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खंडन 5 – द्रौपदी के पांच पति थे या एक ?

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खंडन 5 : द्रौपदी के पांच ही पति थे , न कि एक पति युधिष्ठिर !

पोस्ट (युधिष्ठिर को ही द्रौपदी का एकमात्र पति कहने वाली, इस भ्रामक पोस्ट की डिटेल्स नीचे कमेन्ट में है) पोस्ट बनाने वाले ने, सर्वप्रथम अंग्रेजों के भाषांतरण को गलत बताते हुए, ब्राहमण, पुजारी, पुरोहित अदि को दोषी ठहराते हुए, आर्यसमाजियों को हीरो बनाने की घोषणा की है और बताया है कि वे आर्यसमाजी हैं, जिनकी वजह से द्रौपदी के पांच नहीं 1 पति (युधिष्ठिर) के होने का प्रमाण मिलता है और आर्यसमाजियों ने इस बात को सिद्ध किया, जिसके लिए, हमने उनका ऋणी होना चाहिए और जागना चाहिए और इस पोस्ट को कम से कम 10 लोगों को फॉरवर्ड करना चाहिए 😊 |

मैंने पहले भी बताया है कि किसी भी भ्रामक पोस्ट को तैयार करने में एक मनोवैज्ञानिक नियम का पालन लगभग किया जाता है कि पहले से ही किसी को दोषारोपित कर दिया जाता है (जैसे कि कुछ मूर्ख कहेंगे, कुछ देशद्रोही कहेंगे, कुछ सेकुलर कहेंगे अदि मतलब किसी के कुछ भी वितर्क को, पहले ही खारिज किया जा चुका है, उनके ऊपर दोषारोपण करके) वही विधि इस पोस्ट में प्रयोग की गयी है कि पहले ही आपकी नज़रों में एक को दोषी और दुसरे को हीरो बता दिया गया है ताकि आपकी नजर में, आर्यसमाज की एक अच्छी इमेज बने | जबकि होना इसके उलट चाहिए था कि पहले अपनी बात कहे, सही अथवा गलत, फिर बताये कि ऐसे कैसे हुआ | हम मात्र, कंटेंट की चर्चा करेंगे कि इसमें कहाँ गडबड है और निष्कर्ष, पढने वाले के ऊपर छोड़ देंगे, जैसा कि मैं अक्सर करता हूँ | फिर पढने वाला decide करे, कि उसे क्या सही लगता है | (आगे के लिए, इस नियम को याद रखें, बार बार लिखने में समस्या होगी |)

आगे बढ़ते हैं, कंटेंट पर | पहला घोषित वाक्य – अर्जुन विवाह के लिए कुंती तैयार नहीं थी ? किन्तु पोस्टकर्ता ने इसका कोई प्रमाण महाभारत से नहीं दिया है ! पूरी महाभारत में ऐसा कोई वक्तव्य नहीं है, जहाँ ऐसा प्रकट हो कि कुंती ने अर्जुन के विवाह का विरोध किया हो !!! फिर, इस प्रकार के मनमाने विचार का उद्देश्य ? कारण ? – एक भ्रम पैदा करना कि हाँ, यार कुंती शादी के लिए तैयार नहीं थी |

अगले भाग में कहा गया कि अर्जुन ने विवाह से इनकार कर दिया ! हाँ, कर दिया क्योंकि पांडव सदैव धर्म में ही स्थित रहते थे | बड़े भाई से पहले छोटे भाई के विवाह को नर्क में जाने वाला बताया गया है किन्तु इसमें कुंती इस विवाह के लिए राजी नहीं थी, ऐसा लक्षण कहाँ मिलता है ? क्या कोई वाक्य है, इस के प्रमाण में ? – नहीं ! अतः, अर्जुन के वाक्य को जबरन कुंती से जोड़ा गया कि कुंती राजी नहीं थी |

