एक नाटक – यतो धर्मः ततो जयः

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सनातन धर्म Vs हिन्दू (नाटक – यतो धर्मः ततो जयः)

दो किरदार हैं, आप इन्हें राम और लक्ष्मण, जैसे टीवी में दिखाए गए थे, उनकी तरह से ले सकते हैं |
दृश्य १ – हिन्दू – भैया, उधर से एक मुल्ला तलवार लिए आ रहा है |

दूसरा हिन्दू – अरे, हमारे मोहल्ले पर हमला तो नहीं हो रहा है | जल्दी से वीडियो बना, व्हात्सप्प कर, सबको इकट्ठा कर | घर से सामान निकाल | आज बता देते हैं कि हम कौन हैं |

लक्ष्मण – भैया, उधर से एक व्यक्ति, तलवार लिए इधर आ रहा है |
राम – कौन है ?
लक्ष्मण – पता नहीं, दाढ़ी बढ़ी हुई है, देखने में मुस्लिम लगता है |
राम – ठीक है, उसको आने दो | दूर से चेतावनी देकर पूछो, क्यों आया है |
लक्ष्मण – ठहरो, क्या बात है ? इधर क्यों आ रहे हो ? हाथ में तलवार क्यों है ?दूर से आती आवाज – जी, ये तलवार मिली है, घर में नहीं रखना चाहता, इसलिए कहीं फेंकने जा रहा हूँ |
राम – इसे जाने दो, पर सावधान रहो |

दृश्य २ – हिन्दू – यार, ये औरत तो गर्भवती है |
दूसरा हिन्दू – तो क्या हुआ ? ये साले मुल्ले, बच्चे पर बच्चा पैदा करते जाते हैं ! मार साले को, घर में आग लगा दे |

लक्ष्मण – भैया, ये औरत तो गर्भवती है ? इसका क्या करना है ?
राम – गर्भवती स्त्री की ह्त्या और प्रताड़ना, दोनों पाप हैं | इसे जाने दो |

दृश्य 3 – हिन्दू – यार, घर में घुस कर मारेंगे सालों को | इन सालों ने जीना हराम कर रखा है | पहले इनके पूर्वजों ने हिन्दुओं को मारा, पर आज हम सबका बदला लेंगे |
दूसरा हिन्दू – आग लगा दे, सबके घरों में |

लक्ष्मण – भैया, इन सबको मार ही देना चाहिए ? ये सभी दुष्ट ही हैं |

राम – नहीं, लक्ष्मण | इन्होने हमारा क्या बिगाड़ा है | ये हमारे शत्रु भी नहीं है | जिन्होंने पूर्व में, नरसंहार किया है, क्या ये वही है ? यदि ये वही भी हैं तो पहले इस राज्य के राजा को इसकी सूचना देनी चाहिए | यदि वहां से न्याय न हो, तब ही हमको दण्डित करने का अधिकार है | अधर्मी को दंड देना ही न्याय है | किसी अधर्मी की जगह, किसी निर्दोष को दंड नहीं दिया जा सकता है अन्यथा ये भी अधर्म ही होगा, लक्ष्मण |

लक्ष्मण – किन्तु भैया, इनके ही बन्धु बांधवों ने ही पूर्व में नरसंहार किया है | इनके ही धर्म वालों ने पूर्व में, सैकड़ों निर्दोषों की ह्त्या की है | इनके ही पूर्वजों ने, पूर्व में, अनेकों अत्याचार किये हैं !! फिर भी आप अपने धनुष को क्यों नहीं उठाते हैं, भैया ?

राम – लक्ष्मण ! किसी के गुण और दोष का परिचय, उसके स्वभाव और उससे मिलकर ही होता है | विभीषण भी उसी गोत्र का था, जिसका रावण था किन्तु दोनों के स्वभाव में बहुत अंतर था | एक ही गोत्र अथवा कुल का होने मात्र से कोई दोषी कैसे हो सकता है ? बालि भी उसी कुल से था, जिससे सुग्रीव था तो क्या बालि के साथ, सुग्रीव को भी मार देना चाहिए था ? रावण अधर्मी था, तो क्या उसके कुल में उत्पन्न सभी स्त्रियों, उसके बांधवों, उसकी संतानों को मारना उचित हो जाएगा ? वध और दंड मात्र उसी को मिलना चाहिए जो अधर्म करता हो अथवा अधर्म के साथ खड़ा हुआ हो | भविष्य में, द्वापर में, जब मैं कृष्ण जन्म लूँगा, उस समय भी कौरवों का साथ छोड़ कर, युयुत्सु, पांडवों से मिलेगा तो क्या उसे भी मार डालना चाहिए ? पांडव भी उसी कुल के होंगे, जिस कुल के कौरव होंगे | कौरवों में सभी नहीं मरे, न ही मारे जाने चाहिए | किन्तु जो अधर्म का साथ थे, वो अवश्य दंडनीय है | किन्तु तुम्हारी ऐसी अधर्मयुक्त बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई लक्ष्मण !

