – जो मेरे लिंग की स्थापना करता और उसके लिए सुन्दर मंदिर बनवाता है, वह कल्पभर मेरे लोक में निवास करता है । जो मेरे मंदिर में झाड़ू देता है और धूल आदि हटाकर शुद्ध करता है, वह सब रोगों से छूट जाता है । देव मंदिर को चूने आदि से पुतवाने पर मनुष्य का शरीर दृड़ होता है । पुष्प, दूध आदि, कुशा, तिल, जल, अक्षत और सरसों से भगवान् शंकर के मस्तक पर अर्ध्य देकर मनुष्य दस हजार वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है । दही और दूध से शिवलिंग को स्नान कराने पर मनुष्य का शरीर निरोग हो  जाता है । जल, दही, दूध और घी से स्नान कराने पर क्रमशः दस गुना फल प्राप्त होता है । उपर्युक्त वस्तुओं से मुझे स्नान कराकर भक्ति पूर्वक गोधूम चूर्ण आदि के द्वारा उबटन लगाये फिर कपिल गाय के पंचगव्य से और गंगा के जल से मुझे स्नान कराये और विधिपूर्वक मेरा पूजन करे । ऐसा करने वाला पुरुष मेरे परम धाम को प्राप्त होता है ।

कुशा मिश्रित जल की अपेक्षा गंध मिश्रित जल उत्तम है, उस से भी तीर्थ का जल श्रेष्ठ है । तांबे, चांदी और सोने के कलशों से स्नान कराने पर क्रमशः सौ गुना फल प्राप्त होता है । इसी प्रकार चन्दन, अगर, केशर तथा कपूर अर्पण करने से उत्तरोत्तर अधिक फल की प्राप्ति होती है । इन सब वस्तुओं को मेरे अंग से लगाने से मनुष्य धनवान, सौभाग्यवान तथा सुखी होता है । गुग्गुल का धूप उत्तम माना गया है, उस से भी श्रेष्ठ अगुरू है, इन सब धूपों को मुझे अर्पण करने से सुख और स्वर्ग की प्राप्ति होती है । दीप दान करने वाला पुरुष कीर्ति तथा उत्तम नेत्र प्राप्त करता है । नैवेध्य अर्पण करने से मनुष्य मिष्ठान्न भोजी होता है । अखंड बिल्व पत्रों और नाना प्रकार के पुष्पों से शिवलिंग की पूजा करने पर मनुष्य एक लाख वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है । भगवान् शिव को चंवर भेंट करने से मनुष्य राजा होता है । मेरे मंदिर में गीत, वाद्य और नृत्य करके  शुद्ध चित्त हुआ मनुष्य मुझको प्राप्त होता है । मेरी पूजा के लिए शंख और घंटा दान करके मनुष्य अवश्य ही विद्वान होता है । मेरी रथयात्रा करके मनुष्य चिरकाल के लिए शोकों से मुक्त हो जाता है । मुझे नमस्कार और प्रणाम करके मानव महान कुल  में जन्म लेता है ।

जो मेरे आगे शास्त्र का पाठ कराता है वह ज्ञानी होता है । भक्ति पूर्वक मेरी स्तुति करने पर मनुष्य मन के  मोह से मुक्ति पा जाता है । मेरे आगे आरती घुमाने से उपासक पीड़ा रहित होता है । मुझे शीतल चन्दन अर्पण करने पर दुखजनित संतापों से छुटकारा मिल जाता है । शिवलिंग के पास अपनी शक्ति के अनुसार दान दे जबकि बुआजी  दाता को उसका सौ गुना फल मिलता है । मैं शिवलिंग को प्रणाम करने पर पंद्रह, उसे स्नान कराने पर बीस तथा उसकी विधिवत पूजा करने पर सौ अपराधों को क्षमा कर देता हूँ  ।