उसके आगे पोस्ट कहती है कि भीम का विवाह हो गया था, अर्जुन का भी हो जाता तो युधिष्ठिर पर दोष आता कि उसमें कुछ कमी थी इसलिए कुंती द्रौपदी से अर्जुन का विवाह नहीं करना चाहती थी ! अब मजेदार बात ये है कि भीम का जो विवाह हुआ था, वो गन्धर्व विवाह हुआ था, न कि अग्नि को साक्षी रखकर, वेदमंत्रों के साथ | गन्धर्व विवाह को मनमाना आचरण कहते हुए, उसकी कहीं भी श्रेष्ठता नहीं है किन्तु चूंकि माता का आदेश था, इसलिए भीम ने उस गन्धर्व विवाह को स्वीकार किया | किन्तु उसकी तुलना वैदिक विवाह से नहीं की जा सकती और न ही ये कहा जा सकता है, भीम का विवाह पहले हो गया था | जब अर्जुन के वैदिक विवाह की बारी आई तो अर्जुन ने धर्म को आगे रखकर बड़े भाई के विवाह की बात की क्योंकि यहाँ वैदिक विवाह होना था | इसमें कहीं भी युधिष्ठिर पर कोई दोषारोपण नहीं होता बल्कि ये दर्शाया गया है कि धर्म को आगे रखा गया है कि बड़े भाई का विवाह पहले होगा और छोटे का बाद में | इसमें कुंती की इच्छा कही नहीं है |

किन्तु अगले भाग में, एक नयी कहानी जोड़ दी गयी कि माँ तो माँ है, वो कैसे ये सह लेती कि उसके बड़े बेटे पर आक्षेप आये कि उसमें कोई कमी तो नहीं है | जबकि ये सर्वविदित था, कि युधिष्ठिर, धर्मनिष्ठ, सत्यवादी, धर्म को जानने वाले थे | पूरी प्रजा, पांडवों को पसंद करती थी अतः इस प्रकार के मनगढ़ंत आक्षेप की तो जगह ही नहीं थी किन्तु यदि अर्जुन पहले विवाह कर लेते तो धर्म के बेसिस पर अर्जुन की भर्त्सना अवश्य होती कि बड़े भाई से पहले, छोटे ने विवाह कर लिया जो कि धर्मविरुद्ध था और इसीलिए अर्जुन ने निषेध किया | इस प्रकरण को जबरन कुंती से जोड़ा जा रहा है, जो कहीं भी लक्षित और वर्णित नहीं है |

आगे प्रमाण देते हुए, पोस्टकर्ता ने, कीचकवध को प्रमाण बताया है कि वहां द्रौपदी ने स्वयं कहा है कि वो युधिष्ठिर की पत्नी थी | देखिये भ्रम कैसे बुना जाता है | प्रमाण लिया उस वर्ष का जिस वर्ष युधिष्ठिर ही द्रौपदी के पति थे, एक वर्ष के लिए | नारद जी ने, पांडवों के लिए पहले ही यह नियम बना दिया था कि पाँचों पांडवों में से प्रत्येक एक वर्ष के लिए, द्रौपदी के साथ रहेगा | जिस वर्ष कीचक वध हुआ, उस वर्ष युधिष्ठिर द्रौपदी के पति थे, उस वर्ष पांडवों में, वह उसी की पत्नी कहलाई | यहाँ पोस्टकर्ता, बड़ी चालाकी से, जहाँ जहाँ, अन्य स्थानों पर द्रौपदी को पांचो पांडवों की पत्नी कहा गया है, उन सभी संदर्भो को गायब कर देता है और आपको नहीं बताता है | जैसे कि वेदव्यास ने ही, द्रुपद को द्रुपदी के पांचो से विवाह कराने को कहा, सन्दर्भ और आख्यान भी दिए | दुर्योधन, धृतराष्ट्र को बताते हैं, कि द्रौपदी ने पाँचों पांडवों का वरण किया है (क्योंकि सबसे से विधिवत, वैदिक विवाह हुआ था तो कुछ भी छिपा हुआ नहीं था अतः ये बात सभी को पता थी) भरी सभा में, कर्ण कहता है कि कुंती तेरे तो पांचो पति नपुंसक हैं और बीते हुए तिलों की सामान व्यर्थ हैं अतः अब कौरवों में से किसी एक को पति चुन ले, ताकि तुम्हें वनवास जैसे दरिद्रता न भोगनी पड़े | पूरे सभा पर्व में, बारम्बार द्रौपदी को पाँचों पांडवों की पत्नी कहा गया है (द्रौपदी और पांडवों के सामने) | इसके अलावा वेदव्फियास जी ने, पाँचों पांडवों की पृथक संतानों के नाम बताये हैं, जो द्ररौपदी से उत्पन्न हुई थी | युधिष्ठिर की अलग, भीम की अलग, नकुल की अलग, सहदेव की अलग, अर्जुन की अलग | ये सभी बातें पोस्टकर्ता ने छुपा ली और एकमात्र प्रमाण दिया, उस वर्ष का, जब युधिष्ठिर ही द्रौपदी के पति थे | इसे कहते हैं, भ्रम को पैदा करना, भ्रम को बुनना और पढने वाले को (जिसने असली सन्दर्भ ग्रन्थ न पढ़ा हो) उसे मूर्ख बनाना |

