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अघोरी बाबा की गीता – भाग 58

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बड़ा हुआ सो का हुआ…..

“ये कोण नहीं होता है | जो कक्षाओं में टीचर पढ़ा रहे हैं, वो ये ही है जो तुमने बताया कि दो लाइन (पंक्तियाँ) जहाँ एक बिंदु पर आ कर मिले तो उसे कोण कहते हैं | ये गलत परिभाषा है, यदि मैं अध्यापक होता तो बताता की जब हम कोण नापते हैं तो हम दो पंक्तियों के बीच का अंश (डिग्री) नहीं नापते बल्कि एक बड़े चाप का केंद्र पर कितने मात्रक बन रहा है, ये नापते हैं, अंश में | जब बच्चो को ये पता चले की हम दो पंक्तियों के बीच का कोण नहीं नाप रहे बल्कि एक चाप के केंद्र पर बनने वाले कोण को नाप रहे हैं तो उनकी कल्पनाएँ अनन्त आकाश में उड़ने लगती, पर ऐसा नहीं होता | क्योंकि उनको ऐसा बताया ही नहीं जाता | जब उनको ये बताता तो ये भी बताता कि इसे अंश में ही क्यों नापते हैं !

तुम इसको ऐसे समझ सकते हो, कि एक बड़ा चाप है | उसके दो सिरों से दो लाइन (पंक्तियाँ) खींचे और तब तक खींचे तब तक वो एक बिंदु पर न मिल जाएँ | तुमने देखा होगा, हम अंश को कैसे दिखाते हैं, जहाँ पर दोनों लाइन मिलती हैं, वहां पर उनके केंद्र बिंदु के पास एक बहुत छोटा सा चाप बनाते हैं दोनों पंक्तियों के बीच | वो क्या है ? वो उस बड़े चाप को हमने केंद्र के पास फिर से बनाया है | जो कोण उस बड़े चाप का होगा, वो उस छोटे चाप का भी होगा, जो केंद्रबिंदु के पास है | क्योंकि कोण उन दोनों लाइन का नहीं है, बल्कि उस बड़े चाप का ही नापा जाता है जो अदृश्य माना जाता है |

इस कोण को समझना बहुत जरूरी है क्योंकि इस कोण से आप गणित की शुरुआत करते हैं | इस कोण से आप आध्यात्म की शुरुआत करते हैं | इस कोण से आप अपने पूर्वजों को समझ सकते हैं | इस कोण को बच्चो को सिखाना बहुत आवश्यक था, जो नहीं सिखाया जा रहा है |”

मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था | ये कोण पर इतना जोर क्यों दे रहे हैं ! कोण का आध्यात्म और पूर्वजों से क्या लेना देना है ! और गणित यहाँ से शुरू होता है, ये इतना यकीन से कैसे कह सकते हैं | इस कोण में अवश्य ही ऐसा कुछ है, जो मुझे नहीं पता है | पर मैंने उन्हें टोकना उचित नहीं समझा | वो अपनी रो में बोलते जा रहे थे, एक ओजस्वी शिक्षक की तरह से | उनके चेहरे से, तेज छलक रहा था, नींद का कही नामो निशान भी नहीं था | उनकी गूढ़ बातों में मुझे भी नींद नहीं आ रही थी | उन्होंने आगे कहा –

“इस संसार में, इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ है, वो सब अंश में ही है चाहे वो कुछ भी हो – ज्योतिष, गणित, खगोल, राशि, दृकगोल, सब कुछ | सब कुछ अंश, पल, विपल में ही तो है | पुराने समय में घंटा, मिनट और सेकंड तो होता ही नहीं था | एक ही चीज होती थी अंश ! दूरी (लम्बाई) का मात्रक, वजन का मात्रक और कोण का मात्रक – ये तीन ही मुख्य मात्रक थे | समय का कोई मात्रक होता ही नहीं था | हमारे यहाँ होता था, अंश, पल और विपल | एक दिन में २४ घंटे (hours) नहीं, २४ होरा होती थी | मैंने तुमको बताया था की राशियों की दूरी एक दूसरे से ३० अंश है और प्रत्येक राशि (३० अंश) के आधे भाग को होरा कहा जाता है – “होरेति शास्त्रसंज्ञा लग्नस्य तथार्धराशेश्च |” (१*) यानि १५ अंश की एक होरा होती थी | पृथ्वी १५ अंश घूमने में जितना समय लेती थी, उसे होरा कहा जाता था | पर उस होरा को मापा कोण में ही गया था | होरा समय का नहीं, कोण का ही मात्रक होता था | एक दिन में १२ राशि और आधी राशि की एक होरा यानी एक दिन में १२ x २ = २४ होरा |