तब कार्तिकेय ने इस प्रकार स्तुति की ।

नमः शिवायास्तु निरामयाय, नमः शिवायास्तु मनोमयाय । नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्त कृपापराय ।।
नमो भवायस्तु भवोद्भवाय नमोस्तु ते ध्वस्त मनोभावय ।  नमोस्तु ते गूढ़महाव्रताय नमोस्तु मायागहनाश्रयाय ।।
नमोस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमोस्तु सिद्धाय पुरातनाय । नमोस्तु कालाय नमः कलाय नमोस्तु ते कालकलातिगाय ।।
नमो निसर्गात्मकभूतिकाय नामोस्त्वमेयोक्षमहर्धिकाय । नमः शरण्याय नमोगुणाय नमोस्तु ते भीमगुणानुगाय ।।
नमोस्तु नाना भुवनाधिकात्रे नमोस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे । नमोस्तु कर्मप्रसवाय धात्रे नमः सदा ते भगवन्सुकत्रे ।।
अनंतरूपाय सदैव तुभ्यमसह्योकोपाय सदैव तुभ्यं । अमेयमानाय नमोस्तु तुभ्यं वृषेन्द्रयानाय नमोस्तु तुभ्यम ।।
नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोस्तु ते व्याधिगणापहाय । चराचरायाथ विचारदाय कुमारनाथाय नमः शिवाय ।।
ममेश भूतेश महेश्वरोसि कामेश वागीश बलेश धीश । क्रोधेश मोहेश परापरेश नमोस्तु मोक्षेश गुहशयेश ।।

इस प्रकार भक्ति भाव से भरे हुए अपने योग्य स्तवन सुन कर शिव जी बहुत संतुष्ट हुए और पुत्र कार्तिकेय का उन्होंने  चिर काल तक अभिनन्दन करके कहा – पुत्र ! मेरे भक्त के  वध करने का  जो दुःख तुम्हारे मन में हुआ है, उसका विचार तुमको नहीं करना चाहिए । अपने इस कर्म से तुम मुनियों के लिए भी स्पृह्नीय बन गए हो । जो लोग सांय काल और सवेरे पूर्ण भक्तिपूर्वक तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उनको जो फल प्राप्त होगा, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो – उन्हें कोई रोग नहीं होगा, दरिद्रता भी नहीं होगी तथा प्रियजनों से कभी वियोग भी न होगा । वे इस संसार में दुर्लभ भोगो का उपभोग करके मेरे परम धाम को प्राप्त होंगे । इतना ही नहीं, मैं उन्हें और भी परम दुर्लभ वर प्रदान करूँगा ।

जब कभी अनावृष्टि हो, तब नाना प्रकार के उत्तम कलशों द्वारा विधिपूर्वक गंधयुक्त जल से मुझे एक, तीन, पांच अथवा सात रात तक स्नान करावे और मेरे सर्वांग में कुमकुम का लेप करे,  फिर दो वस्त्र धारण करा कर लाल कनेर के पुष्पों से तथा जवा के पुष्पों से और फूलों की मालाओं से मेरा पूजन करे । पूजन के पश्चात उत्तम व्रत का पालन करने वाले तपस्वी ब्राह्मणों को भोजन कराये । मेरी प्रसन्नता के लिए एक लाख आहुति हवन करे, ग्रहादि की शांति के लिए भी हवन करे । तदनन्तर भूमिदान करके गौ के लिए दैनिक ग्रास दे । तत्पश्चात मंगलमय शान्तिपाठ और रूद्र का जप कराये । इसी विधान से उत्तम ब्राह्मणों द्वारा अनुष्ठान कराने पर जल शून्य बादल भी उसी समय अवश्य वर्षा करते हैं । भांति भांति के धान्यों तथा हरी हरी घासों से वसुधा परिपूर्ण हो जाती है । मनुष्यों और पशुओं में कोई रोग नहीं होता । इस अनुष्ठान के प्रभाव से राजा  धर्म परायण हो जाते हैं ।

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