इसके बाद उसने एक अन्य प्रमाण देने की चेष्टा की, जब जयद्रथ ने द्रौपदी को वन में देखा | और यहीं पोस्टकर्ता फंस गया | वहां पोस्टकर्ता कहता है कि द्रौपदी ने कहा कि युधिष्ठिर उसके पति हैं जबकि सत्य ये है कि जयद्रथ ने पहले अपने सेवक (कोटिकास्य) को द्रौपदी का परिचय लेने भेजा | तब द्रौपदी उससे कहती है – “शिबि देश के राजकुमार! मैं राजा द्रुपद की पुत्री हूँ। मनुष्‍य मुझे कृष्णा के नाम से जानते हैं। मैंने पाँचों पाण्‍डवों का पतिरूप में वरण किया है, जो खाण्‍डवप्रस्‍थ में रहते थे। उनका नाम तुमने अवश्‍य सुना होगा। युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीपुत्र नरवीर नकुल और सहदेव – ये ही मेरे पति हैं।“ जबकि पोस्टकर्ता ने पूर्व में कहा है कि क्या कहीं ऐसा सन्दर्भ है, जहाँ द्रौपदी ने स्वयं युधिष्ठिर के अलावा किसी और की पत्नी कहा हो, तो ये रहा वो सन्दर्भ | (महाभारत: वन पर्व: षट्षष्‍टयधिकद्विशततम (266) अध्‍याय: श्लोक 1-9 )

अब अगर आपके पास ये पोस्ट घूमती हुई आ जाये, तो ये सन्दर्भ और ये पोस्ट, फेंक कर मारिएगा, ऐसे दुष्ट लोगों पर, जो शास्त्रों में इस प्रकार की घालमेल करके, आधी अधूरी बातें दिखाकर, भ्रम फैलाते हैं और समाज में ये प्रतिष्ठा होती है कि हमारे शास्त्रों में तो बहुत सी बातें गलत लिखी हैं | उनमें तो बहुत मिलावट है, पता ही नहीं चलता कि क्या सही है और क्या गलत | बिलकुल गलत धारणा है, सबकुछ स्पष्ट है, बशर्ते कि कोई उन्हें पढ़े |

इस एक सन्दर्भ के बाद, उस पोस्ट की कोई सत्ता नहीं रहती है और ये स्पष्ट हो जाता है कि पोस्टकर्ता ने, सनातन ग्रंथों में भ्रम फैलाने के उद्देश्य से, इस पोस्ट की रचना की है | आप भी इस बात को अधिकाधिक ग्रुप्स और फेसबुक पर शेयर करें, अपनी पोस्ट बनाएं ताकि अन्य लोगों के पास, जिनके पास ये फेक पोस्ट पहुची हो, उनको भी ये स्पष्ट हो जाए |

पोस्ट का खंडन किया जा चुका है | अब अगली बार में, उस भ्रामक पुस्तक, जिसमें युधिष्ठिर को ही द्रौपदी का एकमात्र पति होने के विभिन्न उद्धरण दिए है, के विभिन्न भ्रामक और झूठे कथ्यों का खंडन किया जाएगा, जो कपोल काल्पनिक हैं |

पं अशोकशर्मात्मज अभिनन्दन शर्मा

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