लक्ष्मण – आप सही कह रहे हैं भैया, किन्तु ऐसा भी तो संभव है, भविष्य में, यही लोग आतातायी हो जाएँ ? अपने पूर्वजों जैसा ही कृत्य अर्थात जनसंहार करें | राम – नहीं लक्ष्मण | ये निर्धारण करने वाले हम और तुम कौन हैं कि कौन क्या बनेगा अथवा कौन भविष्य में क्या कर्म करेगा ? क्या तुम त्रिकालदर्शी हो गए हो, जो भविष्य देखकर, वर्तमान में ही दंड देने का विचार कर रहे हो ? यदि त्रिकालदर्शी नहीं हुए हो, तो ऐसा भी तो संभव है कि जैसे विभीषण, राक्षस होते हुए भी, रावण जैसा अधर्मी नहीं था | पांडव, कुरु कुल में उत्पन्न होने पर भी, अधर्मी नहीं होंगे वैसे ही, किसी एक विशेष कुल/गोत्र में उत्पन्न व्यक्ति भी पूर्ववर्ती मनुष्यों से अलग हो | इसका निर्धारण हम नहीं कर सकते हैं, लक्ष्मण |

दृश्य ४- पहला हिन्दू – यार, बहुत से मुल्ले, तलवार लेकर इधर ही आ रहे हैं, क्या करें |
दूसरा हिन्दू – वीडियो बना सालों की | अभी निकलते हैं यहाँ से | भाग के कहीं जान बचाते हैं | वीडियो को व्हात्सप्प पर और सब जगह शेयर कर | अपने लोगों को इकठ्ठा कर, फिर निबटेंगे इन से |

लक्ष्मण – भैया, बहुत से व्यक्ति, तलवार लेकर इधर ही आ रहे हैं | क्या करना चाहिए ?

राम – कौन लोग हैं ?

लक्ष्मण – देखने में मुस्लिम लगते हैं भैया | चेहरे पर हाव-भाव भी बता रहे हैं कि इनके विचार उत्तम नहीं हैं | राम – अच्छा | ठीक है, थोड़ी दूर से चेतावनी देकर, पूछो, उद्देश्य क्या है ?

लक्ष्मण – हे ! कौन हो तुम लोग ? इधर क्यों आ रहे हो ? ठहरो, पहले अपना परिचय दो, फिर ही आगे बढना !
लक्ष्मण – भैया, ये लोग नहीं रुक रहे हैं, न ही परिचय दे रहे हैं ! क्या करना है ?

राम – लक्ष्मण, सचेत हो जाओ | धनुष उठा लो, युद्ध के लिए तैयार हो जाओ |

लक्ष्मण – किन्तु भैया, ये तो संख्या में बहुत अधिक हैं | हम दोनों इनका सामना कैसे करेंगे ?

राम – ये तो अच्छी बात है, लक्ष्मण | हम जिधर भी तीर चलाएंगे, किसी न किसी को तो लगेगा ही | हमारा कोई भी वार,खाली नहीं जाएगा |

लक्ष्मण – किन्तु भैया, कहीं ये लोग, हम पर भारी तो नहीं पड़ जायेंगे |
राम – यतो धर्मः, ततो जय, लक्ष्मण ! धर्म जहाँ होता है, विजय भी वहीँ होती है | हमने इनका कुछ नहीं बिगाड़ा है किन्तु यदि ये फिर भी युद्ध करना चाहते हैं तो हम पीछे नहीं हटेंगे ! यदि ये हमसे युद्ध नहीं करते हैं, तो भी हम अपनी आखों के सामने किसी निर्दोष का रक्त नहीं बहने देंगे | निर्दोषों की रक्षा करना ही हमारा कर्तव्य है | शत्रु कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, धार्मिक व्यक्ति को युद्ध से च्युत नहीं होना चाहिए लक्ष्मण | यदि मर गए तो स्वर्ग प्राप्त होगा और यदि नहीं मरे तो यश प्राप्त होगा | अतः समरांगण में सदैव तत्परता से अपना पुरषार्थ दिखाना ही धर्म है |

लक्ष्मण – जी, भैया | आओ दुष्टों ! तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे सिर पर नाच रही है जो तुम निर्दोषों का रक्त बहाने के लिए निकले हो तो | जब तक धरा पर एक भी सनातनी जीवित है, किसी निर्दोष का रक्तपात नहीं हो सकता है |

आज का हिन्दू – शास्त्रों के ज्ञान से च्युत, डरपोक, अधीर, भीड़ की सोच से चलने वाला

सनातनी – धैर्यवान, दुर्धुष, शास्त्रों का ज्ञाता और धर्म को आगे रखने वाला |

विद्वान् की आँखें, शास्त्र ही होती हैं | भीड़ की आँखें नहीं होती, भीड़ अंधी होती है |अभिनन्दन शर्मा

उपरोक्त पात्र और घटनाक्रम पूर्णतः काल्पनिक है और किसी से सम्बद्ध नहीं है | मात्र धर्म कि व्याख्या करने हेतु, उपरोक्त घटनाक्रम को रचा गया है | यदि अच्छा लगे तो शेयर रुकना नहीं चाहिए |

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