8. चौदह मनुओं के मूल दिवस का किसको ज्ञान है ?

ये युगादि तिथियाँ बताई गयी हैं, अब मन्वन्तर की प्रारंभिक तिथियों का श्रवण कीजिये । अश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक की द्वादशी, चैत्र और भाद्र की तृतीया, फाल्गुन की अमावस्या, पौष की एकादशी, आषाढ़ की पूर्णिमा, कार्तिक की पूर्णिमा, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ की पूर्णिमा – ये मन्वन्तर की आदि तिथियाँ हैं, जो दान के पुण्य को अक्षय करने वाली हैं ।

9. भगवान् सूर्य किस दिन पहले पहल रथ पर सवार हुए ?

भगवान् सूर्य जिस तिथि को पहले पहल रथ पर आरूढ़ हुए, वह ब्राह्मणों द्वारा माघ मॉस की सप्तमी वताई गयी है, जिसे रथ सप्तमी भी कहते हैं । उस तिथि को दिया हुआ दान और किया हुआ यज्ञ सब अक्षय माना गया है । वह सब प्रकार की दरिद्रता को दूर करने वाला और भगवान् सूर्य की प्रसन्नता का साधक बताया गया है ।

10. जो काले सर्प की भाति सब प्राणियों को उद्वेग में डाले रहता है, उसे कौन जानता है ?

विद्वान पुरुष जिसे सदा उद्वेग में डालने वाला बताते हैं, उसका यथार्थ परिचय सुनिए – जो प्रतिदिन याचना करता है, वह स्वर्ग में जाने का अधिकारी नहीं है । जैसे चोर सब जीवों को उद्वेग में डाल  देता है, उसी प्रकार वह भी है । वह पापत्मा सबके लिए सदा  उद्वेग कारक होने के कारण नरक में पड़ता है ।

11. इस भयंकर संसार में कौन दक्ष मनुष्यों से भी अत्यधिक दक्ष माना गया है ?

ब्राह्मण ! “इस लोक में किस कर्म से मुझे सिद्धि प्राप्त हो सकती है और (मृत्यु के पश्चात) यहाँ से मुझे कहाँ और किस लोक में जाना है !” इस बात का भली भाँती विचार करके जो मनुष्य भावी क्लेश के निराकरण के समुचित उपाय करता है, विद्वानों ने उसी को दक्ष पुरुषों से भी अधिक दक्ष (चतुर शिरोमणि) कहा है । पुरुष अपनी आयु में से आठ मास, एक दिन अथवा सम्पूर्ण पूर्वावस्था में अथवा पूरी आयु भर ऐसा कर्म अवश्य करे, जिस से अंत में वह परम सुखी हो और निरंतर उन्नति के पथ पर बढ़ता रहे ।

12. कौन  ब्राह्मण दोनों मार्गों को जानता और बतलाता है ?

वेदान्तवादी विद्वान अर्चि और धूम – ये दो मार्ग बतलाते हैं । अर्चि मार्ग से जाने वाला पुरुष मोक्ष को प्राप्त होता है और धूम मार्ग से जाने वाला जीव स्वर्ग में पुण्य फल भोग कर पुनः इस संसार में लौट आता है । सकाम भाव से किये हुए यज्ञ आदि द्वारा धूम मार्ग की प्राप्ति होती है और नैष्कर्म (कर्मफल त्याग एवं ज्ञान) से अर्चिः मार्ग प्राप्त होता है । इन दोनों से भिन्न अशास्त्रीय मार्ग है, वह पाखंड कहलाता है । जो देवताओं  तथा मनुप्रोक्त धर्मों को नहीं मानता, वह उक्त दोनों मार्गों को प्राप्त नहीं होता । इस प्रकार यह तत्वार्थ का निरूपण किया गया है ।

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