फिर ध्यान दो, होरा समय का नहीं, कोण का मान था | पृथ्वी कितना घूमी, इसका मान था | पर जब पश्चिम देशों ने नक़ल की तो उस होरा का hour कर दिया और अब उनके यहाँ २४ होरा की जगह २४ (hour) घंटे होते हैं | उनसे कोई पूछ ले २४ घंटे ही क्यों होते हैं, २५ या २३ क्यों नहीं होते ? सो कोई जवाब नहीं मिलेगा पर हमारे यहाँ २४ होरा क्यों होती थी, क्योंकि २४ होरा में पृथ्वी ३६० अंश पूरा घूम जाती है | जैसे हमें पता था कि pi का मान क्या है, जैसे हमें पता था कि एक वृत्त में ३६० अंश ही क्यों होते हैं, वैसे ही हमें पता था कि एक दिन में २४ होरा (घंटे) ही क्यों होते हैं | पर उसे होरा से उन्होंने घंटा बनाया और उस घंटे की अवधारणा से उनका पूरा केलेंडर बना है, घंटो से दिन, दिन से महीने, महीने से साल बन गया | जिसे दुनिया आज मानती है, वो पूरा चुराया हुआ है | हमारे यहाँ आज भी सौर केलिन्डर है, चन्द्र केलेंडर हैं, वो घंटो पर आधारित नहीं है | (केलेंडर पर फिर कभी …)

बाप रे ! ये कर क्या रहे हैं, कोण से चाप, चाप से वृत्त, वृत्त से होरा, होरा से केलेंडर !!! इसे ही तो हमारे यहाँ सूत्र कहा जाता है | सूत्र यानि धागा | जब सूत्र खुलता है तो कैसे एक धागे से दूसरा धागा और दुसरे से तीसरा धागा जुड़ता चला जा रहा है | आज मुझे समझ में आया की हमारे शास्त्रों में सूत्र क्यों लिखे हुए हैं क्योंकि वो एक अंतर्जाल होते है | अद्भुत है ये सब | पर इनके सूत्र अभी समाप्त नहीं हुए थे, वो आगे कहे जा रहे थे |

एक अंश में ६० कला और एक कला में ६० विकला हुआ करती थी, ठीक वैसे जैसे १ घंटे में ६० मिनट और १ मिनट में ६० सेकंड होते हैं | पर मजेदार बात ये है की किसी से पूछो कि एक घंटे में ६० मिनट ही क्यों होते हैं, ५० क्यों नहीं होते, तो जानते हो तुम्हे जवाब में क्या मिलेगा ? तुम्हें जवाब में मिलेगा – घंटा |” – ये कहते हुए वो थोडा मुस्कुराए और आगे बोले |

“तुम्हें क्या लगता है, ये जो अंश, कला और विकला होते थे, ये क्या होते थे ? इनकी गणना का अर्थ क्या होता था ? जिस ज्योतिषी को मूर्ख सिद्ध करने में लोग बाग़ सारी जान खपा देते हैं, वो जानते हो कैसे पता करता है कि तुम्हारी कुंडली में कौन सा ग्रह कहाँ था ! यहीं से बात शुरू होती है, दशमलव् की |”

आंय ! कोण, चाप, होरा, ज्योतिष, दशमलव !!! गणित कभी किसी ने ऐसे नहीं पढाया मुझे | यदि कोई मुझे बचपन में ऐसे गणित पढाता तो मैं शायद कभी गणित से डरता ही नहीं | मुझे गणित से हमेशा डर ही इसलिए लगता था क्योंकि मुझे कुछ समझ में ही नहीं आता था किन्तु यदि गणित इस तरह से कोई समझाता जैसे कोई धागा खोल रहा हो तो शायद आज मेरा गणित भी अच्छा होता |

क्रमशः
अभिनन्दन शर्मा
दिल से….

(1*) – कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां – द्वितीय अध्याय

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